बहुचर्चित मिथिला – विद्वानक मत आ मिथिलाक पौराणिक इतिहास

आलेखः मिथिलाक पौराणिक इतिहास

– संकलनः प्रवीण नारायण चौधरी

मिथिलाक लेल कुल १२ नामक चर्चा अबैछ, ई श्लोक देखी:

मिथिला तैरभुक्तिश्च वैदेही नैमिका नाम्।
ज्ञानशीलम् कृपापीठं स्वर्णालांगल पद्धति:॥
जानकी जन्मभूमिश्च निरपेक्षा निकल्मष।
रामानन्दकरी विश्वभावनी नित्य मंगला:॥
इति द्वादश नामानि मिथिलाया:!!

पाणिनी द्वारा मिथिलाक वर्णनसूत्र:

मिथिला दयष्व उण्! मैथिल च मथ्यन्ते शत्रवो अस्याम्!!
मथ्यन्ते यत्र रिपवो स: मिथिलानगरी!!!

शतपथ ब्राह्मण अनुसार:

सदानीरा जेकर नाम गंडक मानल जाइछ तेकर एहि पार यज्ञक अग्नि नहि एबाक कथा अबैछ, ऋग्वेद मे मिथिलाक चर्चा कतहु नहि कैल गेल अछि कारण ओहि काल धरि एतय वैदिक संस्कृतिक प्रसार नहि भेल छल। माधव विदेह केर विषय मे मान्यता अछि जे ओ अपन मुँह मे अग्नि आनि ओतय स्थापित केलैन। मुँहसँ अग्नि बाहर नहि भेला पर गौतम रहुगणे द्वारा आह्वान करैत कहल गेल: “तत्त्वाधृतस्नवीमहे” – एहि तरहें धृतक नाम सुनैत अग्निदेव मुँहसँ बाहर अयलाह आ पूर्वक दिशामे बढय लगलाह। तराई क्षेत्र होयबाक कारणे ई दलदल समान छल, लेकिन अग्नि प्रकट भेलापर ओ दलदल समाप्त भऽ गेल। गौतम आ विदेह अग्निकेर अनुसरण करैत हुनकहि आज्ञासँ एतय बसि गेलाह। क्रम अनुसार बहुत रास यज्ञ केलैन।

मिथिलाक संस्कृति:

षट्-दर्शनक पाँच विभागक जन्म एतहि भेल।

गौतम – न्यायसूत्र
कणाद – वैशेषिक दर्शन
जैमिन – मीमांसा
कपिल – सांख्य शास्त्र
व्यास – वेदान्त दर्शन

मिथिलाक अकाट्य आ अमर विद्वान्:

उद्योत्कट, मंडन, कुमारिल, प्रभाकर, वाचस्पति, उदयनाचार्य, गंगेश, पक्षधर आदि – बौद्धकेँ पराजित करैत ब्राह्मण विचारधाराक सत्ता स्थापित कयलन्हि।

विद्वानक परीक्षा विभिन्न चरणमे होइत छल। आचार्यकेँ योग्यतानुसार – उपाध्याय, महोपाध्याय, महामहोपाध्याय केर उपाधिसँ सम्मानित कैल जाइत छल।

मैथिल – शाक्त, शैव आ वैष्णव – तिनू प्रमुख देवी-देवताक आराधक भेलाह।

मैथिल ब्राह्मण तथा अन्य सुशिक्षित मैथिल सब अपन संतानकेँ सबसँ पहिने शक्ति आराधनाक मंत्र सिखाबैत छथि:

साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी।
उग्रेण तपसा लब्धो जया पशुपति पति:॥

मैथिल ब्राह्मणक कुल छ: भेद कहल गेल अछि:

१. श्रोत्रिय २. जोग्य ३. पाँज ४. गृहस्थ ५. वंश ६. गरीब

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेय: संस्काराद् द्विज उच्यते।
विद्यया विप्र: याति त्रिभि: श्रोत्रिय उच्यते॥

जन्मकेर विशुद्धिसँ ब्राह्मण होइछ, संस्कारसँ द्विज, विद्यासँ विप्र आ तिनू सम्मिलित रूपसँ श्रोत्रिय कहाइछ।

मैथिल ब्राह्मणक आस्पद उपाधि

१. झा २. ओझा ३. मिश्र ४. पाठक ५. ठक्कुर ६. चौधरी ७. उपाध्याय ८. सरस्वती ९. आचार्य १०. राय ११. कुमर १२. वक्शी १३. त्रिपाठी १४. खाँ १५. शुक्ल

वेदानुसार उपवेद शाखा, सूत्र, पाद, शिखा, देवता वर्णन:

जाहि गोत्रक सामवेद अछि, तेकर कौथुमी शाखा आ गोभिल सूत्र होइछ। वामशिखा अर्थात् बायाँ तरफ घुमाकय शिखा (टीक) मे गाँठ देनाय आ बाम पैर यज्ञादि शुभ कार्यसँ पहिने प्रक्षालन (पखारनाय) केनाय, गांधर्व उपवेद आ विष्णु देवता होइत छथि।

जाहि गोत्रक यजुर्वेद होइछ हुनक धनुर्वेद उपवेद होइछ आ माध्यान्दिनी शाखा, कात्यायन सूत्र, दक्षिण शिखा बंधन, दायाँ पैर धोनाय आ शिव देवता होइत छथि।

मैथिल ब्राह्मणक इष्ट देवी दुर्गा (काली) छथि। गायत्री गुरु मंत्र होइछ।

(चैत्र २६ व २७ गते मैथिल ब्राह्मण समाज, काठमाँडु, नेपाल द्वारा आयोजित सामूहिक उपनयन कार्यक्रम केर विचार-गोष्ठी लेल आलेखक अंश)

हरि: हर:!!

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