ऑडिटर साहबः मैथिली कथा

कथा

– प्रवीण कुमार झा, बेलौन, दरभंगा (हालः दिल्ली सँ)

praveen-k-jhaऑडिटर साहब के घर बचिया के देखय बला आयल छलैन. बचिया के देखाओल गेल… पढ़ल लिखल, सुलोचना आ दिव्य छलीह से कोनो तरहक प्रश्ने नै रहैक कटबा छंटबा के. ऑडिटर साहब केर कनियाँ मारे ख़ुशी के डाँड़ में नुआ खोंसि चिहुंक रहल छलि.. बुच्ची गै थाकल छं, आराम कर, किछ खा ले… ओमहर ऑडिटर साहब जे घटक सब के विदाह केलाक बाद गमछा सौं बिनु पसिनाक कपाड़ पोछैत घर में वापस आबि रहल छलाह, कनियाँ केर ख़ुशी देखैत अपनों ओठ पर जबरदस्ती के मुस्की आनि लेलाह…

आब कनियाँ त ऑडिटरे साहब के छलखिन ने… बुझि गेलखिन्ह, राति सुतबाक काल में ऑडिटर साहब सौं हुनक परेशानी केर कारण पुछल गेल… ऑडिटर साहब चिर गहन विमर्षक मुद्रा धेंने चुप्प. कनियाँ बजलीह – “धूर… आहाँ के त जेना कियो और अहि बाहर में.. जकरा समाद कहबै… हम छी के आहाँ के जे हमरा कहब किछु.. ” ऑडिटर साहेब फुसफुसेलाह – “बुच्ची की कहै या… नै करतै बियाह एखन… लेब्बे करत बी ए में एडमिशन ओ..? ” कनियाँ आब बेसि परेशान छलिह. बजलीह – “यौ ई सब गप त खत्तम छल ने.. अपने सब बिचारने रही ने जे आब बियाह क देबै.. ओ त नहिएं तैयार होयत बियाह ले.. मुदा आब ओ की धिया पूता छै… हमरा नै देखल जाइए.. क् ध् के निश्चिन्त होउ… हे, बड्ड मुश्किल सौं नीक खानदान आ लड़का राजी भेल.. आब ई पढाई लिखाई के गप रहय दियौक”

ऑडिटर साहेब हामी भरि सुतबाक नाटक करै लगलाह. 10 लाख रूपा दहेज… कतय सौं एतेक… 5 लाखक इंतजाम छलैन हुनका लग… बियाह खर्च त एम्हर आम्हर सौं जोगाडो भ् जेतैन मुदा बाकी 5 लाख ? अहि सौं बढियां त एडमिशन… थोड़ेक टाइम त भेटतैक…”

अगिला दिन भारी मोन ल दफ्तर पहुँचलाह. आई एक टा मोट व्यापारी केर ऑडिट में जेबाक छलैन… सीनियर छलखिन, मनाओ नै क सकैत छलैथ… गेलाह.. ऑडिट शुरू भेल.. मुदा ऑडिटर साहेब के मोन में त लड़का, 5 लाख आ एडमिशन छलैन.. ऑडिट में किछ गड़बड़ी पकडेलै… असामी मोट छल ओ.. करोडो में धंधा छलैक. मालिक अपने, ऑडिटर साहेब क हाथ पकैड अपना केबिन में ल गेल… हाथ पैर जोडलक… मुदा ऑडिटर साहेब त ऑडिटर साहेब छलखिन, उपरो नै तकलखिन. मालिक आब आगाँ आबि हुनका सोझे पुछि लेलकैन् – “कतेक चाही, बाजू ? हमर करोडक नुकसान हेत, आहाँ मांगू कतेक लाख चाही.. मुदा ऑडिट सही करू”.

आब ऑडिटर साहेब क् पैरक नीचाँ के धरती जेना घुमै लगलैन.. बाहर आबि अपना टीम के पुछलखिन त पता लगलैन जे ऑडिट के किछ काज बांकिये छैक, कैल्हियो आबै पड़तैन… एम्हर कारखाना केर मालिक हुनका कान में कहि रहल छलखिन -“सर, जहिया कहि, घर पहुँच जैत पाई.. 5 लाख रूपा त आइये इंतजाम क सकैत छी, और चाही त सेहो.. मुदा बचा लिय कहुँना… “

ऑडिटर साहेब ओहि दिन घर पहुंचिते कनियाँ के बजौलखिन. हे, सुनु ने बहुत दिन भेल, चलु आई कतौ बाहर चलि.. चलु बेटी के इंटर में फर्स्ट डिवीजन अनबाक ख़ुशी में बाहर खाबि पीब आई… आ हे.. बुचिया के इ फॉर्म द दियौक.. कैल्हि भैर के कॉलेज में जमा क एतेक… आब हमर बेटी बी ए करतै.

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2 Responses to ऑडिटर साहबः मैथिली कथा

  1. बहुत मार्मिक कथा अछि। धन्यवाद।

  2. धन्यवाद।

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