मैथिलीसेवी संस्था पर डा. चन्द्रमणि केर टिप्पणी ‘ई स्वांग कहिया धरि’ आर हमर विचार

विचारः सन्दर्भ मैथिली पोथी लोक कीनिकय पढबाक – मैथिलीसेवी संस्था द्वारा भाषा-साहित्यक प्रकाशन आदि पर कम ध्यान देबाक – आदि-इत्यादि

– प्रवीण नारायण चौधरी

डा. चन्द्रमणि झा कहैत छथि, “अहाँ मैथिलीक संस्था चलबैत छी, चन्दा एकत्र कए साल मे एक बेर बाबा विद्यापतिकेँ श्रद्धांजलि देबाक नाम पर आयोजन कए अपन परिचय-फलक बढ़बैत छी । मुदा, एकटा मैथिलीक पोथी कीनिकs नहि पढ़ैत छी, एकटा रचनाकारक पोथी प्रकाशित नहि करैत छी। कतेक दिन धरि ई स्वांग चलत?माय मैथिली भाव गुण फल दैत छथि।”
 
एहि सन्दर्भ हम किछु विनम्र जिज्ञासा डा. चन्द्रमणि झा समान अत्यन्त अनुभवी, सत्य-तथ्य सँ परिचि व्यक्तित्व सँ जानय चाहबः
 
१. मैथिलीक संस्था अछिये कतेक – अपनेक नजरि मे? मैथिली अकादमी समान संस्था, साहित्य अकादमी नई दिल्लीक मैथिली प्रति योगदान आर दिल्लीक एक ‘मैथिली भोजपुरी अकादमी’ संग मैसूर केर भाषा संस्थान आदि समान जे संस्था अछि, जतय सरकार द्वारा आवश्यक कोष व्यवस्थापन सहितक कतेको रास बात कएल जाएत अछि ताहि मार्फत सेहो जखन समुचित लाभ सँ लोक वंचित अछि त फेर चन्दा उठाकय कोनो आयोजनादि करौनिहार सँ एतेक पैघ अपेक्षा राखब कतेक उचित? अपन विचार देब।
 
२. सचमुच, पोथी कीनिकय पढब, रचनाकारक पोथी केँ प्रकाशित करायब, ई सब काज अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। मुदा एहि लेल कोन-कोन संस्था केँ अपने सक्षम मानैत छी। खुलिकय नाम लिखल जाय। निर्भीक आ बेवाकी सँ नाम खुजला पर भगवती सीताक शपथ लैत हम कहब जे ओहि समस्त आयोजनकर्ता सँ एहि विन्दुपर गम्भीरतापूर्वक विचार करब। आर एना सामान्य वर्गीकरण करैत जँ अपने समान दिग्गज लेखक आ अनुभवी एहि तरहक बात करबैक त जेहो किछु लोक काज करय लगला अछि, ओ सब हतोत्साहित हेता। आशा जे अपने बात बुझब आ सार्थक विचार सब राखब।
 
अपनेक एक कथन ईहो अछि, “2% मैथिलीसेवी पुस्तक कीनिकs पढ़ैत छथि। आब तs हमरा लग एक-एक टाक हिसाब अछि। सबटा अपनहि लेल नहि, किछु मैथिलीक लेल सेहो चिंतन करी।”
 
पुनः मैथिलीसेवी पर बड पैघ आरोप – ९८% लोक पोथी मंगनिये पबैत छथि तखन पढैत छथि एहेन भाव निकैल रहल अछि। ओ छथि त मैथिलीसेवी, मुदा केहेन सेवक जे अपन जेबी सँ पाइ नहि लागि जाय तेहेन….! यैह न? तखन ओ मैथिलीसेवी भेलाह आ कि मैथिलीक नाम पर छद्म ढकोसला कएनिहार मिथ्याचारी?
 
अपनेक विचार आबैत रहय, ताबत हम सेहो अपन कम्मे दिनक अनुभव लिखय चाहब। मैथिलीक सेवा मे ७ करोड़ मैथिलीभाषीक बीच बामोस्किल ०.००१% लोक एतेक नगर-डगर आ गाम-ठाम घूमिकय देखि सकलहुँ अछि। ताहू मे एहेन लोक जे पूर्ण समर्पित भाव सँ अपन भाषा आ संस्कृति प्रति नेह रखैत होएथ से देल गेल संख्याक पुनः दसांशो अछि कि नहि ताहि पर शंका अछि। ईहो पहिने कहि देलहुँ जे अहाँक भाषा-पहिचानक लोक मे निजी स्वार्थ छोड़ि आम समाजक हित लेल अंशदान करयवला लोक सेहो किछु एहि तरहक आँकड़ा प्रस्तुत करैत अछि, यथा स्वैच्छिक चन्दा दय केँ एहेन आयोजन कराउ जे विद्यापतिक स्मृतिक नाम पर थोड़ेक रास साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, चित्रकार आदि केँ एकत्रित कएल जा सकय आ समाज केँ कोनो तरहक संदेश देल जा सकैक – सेहो बामोस्किल १००० केर जनसंख्या घनत्व मे १० गोट भेट जाय त बुझू भाग्य हेतैक। जनसाधारण केँ त अपने जोगाड़ लगेबाक लेल आफद पड़ल छैक, ओकर त बाते छोड़ू।
 
एहेन सन अवस्था मे जे मर्दक बेटा अपन डाँड़्ह मे तागैत रखैत अछि, ओ किताब प्रकाशित करबैत अछि, ओकरा बाजार-व्यवस्थापन करैत अछि आर एहि तरहें मैथिली भाषाक सेवा करैत अछि – ओ न भेल असली मैथिलीसेवी। आब ओकरो जँ ई कही जे आर सब काज छोड़िकय अहाँ पोथिये टा कीनू आ प्रकाशित करेने चलू सेहो जायज नहि हेतैक। ओकरा त अपने एक हजार झंझटि लागल छैक। केकरो भरोसा थोड़े न छैक सिवाये जानकी केर!
 
हम सब लेखक एकटा एहेन व्यवस्था करी जाहि सँ मैथिली पोथीक बाजार-वितरण ढंग सँ चला सकी। एहि दिशा मे सब कियो अपन विचार सेहो राखी। हमरा उम्मीद अछि जे यदि गुणस्तर देबैक त आइ न काल्हि बाजार जरुर मांग करतैक।
 
हरिः हरः!!
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