भगवती तुलसीक कथा (शिवपुराण मे वर्णित कथाक सार)

स्वाध्याय आलेख – तुलसीक कथा

– अनुवादकः प्रवीण नारायण चौधरी

हम मिथिलावासी हिन्दू समुदाय अपन आंगन मे तुलसी चौरा निश्चित रखैत छी। तुलसी भगवती छथि। तुलसीक बहुल्य उपयोग कर्मकाण्ड मे सेहो वर्णित अछि, यथा – भगवानक पूजा मे तुलसीपत्र केर हविष्य, प्रसाद आदि मे तुलसीपत्र देबाक महत्व, लोकक अन्तिम यात्राक समय मुख मे तुलसी आ गंगाजल देबाक अद्भुत परम्परा, प्रतिदिन तुलसी मे जल ढारबाक आ पूजा करबाक परम्परा, तुलसी आ शालीग्रामरूपी भगवान् विष्णु केर विवाहोत्सव, केकरो मृत शरीर केँ तुरन्त तुलसीक समीप मे रखबाक परम्परा, कोनो मृत व्यक्तिक दाह संस्कार उपरान्त छौर झंपी उपरान्त सारा पर तुलसी गाछ रोपबाक परम्परा आदि।

एकर अलावे तुलसीक गाछ आ पत्ता मे अनेकों औषधीय गुण सेहो छैक। तुलसीक काढ़ा केहनो सर्दी-जुकाम या खोंखी, बुखार आदिक लेल तुरन्त राहत दयवला दबाइ जेकाँ होइछ। तुलसीक पातक रस आ मधु संग मिलाय गर्म कय केँ चटा देला सँ केहनो खोंखी या दमा आदि मे तुरन्त आराम भेटैछ। एक तुलसी मे अनेकों गुण कहल गेल अछि।

आउ आइ पढैत छी जे वास्तव मे तुलसी के छथिन आ हुनकर सम्बन्ध मे हिन्दू धर्मक शास्त्र-पुराण कि कहैत अछि। शिव पुराण मे वर्णित भगवती तुलसीक कथा एहि तरहें कहल गेल अछिः

भगवती तुलसीक कथा

एक बेर देवराज इंद्र देवगुरू बृहस्पतिक संग भगवान शिव केर दर्शन करय कैलाश गेल छलाह। महादेव हुनका दुनू गोटेक परीक्षा लेबय चाहलथि आर ओ रूप बदलिकय अवधूत बनि गेलाह। हुनकर शरीर पर कोनो वस्त्र नहि छलन्हि।

हुनकर शरीर जरैत आगिक समान धधैक रहल छलन्हि आर अत्यंत भयंकर देखाइत छलाह। अवधूत इंद्र व गुरु बृहस्पतिक बाट मे ठाढ़ भऽ गेलाह। इंद्र एक विचित्र पुरुष केँ रास्ता मे ठाढ़ देखि चौंकलथि।

इंद्र केँ देवराज होयबाक गर्व घेरने छलन्हि। ओ ताहि भयंकर पुरुष सँ पूछलथि तूँ के थिकह? भगवान शिव एखन कैलाश पर विराजि रहला अछि आ कि कतहु भ्रमण पर गेला अछि? हम सब हुनकर दर्शन वास्ते आयल छी।

इंद्र जखन कतेको बेर प्रश्न कयलनि लेकिन ओ पुरुष योगीक समान मौन टा रहला तखन इंद्र केँ लगलनि जे एक साधारण प्राणी हुनकर अपमान कय रहल अछि। हुनक मोन मे देवराज होयबाक अहंकार उपजल जे क्रोध मे बदलि गेल।

इंद्र कहलखिन जे हमर बेर-बेर अनुरोधहु पर तूँ किछु नहि बाजिकय हमर अपमान कय रहल छह। हम तोरा एखनहि दंड दैत छी। एना कहिकय इंद्र अपन वज्र उठा लेलनि। भगवान शिव द्वारा ताहि वज्र केँ ओहि समय स्तंभित यानी जड़ (स्थिर) कय देल गेल।

इंद्रक बांहि अकड़ि गेलनि। भगवान् अवधूत क्रोध सँ लाल भऽ गेलाह। बृहस्पति हुनकर चेहरा पर आयल क्रोध केर ज्वाला केँ देखिकय बुझि गेलाह जे एहेन प्रचंड स्वरूप महादेव केर अतिरिक्त आन केकरो नहि भऽ सकैत छैक।

बृहस्पति शिवस्तुति गाबय लगलाह। ओ इंद्र केँ सेहो महादेवक चरण मे लेटाय देलनि और बजलाह जे प्रभु इंद्र अहाँक चरण पर पड़ल छथि, अहाँक शरणागत छथि। अहाँक ललाट सँ प्रकट अग्नि हिनका जराबय लेल बढ़ि रहल अछि। हम शरणागत सभक रक्षा करू हे महादेव। बृहस्पति विनती कयलनि जे प्रभु भक्त सभ पर अहाँक सदिखन कृपा बरसैत अछि। अहाँ भक्त वत्सल और सर्वसमर्थ छी। अहाँ एहि तेज केँ कतहु आर स्थान दय दियौक जाहि सँ इंद्र केर प्राणक रक्षा होइन्ह।

भगवान रूद्र कहलखिन जे बृहस्पति हम अहाँ पर बहुत प्रसन्न छी। इंद्र केँ जीवनदान देबाक कारण अहाँक एकटा नाम ‘जीव’ सेहो होयत। हमर तेसर नेत्र सँ प्रकट एहि अग्नि केर ताप देवता सहन नहि कय सकैत छथि। ताहि लेल हम एकरा बहुत दूर मे छोड़ब।

महादेव ओहि तेज केँ हाथ मे धारण कय समुद्र मे फेक देलाह। ओतय फेकिते देरी भगवान शिव केर ओ तेज तत्काल एकटा बालक केर रूप मे परिवर्तित भऽ गेलैक। सिंधु सँ उद्भव होयबाक कारण ओकर नाम सिन्धुपुत्र जलंधर प्रसिद्ध भेलैक।

जलंधर जेकर नाम शंखचूड़ सेहो भेलैक, शिव केर तेज सँ उत्पन्न भेल छल ताहि कारण परम शक्ति सँ संपन्न छल। ओ देवतो सभ सँ बेसी शक्तिवान छल। ओ ओहि तेज सँ जन्मल छल जे इंद्र केँ समाप्त करयवला छलैक ताहि लेल असुर सब द्वारा अपन राजा बना लेल गेल। अवधूत रूप मे ई लीला कयलाक बाद महादेव अंतर्धान भऽ गेलाह। इंद्र केँ अपन अनावश्यक गर्वक भंजन सेहो भऽ गेलैक आर भगवानक दर्शन सेहो भेट गेलैक।

एम्हर तुलसी सँ जुड़ल एकटा कथा बहुत प्रचलित अछि। श्रीमद्देवीभागवतपुराण मे हिनकर अवतरणक दिव्य लीला कथा सेहो कहल गेल अछि। एक बेर शिव अपन तेज केँ समुद्र मे फेक देने छलाह। ओहि सँ एक महातेजस्वी बालक जन्म लेलक। यैह बालक आगू चलिकय जालंधर केर नाम सँ पराक्रमी दैत्य राजा बनल। एकर राजधानीक नाम जालंधर नगरी छलैक।

दैत्यराज कालनेमि केर कन्या वृंदाक विवाह जालंधर सँ भेलैक। जालंधर महाराक्षस छल। अपन सत्ताक मद मे चूर ओ माता लक्ष्मी केँ प्राप्त करबाक कामना सँ युद्ध कयलक, परंतु समुद्रहि सँ हुनक उत्पन्न हेबाक कारण माता लक्ष्मी ओकरा अपन भाइ केर रूप मे स्वीकार कयलखिन। ओतय सँ पराजित भऽ कय ओ देवि पार्वती केँ पेबाक लिलसा सँ कैलाश पर्वत पर गेल।

भगवान देवाधिदेव शिवहि केर रूप धर कय माता पार्वतीक समीप चलि गेल, परंतु मां अपन योगबल सँ ओकरा शीघ्रहि चिन्ह लेलीह आर ओ ओतय सँ अन्तर्धान भऽ गेलीह।

देवि पार्वती अत्यन्त क्रुद्ध होइत सब वृतांत भगवान विष्णु केँ सुनेलीह। जालंधर केर पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री रहथि। ओकरहि पतिव्रत धर्म केर शक्ति सँ जालंधर नहि त मारल जाइत छलय आर नहिये पराजित होइत छलह। ताहि लेल जालंधर केँ नाश करबाक लेल वृंदाक पतिव्रत धर्म केँ भंग करनाय बहुत जरूरी छलैक।

एहि कारण भगवान विष्णु ऋषिक वेश धारण कय वन मे ओतय आबि गेलाह जतय वृंदा अकेले भ्रमण कय रहल छलीह। भगवान केर संग दुइ मायावी राक्षस सेहो रहय, जेकरा देखिकय वृंदा भयभीत भऽ गेलीह। ऋषिरूपी भगवान् विष्णु तखन वृंदाक सामने क्षणहि भरि मे दुनू राक्षस केँ भस्म कय देलाह। हुनकर शक्ति देखिकय वृंदा हुनका सँ कैलाश पर्वत पर महादेवक संग युद्ध कय रहल अपन पति जालंधरक बारे मे पूछि बैसलीह।

ऋषि फेर अपन माया जाल सँ दुइ गोट वानर प्रकट कयलनि। एक वानर केर हाथ मे जालंधरक सिर छल तथा दोसर हाथ मे धड़। अपनहि पति केर ई दशा देखिकय वृंदा मूर्च्छित भऽ कय खसि पड़लीह। होश मे एलापर ओ ऋषि रूपी भगवान सँ विनती कयलीह कि ओ हुनकर पति केँ जीवित कय देथि।

भगवान् अपन माया सँ पुन: जालंधरक सिर धड़ सँ जोड़ि देलखिन, मुदा स्वयं सेहो ओहि मायावी जालंधरक शरीर मे प्रवेश कय गेलाह। वृंदा केँ एहि छल केर कनिकबो आभास नहि भेलनि। जालंधर बनल भगवान् संग वृंदा पतिव्रताक व्यवहार करय लगलीह, जाहि सँ हुनक सतीत्व भंग भऽ गेलनि। एना होइते देरी वृंदाक पति जालंधर युद्ध मे हारि गेल।

एहि सब लीला केर जखन वृंदा केँ पता चललनि, त ओ क्रुद्ध होइत भगवान विष्णु केँ शिला होयबाक श्राप दय देलीह तथा स्वयं सती भऽ गेलीह। जतय वृंदा भस्म भेलीह, ओतय तुलसीक गाछ उगि गेल। भगवान विष्णु तखन वृंदा सँ कहलथि, ‘हे वृंदा। अहाँ अपन सतीत्व केर कारण हमरा लक्ष्मी सँ सेहो अधिक प्रिय भऽ गेलहुँ अछि। आब अहाँ तुलसीक रूप मे सदिखन हमरा संग रहब। जे मनुष्यो हमर शालिग्राम रूप केर संग तुलसीक विवाह करत ओकरा एहि लोक और परलोक मे विपुल यश प्राप्त हेतैक।

जाहि घर मे तुलसी होइत छथि, ओतय यम केर दूत सेहो असमय नहि जा सकैत छथि। गंगा व नर्मदा केर जल मे स्नान तथा तुलसी केर पूजन बराबर मानल जाइत अछि। चाहे मनुष्य कतबो पापी कियैक नहि हो, मृत्युक समय जेकर प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख मे राखिकय निकलि जाइत अछि, ओ पाप सँ मुक्त भऽ कय वैकुंठ धाम केँ प्राप्त होइत अछि। जे मनुष्य तुलसी व आँवलाक छाया मे अपन पितर लोकनिक श्राद्ध करैत अछि, ओकर पितर मोक्ष केँ प्राप्त भऽ जाइत छथि।

वैह दैत्य जालंधर केर ई भूमि जलंधर नाम सँ विख्यात अछि। सती वृंदाक मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद मे स्थित अछि। कहैत छैक जे एहि स्थान पर एक प्राचीन गुफ़ा छल, जे सीधे हरिद्वार तक जाइत छल।

(साभार – हिन्दी लेख ‘सत्यालय डट वर्डप्रेस डट कम’)

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