मिथिला की गरिमाः बार-बार पठनीय, मननीय एवम् अनुकरणीय

मिथिला की गरिमा

 
– स्व. पं. रुद्रधर झा (अपनी पुस्तक ‘गूढ तत्त्व समीक्षा’ में)
 
यद्यपि पृथ्वी के सभी स्थान भूमित्वेन समान हैं, तथापि –
 
“अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैप सप्तैता मोक्षदायिकाः॥”
 
इस पुराण वचन के अनुसार उक्त सातों स्थान के विशेष महत्व हैं। जिनमें ‘माया’ पद से महामाया जगज्जननी जनकनन्दिनी जानकी जी के आविर्भाव की भूमि मिथिला का ही ग्रहण उचित एवं विवेकिबुधजन सम्मत है। अतः उपरोक्त कारण के साथ-साथ निम्नलिखित कारणों से मिथिला को ही पृथ्वी-सर्वोत्तम-भूमि या पृथ्वी का मस्तक कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि –
 
१. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में नित्य एवं निरतिशय होने से परम पुरुषार्थ मोक्ष का प्रापक ब्रह्मज्ञान मिथिला की राजधानी जनकपुर में रहने वाले महाराज जनक के पास ही था, अतः बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखित है कि – ‘जनको जनक इति ब्रुवन्तो वैधावन्ति ब्रह्मज्ञानार्थमिति शेषः’। ब्रह्मज्ञान के लिये ‘जनक-जनक’ चिल्लाते हुए लोग मिथिला की ओर दौड़ते हैं। राजा जनक ने ब्रह्मज्ञान के साथ यह भी शिक्षा दी कि – जब हम ब्रह्म ज्ञान की अविच्छिन्न धारा के साथ राज्य का भी सञ्चालन करते हैं, तो उसके साथ गृहस्थाश्रम का सञ्चालन तो सहजता से ही हो सकता है।
 
इसीलिये तो प्रसिद्ध है कि जब व्यासजी के घोर आग्रह करनेपर भी ब्रह्मनिष्ठ शुकदेवजी ब्रह्मज्ञान की धारा के विच्छिन्न हो जाने के भय से विवाह करने के लिये किसी तरह भी राजी नहीं हुए, तब व्यासजी ने राजा जनक से गृहस्थाश्रम सञ्चालन के साथ ब्रह्मज्ञान की धारा को अविच्छिन्न रखने का प्रकार सीखने के लिये शुकदेवजी को राजा जनक के पास भेजा। राजा जनक ने दूध से भरा बट्टा (कटोरा) को शुदेवजी की तलहत्थी पर रखबाकर उनको दूध जरा भी छिलके नहीं इस शर्त के साथ अपने पूरे उद्यान का भ्रमण कर आने को कहा, इसके साथ ही अभी उद्यान में कोई न जाय ऐसा आदेश भी जारी कर दिया, जिससे कि किसी के धक्के से दूध के छिलकने का अवसर न आ सके। शुकदेवजी बड़ी सावधानी से निरन्तर दूध पर नजर रखते हुए पूरे उद्यान का भ्रमण कर जब राजा जनक के पास आये, तब उनसे राजा जनक ने उद्यान का वर्णन करने के लिये कहा, तो शुकदेवजी ने उत्तर दिया कि हम तो निरन्तर दूध पर ही नजर रखने के कारण जब उद्यान का कोई दृश्य देख ही नहीं सके तब उसका वर्णन कैसे करें। तब शुकदेवजी को राजा जनक ने कहा कि यदि तुम इसी तरह सदा अपनी आत्मा पर मन रखते हुए संसार का कार्य करते रहोगे तो ब्रह्मज्ञानकी धारा अविच्छिन्न ही चलती रहेगी। तब शुकदेवजी ने शादी की, जिससे कि उनके चार पुत्र हुए। यह कथा देवी भागवत में आयी है।
 
२. अभी से सत्ताइस चौयुगी (सत्य, त्रेता, द्वापर और कलिनामक चतुर्युगी) से पहले त्रेता युग में राम चरित मानस के उत्तर काण्ड में काक भुसुण्डीजी के द्वारा गरूड़ जी को कही गई –
 
इहाँ वसत मोहि सुनु खग ईशा।
बीते कलप सात अरु बीसा॥
 
चौपाइ के आधार से तो २७ कल्पों पहले त्रेता युग में ही मिथिला की राजधानी जनकपुर में सतावन पीढी तक चली ब्रह्मज्ञानी जनकों की वंशावली में बाइसवें जनक श्री सीरध्वज नामक राजा जनक के द्वारा अनेकों वर्ष तक महा-अकाल पड़ने पर चलाये गये सुवर्णमय हल के सीर (सीता नामक अग्रभाग) से मिथिला की पावनतम् भूमि के अन्यतम भाग सीतामही (प्रसिद्ध सीतामढी) से आविर्भूत हुई जगज्जननी जनकनन्दिनी सीताजी ने मिथिलाको लोकोत्तर गौरव के शिखर पर प्रतिष्ठित कर दिया। जो अयोनिजा परमेश्वरी भगवती के रूप से सर्वत्र पूजित होती हैं। उनकी सभी को चकित कर देने वाली विशेषताओं को ‘विश्वमाया सीता का अद्भुत माहात्म्य’ नामक स्वतन्त्र निबन्ध में पढिये।
 
३. दार्शनिक सम्राट वाचस्पति मिश्र ने मिथिला के ही अन्धराठाढी ग्राम में जन्म लेकर अप्रतिम प्रतिभाशाली होने के कारण कुछ ही वर्षों में पण्डित शिरोमणि श्री त्रिलोचन मिश्र नामक गुरु से सभी शास्त्रों के अध्ययन एवं स्वतः पूर्ण मनन करने के बाद ‘सर्वतन्त्र स्वतन्त्र’ होने पर सभी दर्शनों के मूर्धन्य ग्रन्थों का निर्माण कर ऐसी विभिन्न ज्ञान गंगाओं को प्रवाहित किया है, जिनमें अवगाहन कर विभिन्न विचारों के प्रबुद्ध विद्वान् सदा आनन्द मग्न होते रहते हैं। इनके रचित – ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य की भामती, न्यायवार्तिक तात्पर्य टीका, सांख्यतत्त्व कौमुदी, योग सूत्र भाष्य की तत्त्ववैशारदी, न्यायकणिका, तत्त्वविन्दु एवं ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा आदि ग्रन्थ सुप्रसिद्ध हैं। विश्वविख्यात महात्मा, विद्वान, लेखक एवं प्रवक्ता स्वामी करपात्रीजी ने हमारे सामने काशी के पण्डितों की मण्डली में कहा था कि संसार में वाचस्पति मिश्र के समान विद्वान् कभी पैदा नहीं हुए। यह सर्वथा सत्य है, क्योंकि भगवदवतार नैयायिक शिरोमणि उदयनाचार्य ने विश्ववन्द्यवैदुष्य वाचस्पति मिश्र रचित ‘न्यावार्तिक तात्पर्य टीका’ की स्वरचित परिशुद्धि नामक टीका के मङ्गलाचरण में लिखा है कि –
 
मातः! सरस्वति! पुनः पुनरेव नत्वा बद्धाञ्जलिः किमपि विज्ञपयाभ्यवेहि। वाक्चेतसोर्मम तथा भव सावधाना वाचस्पतेर्वचसि न स्खलतो यथैते॥
 
हे माँ सरस्वति! बारम्बार प्रणाम कर, कर जोड़कर कुछ कह रहा हूँ, उसे ठीक से समझो। मेरी वाणी तथा चित्त के सञ्चालन में उस प्रकार सावधान होओ, जिससे कि वाचस्पति के वचनों की व्याख्या करने में ये दोनों स्खलित न हो जाएं।
 
ऐसे ही विश्वविख्यात सर्वतन्त्र स्वतंत्र बच्चा झा जी अनेकों बार कहते थे कि वाचस्पति मिश्र की एक-एक पंक्ति एक-एक ग्रन्थ है, एवं काशी की पण्डित परम्परा से ज्ञात है कि शारदावतार बालशास्त्री (जो १६ वर्ष के वयमें ही समस्त काशी के पण्डितों में वरिष्ठ विद्वान् माने जाते थे) को भामती के अध्यापन के समय में रोते देखकर शिष्य ने पूछा कि गुरुजी क्यों रोते हैं? तब उन्होंने कहा कि भामती प्रणेता लोकोत्तर विद्वान् वाचस्पति मिश्रके दर्शन नहीं होने से। तब शिष्य ने कहा कि क्या आप उनसे कम विद्वान् हैं? तब उन्होंने कहा कि अरे मूर्ख! उनके पाण्डित्य का शतांश भी मुझमें नहीं हैं। इस वाचस्पति मिश्र के विषय में विस्तृत जानकारी बिहार प्रान्तीय मधुबनी मण्डलान्तर्गत अन्धराठाढी ग्राम से प्रकाशित ‘वाचस्पति अंक’ नामक पुस्तक से प्राप्तव्य है।
 
४. भविष्यपुराण के आधार से लिखा जाता है कि – जब आगम (तन्त्र) को प्रमाण, किन्तु निगम (वेद) को अप्रमाण माननेवाले वेद निन्दक बुद्ध देव के शिष्य-उपशिष्य तन्त्रानुसार प्रबल अनुष्ठान से सिद्धि प्राप्त बौद्ध आचार्यगणों द्वारा चमत्कार पूर्ण कार्य दिखाने से मिथिला आदि स्थानों के राजाओं के वशीभूत होनेपर बौद्धधर्म के प्रचार से वैदिक (सनातन) धर्म का ह्रास होने लगा, तब भगवद् गीतोक्त ‘शाश्वतधर्मगोप्ता’ सनातन धर्म रक्षक भगवान ने चौबीस अवतारों के अन्तर्गत पूज्यतम् उदयनाचार्य मिथिलाके ही ‘करियन’ ग्राम के ब्राह्मणकुल में अवतार लेकर विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न होने से कुछ ही वर्षों के अध्ययन तथा पूर्ण मनन से न्याय शास्त्र के अद्भुत विद्वान् हुए, जिन्होंने निज निर्मित ‘आत्मतत्त्व विवेक’, ‘न्याय कुसुमाञ्जलि’, ‘न्याय वार्त्तिक तात्पर्य परिशुद्धि’, एवं ‘लक्षणावली’ आदि महाग्रन्थों मेंं प्रमाणों तथा युक्तियों के द्वारा बौद्ध मत का असाधारण खण्डन कर पूर्ण समझदार बौद्ध आचार्यों को शान्त कर दिया, किन्तु अल्प समझवाले दुराग्रही कुछ बौद्ध आचार्य ‘वेद अप्रमाणमेव’ वेद अप्रमाण ही है, इस तरह के अपने जिद्द पर अड़े ही रहे, जिनको लक्ष्य करके नीतिग्रन्थ में कहा है कि – ‘ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रज्जयति’ ज्ञान के लेश से कुपण्डित उस मनुष्य को ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते, एवं रामचिरत मानस में भी कहा है कि ‘जौं गुरू मिलहि विरञ्चीसम, मूढ हृदय नहि चेत’। उन लोगों से उदयनाचार्य ने कहा कि – आप लोग ‘वेद अप्रमाणम्’ कह कर ताड़ के पेड़ से कूदें और हम ‘वेदाः प्रमाणम्’ कहकर वहाँ से कूदते हैं, तब जो बच जाए उसकी बात सत्य मानी जाय। इस प्रतियोगिता में कुछ को मरते देखकर शेष भाग गये।
 
नैयायिक शिरोमणि उदयनाचार्य ने चार्वाक, मीमांसक, बौद्ध, जैन एवं सांख्यदर्शन के मतों को क्रमशः जोरदार खण्डनों से युक्त पाँच स्तवकों से पूर्ण ‘न्याय कुसुमाञ्जलि’ नामक महाग्रन्थ में प्रमाणों और युक्तियों से ईश्वर का ही परमोत्तम साधन कर भक्ति मार्गका निर्बाध समुन्नयन किया है। अतएव भक्तराज उदयनाचार्य भगवान् जगन्नाथ के दर्शनार्थ उनकी पुरी जाने के लिये प्रस्थान किये, किन्तु मन्दिर के पास पहुँचते-पहुँचते रात के १२ बज गये, उस समय मन्दिर का फाटक बन्द हो गया था। तब भगवान् जगन्नाथ को फाटक बन्द कराकर मद्मत्त बैठे हुए समझकर क्रुद्ध होते उदयनाचार्य उनको फटकारते हुए कहे कि –
 
‘ऐश्वर्य मदमत्तोऽसि, मामवज्ञाय तिष्ठसि।
पुनर्बौद्धे समायाते मदधीना तव स्थितिः॥’
 
ऐश्वर्य (इच्छानभिधान) के मदसे मत्त हो, मुझे अपमानित कर बैठे हो, (किन्तु समझ लो कि) फिर बौद्ध के आनेपर मेरे अधीन तुम्हारी सत्ता होगी। इसके बाद अचानक फाटक खुल गया, तब उदयनाचार्य अति प्रसन्नता से पुलकित होते हुए बड़े प्रेम से भगवान् जगन्नाथ की पूजा कर उनकी बहुत स्तुति किये, जिससे अति प्रसन्न भगवान् जगन्नाथ ने उन्हें सर्वत्र विजय पाने का वरदान देकर कृतार्थ किया।
 
५. मिथिला के ही लालगञ्ज नामक ग्राम में उत्पन्न हुए श्रोत्रियवंशावतंस महाविद्वान पं. श्री भवनाथ मिश्र अत्यन्त दरिद्रावस्था में घोर कष्ट सहते हुए भी कभी याचना न करने से ‘अयाची मिश्र’ नाम से प्रसिद्ध हुए। बहुत समय बीत जाने के बाद भी कोई पुत्र न होने के कारण ‘अपुत्रस्य गतिर्नास्ति’ (‘पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्रः’ – पुत् नामक नरकसे बचानेवाला पुत्र है) पुत्र विहीन की गति (नरक से त्राण नहीं है) यह समझकर उदासीन एवं चिन्तित रहते हुए अयाची मिश्र को हितैषी मित्रों ने सलाह दी कि आप पुत्र पाने के लिये कामना लिङ्ग बैद्यनाथ के दरबार चलें। लाचारी से बैद्यनाथ के पास जाकर पुत्र की याचना करते हुए अयाची मिश्र को स्वप्न में बैद्यनाथ ने कहा कि ‘तेरे भाग्य में पुत्र नहीं है’। इस पर अयाची मिश्र ने बैद्यनाथ से कहा कि ‘यदि मेरे भाग्य में पुत्र होता तो मैं अपने अयाची नाम को कलङ्कित करता हुआ आपके पास पुत्र की याचना करने आता ही क्यों? गर्जी विचारे अर्जी करतु हैं, मान लें न मानें मर्जी हुजूर की – अब तो आपके ही अधीन मेरी लाज है। तब बैद्यनाथ ने कहा कि – “चलो, मैं स्वयं तेरा पुत्र बनने आ रहा हूँ किन्तु आज के बाद कभी तेरे वंश के लोग मेरे पास न आवें। अतः उसके बाद से अभी तक उनके वंश के कोई भी बैद्यनाथ न गये और न जाते हैं। जिस समय अयाची मिश्र के पुत्र उत्पन्न हुए उस समय उनके पास कोई भी ऐसी वस्तु नहीं थी जो पुत्र के नाल को काटने के लिये चमाइन को दी जाय, अतः शर्माते हुए उन्होंने चमाइन से कहा कि अभी तुम ऐसे ही जाओ, इस बच्चे की पहली कमाई तुम्हें ही दी जायेगी। उस पुत्र का नाम रखा गया ‘शङ्कर मिश्र’।
 
ये शङ्कर मिश्र जिस समय जिस सड़क पर बच्चों के साथ खेल रहे थे, उसी समय उसी सड़क से महान् राजा की बहुत बड़ी बारात आ रही थी, जिसमें सबके आगे बड़े दन्तार हाथी पर बैठे राजा महोदय आ रहे थे, उसे देखते ही हाथी के भय से सभी बच्चे भाग गये, किन्तु शङ्कर मिश्र खड़े ही रह गये। जब हाथी शङ्कर मिश्र के समीप पहुँच गया, तब भी उन्हें निर्भय भाव से अचल रूप से खड़े हुए देखकर राजा ने महावत के द्वारा बैठबाये गये हाथी से उतरकर शङ्कर मिश्र के पास जाते ही उनसे पूछा कि ‘कस्त्वम्?’ तुम कौन हो? शङ्कर मिश्र ने उत्तर देते हुए कहा कि
 
‘बालोऽहं जगदानन्द, न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पञ्चमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम्॥’
 
हे जगत् के आनन्दप्रद राजन्! मैं बच्चा हूँ, किन्तु मेरे वाणी बच्ची नहीं हैं, क्योंकि पाँच वर्ष पूरे न होने पर भी मैं तीनों लोकों का वर्णन कर सकता हूँ। इसे सुनते राजा ने उनसे कहा कि – तुम एक ऐसा श्लोक सुनाओ जिसमें आधा तुम्हारा रचित हो और आधा पुराना। इसे सुनते शङ्कर मिश्र ने राजा को सुनाया कि
 
‘चलिश्च कितश्छन्नः प्रयाणे तव भूपते।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रापात्॥’
 
हे राजन्! आपके प्रस्थान करने पर हजार फणोंवाला शेषनाग एक ही जगह बारातों की अधिकता से हुए दबाव के कारण चलायमान हो गये, हजार आँखोंवाला इन्द्र बारातों के सौन्दर्य, श्रृंगार और आधिक्य को देखकर चकित हो गये और हजार किरणोंवाला सूर्य बारातों के चलने से उड़े हुए धूलिकणों से ढक गये। यह सुनकर परम प्रसन्न राजा शङ्कर मिश्र को अपने गोद में बैठाकर गन्तव्य स्थान गये, जहाँ के लोग ‘मधुरं बालभाषणम्’ के अनुसार बालक शङ्कर मिश्र की विद्वतापूर्ण मीठी वाणियों के सुनने से चकित एवं आनन्दमग्न हो गये। वहाँ से लौटने पर उदार शिरोमणि राजा ने कुछ दिन अपने पास रखे हुए शङ्कर मिश्र को उनके वजन के बराबर हीरा, मोती, जवाहरात, सोना एवं वस्तरादियों से पूर्ण सम्मानित कर उनके पिता के पास भेज दिया, तब उनके पिता अयाची मिश्र ने अपने वचन के अनुसार उन सारी सम्पत्तियों को चमाइन के पास भेज दिया, जिनको चमाइन ने ‘इनसे हमारे नाम का एक बड़ा पोखर (तालाब) बना दिया जाय’ इस संवाद के साथ राजा के पास भेज दिया। तब राजा ने उस चमाइन के नामका एक बहुत बड़ा तालाब बनबा दिया, जो अभी भी सोतिपुरा में ‘चमैनियां पोखरि’ के नाम से प्रसिद्ध है।
 
ये शङ्कर मिश्र अपने पिता से ही सभी शास्त्रों का थोड़े ही दिनों में अध्ययन कर पूर्ण मनन करने से बहुत बड़े विद्वान हुए। क्यों न हों, जब कि ये वही शङ्कर थे, जिनको लक्ष्य करके पुराणों में लिखा है कि ‘ज्ञानमिच्छेत्तु शङ्करात्’। ज्ञान चाहो तो शङ्कर से। और मिथिला में प्रसिद्ध पद्य है कि
 
‘शङ्करवाचस्पत्योः शङ्करवाचस्पती समौ।
पक्षधर प्रतिपक्षी लक्ष्यीभूतो न च क्वापि॥’
 
शङ्कर और वाचस्पति के समान शङ्कर और वाचस्पति ही हैं, एवं पक्षधर का प्रतिपक्षी कहीं भी समझने योग्य नहीं हुआ। शङ्कर मिश्र रचित अनेक ग्रन्थों में वैशेषिक (कणाद) सूत्रों की ‘उपस्कार’ नामक व्याख्या तथा श्रीहर्ष रचित ‘खण्डन खण्डखाद्य’ नामक वेदान्त ग्रन्थ की ‘शाङ्करी’ टीका सुप्रसिद्ध है।
 
जब शङ्कर मिश्र के रूप में आये शङ्कर के पिता भवनाथ (अयाची) मिश्र अतिवृद्ध होने पर बोले कि –
 
‘अधीतमध्यापितमर्जितं यशो न शोचनीयं किमपीह भूतले।
अतः परं श्रीभवनाथ शर्मणो मनो मनोहारिणि जान्हवीतटे॥’
 
पढा, पढाया और यश कमाया, अतः इस संसार में कुछ भी शोचनीय नहीं हैं। इसके आगे मेरा मन मनोरम, गंगा तट में रमेगा। तब शङ्कर मिश्र ने उनके शेष जीवन शान्तिमय बीतने के लिये गंगा किनार में कुटी बनवा दी, जहाँ रहते सीताराम जपते हुए वे साकेत को चले गये।
 
६. विश्वविख्यात रसिक सन्त विद्यापति ठाकुर मिथिला के ही ‘विसफी’ ग्राम में जन्म लेकर व्याकरण, साहित्य, नीति, राजनीति और भक्ति एवं संगीत की विद्याओं को क्रमशः पढकर विलक्षण विद्वान् बने। संस्कृत भाषा में इनके रचित ‘पुरुषपरीक्षा’ नामक ग्रन्थ इनकी नीतिज्ञता का परिचायक है। ये महान राजनीतिज्ञ तथा सपादशतायु (१२५ वर्ष जीवी) होने के कारण (अल्पवय में ही महान् भोगविलासी अनेकों राजाओं के मरते जाने से) क्रमशः सात राजाओं के प्रधानमंत्री पद सुशोभित किये। ये भक्त सम्राट थे, अतः मिथिला में सर्वविदित है कि – महादेव उदना या उगना इनकी सेवा किये। विद्यापति ने संसारी लोगों को यह शिक्षा दी कि जब हम महाभक्ति के साथ राज्य का संचालन करते हैं, तब उसके साथ गृहस्थाश्रम का संचालन तो अनायास ही हो सकता है, क्योंकि जगद्गुरु भगवान् कृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है कि –
 
‘अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानी योगक्षेमं वहाम्यहम्॥’
 
मुझसे अन्य चिन्तनीय नहीं हैं जिनके, ऐसे जो जन मुझे चिन्तन करते हुए सर्वथा भजते हैं, उन सदा मुझमें चित्त लगाये हुए के अप्राप्त का प्रापण और प्राप्त का रक्षण मैं करता हूँ। ये विद्यापति महाकवि और महागायक थे, अतः इन्होंने राधाकृष्ण तथा गौरीशंकर से सम्बद्ध सहस्रों गीतों के निर्माण और गान से अत्यन्त प्रसन्न हुए उन उनका अनेकों बार साक्षात्कार कर अपने मानव जीवन को सर्वथा कृतार्थ किया। क्योंकि पुराणों में लिखा है ‘ध्यानात्परतरं गानं गानात्परतरं न हि’। भगवती या भगवान् को प्रसन्न करने का साधन ध्यान से श्रेष्ठ गान है, और गान से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। अतः मिथिला में किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ से पहले ‘उठाउ भगवतीक गीत’ कहने की प्रथा है।
 
भगवान् नारद जी से कहते हैं कि –
 
‘नाहं वसामि वैकुण्ठे, योगिनां हृदये च न।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारदः॥’
 
हे नारद! मैं न वैकुण्ठ में रहता हूँ और न योगियों के मन में किन्तु मेरे भक्त जहाँ मेरे गुणों या चरित्रों का गान करते हैं, वहीं रहता हूँ।
 
अभी भी मिथिला में सभी उत्सवों के अवसरपर कोकिल कण्ठियों के स्वरों से विद्यापति के गीतों को सुनकर सभी लोग आनन्दमग्न होते रहते हैं। ये ही अन्तकाल में गंगा को ४ कोश दौड़ाकर अपने पास लाये थे।
 
७. मिथिला के ही मान्यतम मङरौनी ग्राम में (जहाँ नव्यन्याय के आविर्भावक अपर गौतम गङ्गेशोपाध्याय, भगवती के परम प्रिय पुत्र मदन उपाध्याय और नैयायिक शिरोमणि गोकुल नाथ उपाध्याय आदि अनेकों महामानव हो गये हैं) प्रतिष्ठित ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर श्री हरिहरोपाध्याय महाज्ञानी दार्शनिक एवं महासाहित्यिक विद्वान हुए। जिन्होंने शान्ति प्रधान ‘भर्तृहरिनिर्वेद’ नामक नाटक का निर्माण कर निर्वाण पर शान्तिप्रिय सज्जनों को नित्य एवं निरतिशय परमानन्द की अनुभूति का अवसर देकर कृतार्थ किया। उनके उसी नाटक के कुछ पद्यों का रसास्वाद कीजिये –
 
शैत्यय्यादृत्य मूर्ध्ना रजनिकर कला जानह्हवी चोपनीता,
यन्त्राङ्गोत्तापभीता पदमपितजटाजूटतोऽधः प्रपेदे।
प्राणान्हातुं निपीतं विषमपिहृदयं नाविशद्ाह भीत्याः
शम्भो सत्यावियोगं तमपि शांमितवत्यस्तु शान्तिः शिवाय॥१॥
 
शंकर की प्राणप्रिया पत्नी सती ने जब पिता यक्ष के यज्ञमे शंकर के भाग के न रहने से हुए प्राणप्रिय पति के अपमान को नहीं सह सकने के कारण उसी के अग्निकुण्ड में कूदकर प्राण त्याग किया, तब शंकर ने पत्नी के वियोगाग्नि की ज्वाला को शान्त करने वाली शीतता के लिये मस्तक पर चन्द्रकला तथा गंगा का आदर से धारण किया, जिनमें गंगा शंकर अंगों के उत्कृष्ट ताप के डर से उनकी जटाओं के पुञ्ज से जरा भी नीचे नहीं आयी, तब प्राणों को त्यागने के लिये शंकर के द्वारा पिया गया विष भी वियोगाग्नि की ज्वाला से जल जाने के भय से उनके हृदय में प्रविष्ट नहीं हुआ, उस अवर्णनीय शिव के सती वियोगाग्नि को भी शान्त की हुई शान्ति सभी के कल्याण के लिये हो।
 
श्रृंगारादिरनेकजन्ममरणश्रेणीसमासादितैरेणीदृक्प्रमुखैः
स्वदीपकसखैरालम्बनैरर्जितः।
अस्त्येव क्षणिको रसः प्रतिपलं पर्यन्तवैरस्यभूर्ब्रह्मद्वैतसुखात्मकः
परमविश्रान्तो हि शान्तो रसः॥२॥
 
श्रृंगारादि रस, अपने उद्दीपक हैं मित्र जिनके, ऐसे अनेक जन्म-मरण परम्परा प्राप्त मृगनयनी प्रधान आलम्बनों के द्वारा प्राप्त होता हुआ भी क्षणिक ही है, और प्रतिक्षण परिणाम में नीरसता का उत्पत्ति स्थान है, किन्तु व्यापक अद्वैत आनन्द स्वरूप शान्त रस सदा रहनेवाला है।
 
संकल्पात्सकलापि संसृतिरभूदेषा विशेषान्ध्यभूरस्या-
श्चेद्विनिवृत्तिमिच्छसि तदैतन्मूलमुन्मूलय।
नावच्छिन्नमनेहसा न च दिशा यद्ब्रह्म सच्चिन्मयं
तत्व तत्त्वमिदं विचिन्तय परानन्दं पदं प्राप्स्यसि॥३॥
 
काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद और ईर्ष्या आदियों का उत्पत्ति स्थान यह सारी दुनिया संकल्प से हुई है, यदि इसकी आत्यन्तिक निवृत्ति चाहते हो तो इसके मूल अज्ञान को कार्य सहित उखाड़ो। दिशा और काल से अनवच्छिन्न जो सच्चिन्मय ब्रह्म है, वही तत्त्व तुम हो, इसकी सदा भावना करो जिससे परमानन्द पद को प्राप्त करोगे।
 
स्वाधीनस्वामिकायाः किमितरपुरुषैः किं महाग्नौ स्फुलिंगैः
खद्योतैः किं सुधांशौ समुदयिनि कणैर्भक्षितैर्भूभुजः किम्।
किं कूपैर्नाकनद्या ममृतरसमुजां भेषजैः किं विधेयं
स्वात्मा नारायणोऽन्तः स्फुरति यदि रतिदैर्वतैः कैव तैर्नः॥४॥
 
स्वाधीन है स्वामी जिसका, ऐसी नारी को अन्य पुरुषों से क्या प्रयोजन? महान अग्नि है जिसके पास, उसे स्फुलिंगों (वहिनकणों) से क्या मतलब? पूर्ण चन्द्र के अच्छी तरह उदित रहने पर खद्योतों (भगयोगिनियों) से क्या प्रयोजन? परमोत्तम भोजन करनेवाले राजा को कणों के खाने से क्या मतलब? स्वर्ग की नदी में स्नान पानादि करनेवालों को कूआँ से क्या प्रयोजन? अमृत रस के सेवन करने वालों को औषधों से क्या करना? यदि हृदय में अपनी आत्मा स्वरूप नारायण भासित हो रहा है, तो हमारे लिये उन देवताओं के साथ प्रेम करना हेय ही है।
 
इन महामानवों के समान बहुतों महामानवों से विराजित एवं सुशोभित हुई मिथिला का महत्व आंकना सीप में समुद्र के समाने के समान ही है।
 

हरिः हरः!!

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