एकर सच्चाई स्वयं निरीक्षण कय सकैत छी

ओ व्यक्ति सम्मान योग्य नहि
 
जे स्वयं अपन भाषाक सम्मान नहि करय ओ व्यक्ति सम्मान योग्य नहि भऽ सकैत अछि। हालांकि एहि भ्रम मे बहुतो लोक फँसल अछि, ओकरा अपना होइत छैक जे अपन भाषाक बदला हिन्दी या अंग्रेजी बाजब त लोक बेसी पैघ आ पढ़ल-लिखल विद्वान् बुझत, लेकिन ओकर स्वयं केर आत्मा पर्यन्त ओकर एहि समझ केँ कहियो संग नहि दैत छैक। एकर एकटा बड पैघ प्रमाण ई छैक जे एहि तरहक व्यक्तिक मृत्युक समय बड़ा भयावह होइत छैक। कतेको लोक एहि विन्दु पर चौंकल होयब, लेकिन हम अत्यन्त सहजता सँ अहाँ केँ आग्रह करब जे अपन पास-पड़ोस मे कनेक नजरि दौड़ाउ, कियो-न-कियो अहाँ केँ अवस्से देखा जेता जे भरि जीवन अपन भाषा केँ छोड़िकय अपन धियापुता आदिक संग आन भाषाक प्रयोग करबाक आदति विकसित करैत छथि आर अहाँ हुनकर अन्तिम समय पर नजरि दियौक, उपरोक्त दावाक सच्चाई स्वयं पता लागि जायत।
 
एखन एक गौरव झा विहपुर (भागलपुर) निवासी लिखलथि जे हमरा मैथिली नहि बाजल (लिखल) होइत अछि, हमर भाषा अंगिका थिक। हम हुनका सँ अंगिका लिखबाक आग्रह कयल, कारण मैथिलीक छिका-छिकी बोलीक नाम बाद मे अंगिका राखल गेल अछि। मैथिली लेल अंगिका या बज्जिका या ठेंठी या एतय तक कि मगही पर्यन्त समान भाषा थिकैक। एकटा मैथिली बजनिहार-बुझनिहार लेल सहजहि भोजपुरी, हिन्दी, बंग्ला, नेपाली आदि अनेकन भाषा सुलभ ग्राह्य भऽ जाइत छैक। एहि सब भाषा सँ प्राचीन मैथिलीक अपन लिपि आ साहित्य संग अनेकन प्राचीन पान्डुलिपि, शिलालेख, आदि भेटैत छैक। मुदा एहि भाषा लेल राज्य नहि रहि जेबाक कारण, राजकीय संरक्षण, राजकाजक भाषा आ शिक्षाक माध्यम भाषा नहि बनि सकबाक कारण ई बहुत समस्या मे अछि। समस्या एतेक तक जे मैथिलीभाषी (विभिन्न बोलीवला) लोक केँ अपनहि भाषा प्रयोग मे लज्जाक अनुभूति होइत छैक। बहुतो लोक भाषा भ्रष्टाचार अर्थात् अपनहि सँ अपन भाषा केँ त्याग कय आन भाषा अंगीकार करैत अछि। लेकिन, ओकर जीवन आ अस्तित्व ओतहि समाप्त भेल बुझू जतय ओ अपन भाषा छोड़ि देलक।
 
आजुक समय मे भाषा छोड़निहार भले कतबो तर्क आ अपना केँ बदलबाक पक्ष (समर्थन) मे तथ्य आदि राखैत छथि, लेकिन हम सीधा परिणाम देखय लेल अनुरोध करैत एतबा कहब जे हुनकर अस्तित्व केना समाप्त भऽ जाइत अछि ताहि पर गौर करियौक। एकटा उदाहरण देबय चाहब। गामक बच्चू बाबू बड़ा दुलार सँ अपन बच्चा सभ संग हिन्दी बाजि गामक लोक लग बड़का लोक बनबाक कोशिश करैत छलाह। कियो टोकि दइन त चट कहि देथिन जे ई सब शहर-बाजार मे रहैत अछि, मैथिली बजबाक आदति सँ सोसाइटी मे घिनताई होइत छैक, बाहरी समाज सँ बराबरी ओहदा लेल हिन्दीक आवश्यकता छैक। धीरे-धीरे ओ बच्चा सभक संस्कार सेहो मैथिलेतर होइत गेलैक। विवाह सेहो हिन्दीक बिन्दी लगेनिहाइर कनियाँ सभक संग भेलैक। माता-पिता प्रति श्रद्धा-भाव मे स्वाभाविके रूप सँ मैथिलेतर संस्कारक प्रभाव देखल गेलैक। आब बच्चू बाबू स्वयं केँ बड़ा उपेक्षित बुझल करथि… लेकिन हिन्दीक वैह कहावत जे मरता तो क्या नहीं करता से वाली बात। करता त करता की! हुनकर नाति-पोता सब जे भेल से खाँटी हिन्दियायल, टोन सेहो बदलल…. बुढापाक समय जखन बजबो करनि त अपनापनक अभाव बुझाइन। धीरे-धीरे दुनू बुढा-बुढी मृत्युक बाट जोहैत समाप्त भऽ गेलाह। गाम सेहो छुटिये गेल छलन्हि। धिया-पुता मे गाम प्रति कोनो मोह-माया रहबे नहि करैक आ नहिये ओहेन संस्कार जे घुरिकय देखहो लेल कहियो आओत…! समाप्त भऽ गेलैक सारा जुड़ाव। गामहु केर लोक सब बिसरि गेलैक। आब बच्चू बाबू नाति-पोता सभक विवाह सेहो मैथिलेतर परिवार, जातीय मर्यादा आ कि संस्कार सँ सेहो दूर… कियो जापान, कियो जर्मनी, कियो बंगलुरू त कियो गुजरात…! एहेन बच्चू बाबू अहाँ-हमरा गाम मे अफरात संख्या मे नजरि आबि जेता। कहू जे हिनका अहाँ-हम अस्तित्व मे गनबनि? कदापि नहि।
 
भाषा मनुष्यक मौलिक पहिचानक मुख्य आधार होइत छैक। जेकर जन्म जाहि परिवार मे भेल, जाहि संस्कार आ परिवेश मे ओ पलल-बढल, ओकर आत्मा सदैव वैह भाषा मे रितैत छैक। भाषा मात्र एहेन मूलतत्त्व थिकैक जे अहाँ चुप्पो रहैत छी त मोने-मोन अपना आप सँ किछु न किछु चर्चा चलिते रहैत अछि। ताहि समय अहाँ निश्चित अपन मातृभाषा मात्र केर प्रयोग करैत छी। आ जँ स्वयं अपन मोन, बुद्धि, प्राणेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, अहं सहितक आत्मा सँ सेहो एहिना आडम्बरी व देखाबटी भाषाक प्रयोग करब त कतेक समय धरि ठीक रहब से विचारि सकैत छी। या त अहाँ पागल भऽ जायब या फेर सत्रह तरहक रोग अहाँक काया मे निवास करय लागत। वाणी सँ जीवन केँ सही-सटीक दिशा भेटैत छैक। वाणी मे मिथ्याचार या देखाबटीपन बड खराब परिणाम दैत छैक। तेँ, हमर पाठक सँ हमेशा हम यैह आग्रह करैत छी जे कोनो सुरत मे अपन मूल भाषा केँ नहि छोड़ू। ॐ तत्सत्! हरिर्हरिः!!
 
हरिः हरः!!
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