“अतिथि सत्कार”

ममता झा

#मिथिलामेंअतिथिसत्कार
अतिथि देवो भवः के मतलब भेल कि भगवान जकाँ।जेना संपूर्ण भाव स भगवान के सत्कार निश्छल भाव स करैत छी तहिना अतिथि के सेवा सत्कार वेह भाव स करैत रहैत मिथिलानी।
अतिथि के मतलब भेल “जिनकर आब के कोनो तिथि नई ओ कहियो आ कखनो आबि सकैत छैथ। हुनके हम प्रेम स हाथ पैर धुआ क पहिने आसन आब सोफा पर बइसा चाय पाइन केरेला के बाद हाल समाचार पूछैत जेहन अतिथि आगमन के समय ताहि अनुसार भोजन या जलखई के व्यवस्था कायल जाइत अई।जाबत ओ रहता ताबत तक घरक सब सदस्य सत्कार लेल तत्पर्य रहू।खेनाई संग रहइयो के उचित स्थान देल जैत छैन जइस ता उम्र संबंध में मधुरता आ प्रेम बनल रहै।
मिथिला त खान,पान,सत्कार के लेल त प्रसिद्ध अई।तेकर कारण छैथ कुशल गृहणी। आब समय के अभाव रह के कारण कतऊ कतऊ देख आ सुन के भेटैत अई कि सामने में छप्पन भोग आ चलि गेला के बाद कहि कि कत स ई बलै टुघरल टुघरल पहुँच गेला हाथ डोलबैत।एक पैकेट मिठाईयो नई जुडलेन।भइर दिन हुनके सत्कार में परेशान भ गेलऊ। एहन विकट पाहुन नई आबैथ सेह निक।
ऐहन हिन भाव अतिथि या किनको लेल कखनो नई रखवा के चाही।दोसर गप्प खोआ क कखनो ने उकटी। अप्पन संस्कृति,सभ्यता आ परंपरागत गरिमा के हमेंशा गौरवान्वित करी।परंपरागत नियम हमरा सबके जइर आ जमीन स जोड़ने अई।जे केओ पालन करैत छैथ ओ त मिथिलांचलक सत्कार लेल अप्पन सब भाव उझैल दैत छैथ। ओनाहितो गृहस्थ जीवन में अतिथि सत्कार केनाई सबस पैघ पुण्यकर्म मानल गेल अई।

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