मैथिली सुन्दरकाण्डः श्री तुलसीदासजी रचित श्रीरामचरितमानस केर सुन्दरकाण्डक मैथिली अनुवाद
हनुमान्-रावण संवाद
दोहा :कपि देखि के दसानन हँसल कहल दुर्बाद।
सुत वध सुरति कयल पुनि उपजल हृदय बिषाद॥२०॥
सुत वध सुरति कयल पुनि उपजल हृदय बिषाद॥२०॥
भावार्थ:- हनुमान्जी केँ देखिकय रावण दुर्वचन कहैते खूबे हँसल। फेर पुत्र वध केर स्मरण करिते ओकर हृदय मे विषाद उत्पन्न भऽ गेल॥२०॥
चौपाई :
कहे लंकेश के तोँ बानर। उजाड़लें वन से बल छौ केकर॥
कि तोँ कान सुनल नाम मोरा। देखी बड़े अशंक शठ तोरा॥१॥
कि तोँ कान सुनल नाम मोरा। देखी बड़े अशंक शठ तोरा॥१॥
भावार्थ:- लंकापति रावण बाजल – रे वानर! तूँ के थिकेँ? केकर बल पर तूँ वन केँ उजाड़िकय नष्ट कय देलें? कि तूँ कहियो हमर नाम (यश) कान सँ नहि सुनलें? रे शठ! हम तोरा अत्यंत निःशंक देखि रहल छी॥१॥
मारलें निशिचर कुन अपराधा। कह शठ तोर न प्राण के बाधा॥
सुनू रावण ब्रह्मांड निकाया। पाय जिनक बल रचलक माया॥२॥
सुनू रावण ब्रह्मांड निकाया। पाय जिनक बल रचलक माया॥२॥
भावार्थ:- तूँ कोन अपराध सँ राक्षस सब केँ मारलें? रे मूर्ख! बता, कि तोरा प्राण जेबाक भय नहि छौक? (हनुमान्जी कहलखिन -) हे रावण! सुन, जिनकर बल पाबिकय माया संपूर्ण ब्रह्मांडों केर समूहक रचना करैत अछि,॥२॥
जिनके बल विरंचि हरि ईशा। पालथि सृजथि हरथि दसशीशा॥
जे बल शीश धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥३॥
जे बल शीश धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥३॥
भावार्थ:- जिनकर बल सँ हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः) सृष्टि केर सृजन, पालन और संहार करैत छथि, जिनकर बल सँ सहस्रमुख (फण) वला शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्मांड केँ सिर पर धारण करैत छथि,॥३॥
धरय जे विविध देह सुरत्राता। तोरहि सन शठ सिखवथि दाता॥
हर केर दंड कठिन से भंजन। सेहो समेत नृप दल मद गंजन॥4॥
हर केर दंड कठिन से भंजन। सेहो समेत नृप दल मद गंजन॥4॥
भावार्थ:- जे देवता लोकनिक रक्षा लेल नाना प्रकारक देह धारण करैत छथि आर जे तोरा जेहेन मूर्ख सब केँ शिक्षा दयवला छथि, जे शिवजीक कठोर धनुष केँ तोड़ि देलनि आर ताहि के संग राजा सभक समूह केर गर्व सेहो चूर्ण कय देलनि॥४॥
खर दूषण त्रिसिरा आर बाली। वधे सकल अतुलित बलसाली॥५॥
भावार्थ:- जे खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि केँ मारि देलनि, जे सब के सब अतुलनीय बलवान् छल,॥५॥
दोहा :
जिनके बल लवलेश सँ जितलें चराचर झारि।
तिनके दूत हम जा करी हरि अनलें प्रिये नारि॥२१॥
तिनके दूत हम जा करी हरि अनलें प्रिये नारि॥२१॥
भावार्थ:- जिनकर लेशमात्र बल सँ तूँ समस्त चराचर जगत् केँ जीत लेलें आर जिनकर प्रिय पत्नी केँ तूँ (चोरी सऽ) हरण कय केँ आनि लेलें, हम हुनकहि दूत छी॥२१॥
चौपाई :
जानी हम तोहर प्रभुताइ। सहसबाहु सँ पड़ल लड़ाइ॥
समर बालि सन कय जस पावा। सुनि कपि वचन बिहँसि बिहरावा॥१॥
समर बालि सन कय जस पावा। सुनि कपि वचन बिहँसि बिहरावा॥१॥
भावार्थ:- हम तोहर प्रभुता केँ खूब जनैत छी, सहस्रबाहु सँ तोहर लड़ाई भेल छलौक आर बालि सँ युद्ध कयकेँ तूँ यश प्राप्त कएने छलें। हनुमान्जी केर (मार्मिक) वचन सुनिकय रावण हँसिकय बात टारि देलक॥१॥
खेलउँ फल प्रभु लागल भूख। कपि स्वभाव तेँ तोड़लउँ रूख॥
सभक देह परम प्रिय स्वामी। मारलक मोरा कुमारग गामी॥२॥
सभक देह परम प्रिय स्वामी। मारलक मोरा कुमारग गामी॥२॥
भावार्थ:- हे (राक्षसगणक) स्वामी, हमरा भूख लागल छल, (ताहि लेल) हम फल खेलहुँ और वानर स्वभाव केर कारण गाछ तोड़लहुँ। हे (निशाचरक) मालिक! देह सभक परम प्रिय छैक। कुमार्ग पर चलयवला (दुष्ट) राक्षस सब हमरा मारय लागल॥२॥
जे मोरा मारलक तेकरा हम मारल। ताहि पर तोहर पुत्र मोरा बान्हल॥
मोरा न किछु बान्हय के लाज। करय चाहि निज प्रभु केर काज॥३॥
मोरा न किछु बान्हय के लाज। करय चाहि निज प्रभु केर काज॥३॥
भावार्थ:- तखन जे सब हमरा मारलक, हमहुँ ओकरे सब केँ मारलहुँ। ओहिपर तोहर बेटा हमरा बान्हि अनलक, (मुदा) हमरा बन्हाय जेबाक कोनो लाज नहि अचि। हम त अपन प्रभुक कार्य करय चाहैत छी॥३॥
विनती करी जोड़ि कर रावण। सुने मान तजि मोर सिखावन॥
देख तूँ अपन कुल के विचारि। भ्रम तजि भजे भगत भय हारि॥४॥
देख तूँ अपन कुल के विचारि। भ्रम तजि भजे भगत भय हारि॥४॥
भावार्थ:- हे रावण! हम हाथ जोड़िकय तोरा सँ विनती करैत छी, तूँ अभिमान छोड़िकय हमर सीख सुने। तूँ अपन पवित्र कुल केर विचार कयकेँ देखे आर भ्रम केँ छोड़िकय भक्त भयहारी भगवान् केँ भजे॥४॥
जिनकर डरे कालो य डराय। जे सुर असुर चराचर खाय॥
तिनकर वैर किन्नहुँ नहि करे। हमरा कहने जानकी दे रे॥५॥
तिनकर वैर किन्नहुँ नहि करे। हमरा कहने जानकी दे रे॥५॥
भावार्थ:- जे देवता, राक्षस और समस्त चराचर केँ खा जाइत अछि, से काल पर्यन्त जिनकर डर सँ अत्यन्त डरायल रहैछ, हुनका सँ कदापि वैर नहि करे आर हमर कहला सँ जानकीजी केँ दय दे॥५॥
दोहा :
प्रनतपाल रघुनायक करुणा सिंधु खरारि।
जेमें शरण प्रभु राखथुन तोर अपराध बिसारि॥२२॥
जेमें शरण प्रभु राखथुन तोर अपराध बिसारि॥२२॥
भावार्थ:- खर केर शत्रु श्री रघुनाथजी शरणागत केर रक्षक और दया केर समुद्र थिकाह। शरण गेलापर प्रभु तोहर अपराध बिसरिकय तोरा अपन शरण मे राखि लेथुन॥२२॥
चौपाई :
राम चरण पंकज हिय धरे। लंका अचल राज तूँ करे॥
ऋषि पुलस्ति यश विमल मयंक। ताहि शशि मे जुनि बने कलंक॥१॥
ऋषि पुलस्ति यश विमल मयंक। ताहि शशि मे जुनि बने कलंक॥१॥
भावार्थ:- तूँ श्री रामजी केर चरण कमल केँ हृदय मे धारण करे और लंका केर अचल राज्य करे। ऋषि पुलस्त्यजी केर यश निर्मल चंद्रमा केर समान अछि। ओहि चंद्रमा मे तूँ कलंक नहि बने॥१॥
राम नाम बिनु बोल न सोहे। देख विचारि त्यागि मद मोहे॥
वस्त्र बिना नहि सोहे सुरारी। सब भूषन भूषित बड़ नारी॥२॥
वस्त्र बिना नहि सोहे सुरारी। सब भूषन भूषित बड़ नारी॥२॥
भावार्थ:- राम नाम केर बिना वाणी शोभा नहि पबैत अछि, मद-मोह केँ छोड़, विचारिकय देख। हे देवता लोकनिक शत्रु! सब गहना सँ सजल रहितो सुन्दरी स्त्री पर्यन्त कपड़ा बिना (नंगटे) शोभा नहि पबैत अछि॥२॥
राम विमुख संपति प्रभुताइ। चलि गेल पाइ बिनु पाइ॥
सजल मूल जँ सरिता नाहीं। बरखा गेल तुरत सुखाहीं॥३॥
सजल मूल जँ सरिता नाहीं। बरखा गेल तुरत सुखाहीं॥३॥
भावार्थ:- रामविमुख पुरुष केर संपत्ति और प्रभुता रहितो चलि जाइत अछि और ओकर पेनाय नहि पेनाय के समान अछि। जाहि नदीक मूल मे कोनो जलस्रोत नहि अछि (अर्थात् जेकरा केवल बरखा टा के आसरा अछि) ओ बरखा गेला पर तुरत सुझा जाइत अछि॥३॥
सुनु दसकंठ कही पैर रोपी। विमुख राम त्राता नहि कोपी॥
शंकर सहस विष्णु अज तोही। सकथि न राखि राम केर द्रोही॥४॥
शंकर सहस विष्णु अज तोही। सकथि न राखि राम केर द्रोही॥४॥
भावार्थ:- हे रावण! सुने, हम प्रतिज्ञा कयकेँ कहैत छियौक जे रामविमुख केर रक्षा करयवला कियो नहि अछि। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा सेहो श्री रामजी के संग द्रोह करयवला तोरा नहि बचा सकता॥४॥
दोहा :
मोहमूल बहु शूल प्रद त्यागे तम अभिमान।
भजे राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥२३॥
भजे राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥२३॥
भावार्थ:- मोहे जेकर मूल छैक एहेन (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा देयवला, तमरूप अभिमान केर त्याग कय दे आर रघुकुल केर स्वामी, कृपा केर समुद्र भगवान् श्री रामचंद्रजी केर भजन करे॥२३॥
चौपाई :
यद्यपि कहे कपि अति हित वाणी। भगति विवेक विरति नीति सानी॥
बाजल विहँसि महा अभिमानी। भेटल मोरा कपि गुरु बड़ ज्ञानी॥१॥
बाजल विहँसि महा अभिमानी। भेटल मोरा कपि गुरु बड़ ज्ञानी॥१॥
भावार्थ:- यद्यपि हनुमान्जी भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीति सँ सानल अत्यन्ते हित केर वाणी कहलखिन, तैयो ओ महान् अभिमानी रावण बहुते हँसिकय (व्यंग्य सँ) बाजल जे हमरा ई बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु भेटल!॥१॥
मृत्यु निकट आयल दुष्ट तोरा। लगलें अधम सिखाबय मोरा॥
उलटा हेतहु कहथि हनुमान। मतिभ्रम तोर प्रकट हम जान॥२॥
उलटा हेतहु कहथि हनुमान। मतिभ्रम तोर प्रकट हम जान॥२॥
भावार्थ:- रे दुष्ट! तोहर मृत्यु निकट आबि गेलौक अछि। अधम! हमरा शिक्षा देबय चललें हँ। हनुमान्जी कहलखिन – एकर उलटे हेतउ (अर्थात् मृत्यु तोहर निकट आबि गेलौक अछि, हमर नहि)। ई तोहर मतिभ्रम (बुद्धि केर फेर) छी, हम प्रत्यक्ष जानि लेलहुँ अछि॥२॥
सुनि कपि वचन बहुत खिसियान। बेग ने हरे एहि मूढ़ केर प्राण॥
सुनैत निशाचर मारय दौड़ल। सचिव सहित विभीषण आयल॥३॥
सुनैत निशाचर मारय दौड़ल। सचिव सहित विभीषण आयल॥३॥
भावार्थ:- हनुमान्जी केर वचन सुनिकय ओ बहुते कुपित भऽ गेल। (और बाजल -) अरे! एहि मूर्ख केर प्राण तुरन्ते कियैक नहि हरि लैत छँ? सुनिते देरी राक्षस सब मारय दौड़ल आर ओहि समय मंत्री-सचिवक संग विभीषणजी ओतय पहुँचि गेलाह॥३॥
नवा शीश कय विनय बहुते। नीति विरोध न मारू दूते॥
आन दंड किछु करू गोसाँइ। सब कहलक मंत्र भल भाँइ॥४॥
आन दंड किछु करू गोसाँइ। सब कहलक मंत्र भल भाँइ॥४॥
भावार्थ:- ओ शीश झुका प्रणाम करैत बहुत विनय कयकेँ रावण सँ कहालनि जे दूत केँ मारबाक नहि चाही, ई नीति केर विरुद्ध अछि। हे गोसाँइ। कोनो दोसर दंड देल जाय। सब कियो कहलक – भाइ! ई सलाह उत्तम अछि॥४॥
सुनैत बिहँसि बाजल दसकंधर। अंग भंग कय पठा ई बंदर॥५॥
भावार्थ:- ई सुनिते रावण हँसिकय बाजल – ठीक छैक, बंदर केँ अंग-भंग कयकेँ वापस पठा देल जाय॥५॥
लंकादहन

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