“बाढ़िक मारि”

वंदना चौधरी।

दहेज मुक्त मिथिला पर साहित्यिक सृजनक संग वैवाहिक परिचयक आयोजन होइत अछि – संचालिका वन्दना चौधरी

बाढिक मारि:
बाढिक मारि कि होइ छै,
से पुछियौ,ओई माय स
जेकर दहा गेलै,भसिया गेलै,अन्नक सब मोटरी,
जे कहिया स रहै जोगेने,
कनि ऐ,कोन, कनि ओई कोन।
जे उपजेने छल,सब बाले बच्चे मिलक,
अपन शोणित के जरा क,
घाम पसीना चुआ क,
जे भरि बरख बच्चा सबके ,
खेबा के दुःख नै हेतै,
खेते भरि पेट ,आ जुरेतै छाती।
लेकिन ई कि केलौं हे विधाता,
कोन दिस स आयल,पैनक ओ रेला,
आ बहा क ल गेल,
ओ गुदड़ी, ओ चेथरी,
जाहि में बान्हल छल,
अन्नक ओ मोटरी,
आब करै छै,भूख स किलोल,
नै छै,किछ खेबा लेल,
ने छै देह नुकेबा लेल किछु।
बच्चा सबके परतारै छै,
ओ माय,खापैर में झूटीका के भुजिक,
ताबे तक,जाबे तक,बच्चा सब ओकर
भूख स,कनैत कनैत,सूति नै रहै छै।
बच्चा सबके,भूखल सुतल देखि,
ओ अपनों अर्धमृत भ,
आँखि में बाढ़िक, सब पैन ,
समेटने,धराशायी भ खैस पड़ैत अछि,
पैन स भीजल,टाट क ओई सेज पर,
जे नै जानि, आँखि खुजला पर,
पहुँचा देतै,कोन नगर,या गर्त में।
ई बाढिक मारि।

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