बजरंगबाण आ हनुमानाष्टक केर मैथिली रूप

आदरणीय ‘लेखक रमेश’ सर केर प्रेरणा पर तुलसीकृत बजरंगबाण आ हनुमानाष्टक केर मैथिली रूप – दोष लेल क्षमायाचनाक संगः
 

बजरंगवाण

निश्चय प्रेम प्रतीति जे, विनय करय सम्मान।
ताहि के कार्य सकल शुभ, सिद्ध करथि हनुमान॥
जय हनुमंत संत हितकारी। सुनियौ प्रभु मोर अर्जि गोहारी॥
जनके काज विलंब नै करबै। आतुर दौड़ि महा सुख देबै॥
जहिना कूदि सिंधु कय पार। सुरसा बदन पैसि विस्तार॥
आगू जाय लंकिनी रोकली। मारल लात सुरलोक चलि गेली॥
जाय विभीषन केँ सुख देलहुँ। सीता देखि परमपद पेलहुँ॥
वाग उजाड़ि सिंधु मे बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि सन्हारल। लूम लपेटि लंक केँ जारल॥
लाह समान लंक जरि गेलय। जय जय ध्वनि सुरपुर नभ भेलय॥
आब विलंब कुन कारण स्वामी। कृपा करू हिय अंतर्यामी॥
जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर भय दुःख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिन मारी बज्र के कीले॥
गदा वज्र लय बैरिन केँ मारू। महाराज प्रभु दास उबारू॥
ॐकार हुंकार प्रभु आबू। वज्र गदा धेने बेर नै लगाबू॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीशा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि हिय शीशा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन वीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिशाच निशाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
से मारू अछि शपथ राम केर। राखु नाथ मर्याद नाम केर॥
सत्य होइ हरि शपथ पाबि के। राम दूत धरु मारू धाबि के॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुःख पाबत जन कुन अपराधा॥
पूजा जप तप नियम अचारा। नहिं जानय किछु दास तोहारा॥
वन उपवन मग गिरि गृह माहिं। तोरे बल अछि डर किछु नाहिं॥
जनकसुता हरि दास कहाबी। तिनकहि शपथ बेर नै लगाबी॥
जै जै जै धुनि होय अकाशा। सुमिरैत होय दुसह दुःख नाशा॥
चरण पकड़ि कर जोड़ि मनाबी। एहि अवसर केकरा गोहराबी॥
उठु, उठु, चलु, अछि राम दोहाय। गोर लगैछि कर जोड़ि मनाय॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देथि कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराइछ खल-दल॥
अपना जन केँ तुरत उबारी। सुमिरैत होय आनंद हमारी॥
ई बजरंग-वाण जेहि मारल। तेकरा फेर कियो नहि उबारल॥
पाठ करय बजरंग-वाण के। हनुमत रक्षा करथि प्राण के॥
यैह बजरंग वाण जे जापय। ताहि सँ भूत-प्रेत सब काँपय॥
धूप दैत जे जपय हमेशा। तेकर तन नहिं रहै कलेशा॥
हिय प्रतीति दृढ़ शरण भय, पाठ करै धय ध्यान।
बाधा सब हैर करी सभ, काज सफल हनुमान॥

हनुमानाष्टकः

 
बाल समय रवि भक्षि लेलहुँ फेर, तीनू लोक भेल अन्हारे।
ताहि सँ त्रास भेल जग केँ, से संकट केकरो सँ जाय नहि टारे ॥
देवन आबि केला विनती त, छोड़ि देलहुँ रवि कष्ट निवारे ।
के नहि जानैत अछि जग मे कपि, संकटमोचन नाम तिहारे ॥ १ ॥
 
बालिक त्रास कपीश बसथि गिरि, जाथि महाप्रभु पंथ निहारे ।
चौंकि महा मुनि शाप देला जे, चाहथि कोन विचार विचारे ॥
के द्विज रूप लियाय महाप्रभु, से अहाँ दास के शोक निवारे ।
के नहि जानैत अछि जग मे कपि, संकटमोचन नाम तिहारे ॥२॥
 
अंगद केँ संग लेने गेलौं सिया, खोजि कपीश से बेन उचारे ।
जिवैत नाहि बचब हम सब जँ, बिना सुधि आनि एतय पग धारे ॥
हेरि थकल तट सिंधु सबे फेर, लाय सिया-सुधि प्राण उबारे ।
के नहि जानैत अछि जग मे कपि, संकटमोचन नाम तिहारे ॥३॥
 
रावन त्रास देल सिया केँ सब, राक्षसि सँ कहि शोक निवारे ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारे ॥
चाहत सीय अशोक सँ आगि से, दय प्रभु मुद्रिका शोक निवारे ।
के नहि जानैत अछि जग मे कपि, संकटमोचन नाम तिहारे ॥४॥
 
बाण लगल हिया लछिमन केँ जहन, प्राण तजय सुत रावण मारे ।
लय गृह बैद्य सुषेन समेत, तहन गिरि द्रोण सु बीर उपारे ॥
आनि सजीवन हाथ देल फेर, लछिमन के अहाँ प्राण उबारे ।
के नहि जानैत अछि जग मे कपि, संकटमोचन नाम तिहारे ॥५॥
 
रावण युद्ध अजान केलक जखन, नाग के फांस सभक सिर डारे ।
श्रीरघुनाथ समेत सभे दल, मोह भेल सैह संकट भारे ॥
आनि खगेश तखन हनुमान जे, बंधन काटि सुत्रास निवारे ।
के नहि जानैत अछि जग मे कपि, संकटमोचन नाम तिहारे ॥६॥
 
बंधु समेत जखन अहिरावन, लय रघुनाथ पाताल सिधारे ।
देवीकेँ पूजि भली विधि सँ बलि, देत सभे मिलि मंत्र विचारे ॥
जाय सहाय भेलहुँ तखनहुँ, अहिरावण सैन्य समेत सँहारे ।
के नहि जानैत अछि जग मे कपि, संकटमोचन नाम तिहारे ॥७॥
 
काज कयल बड़ा देवन के अहाँ, वीर महाप्रभु देखि विचारे ।
कुन जे संकट मोर गरीब के, जे अहाँ सँ नहि जाइत अछि टारे ॥
वेगि हरू हनुमान महाप्रभु, जे किछु संकट होहि हमारे ।
के नहि जानैत अछि जग मे कपि, संकटमोचन नाम तिहारे ॥८॥
 
दोहा :
लाल देह लाली लसय, अरू धय लाल लंगूर ।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ॥
 
॥ इति संकटमोचन हनुमानाष्टक सम्पूर्ण ॥
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3 Responses to बजरंगबाण आ हनुमानाष्टक केर मैथिली रूप

  1. मिथिलानी

    वास्तविक रचना सऽ खिलवाड़ ठीक नैय लागैय यऽ,अपनेक जौऽ इच्छुक छी मैथिली केऽ तऽ नव निर्माण कऽ रचि सुंदर काण्ड!जय मिथिला जय मैथिली

    • प्रवीण नारायण चौधरी

      अति विनम्रता संग अहाँक भावना-उद्गार केँ सम्मान दैत ई मौलिक रचना संग ‘खिलवाड़’ नहि ‘अनुवाद’ मात्र कयल अछि जे साहित्यिक विधा मे मान्य आ उपयुक्त‍-आवश्यक कहल गेल अछि। चूँकि अहाँ निश्चित एकर मौलिक रूप संग सदिखन साधनारत भेल करैत होयब, अहाँ केँ ई पढैत अपन ताहि साधना मे भंग होयबाक भान सेहो भेल होयत से भान होइत अछि हमरा। लेकिन ई अनुवाद जनसामान्य आ अन्जान लेल मैथिली मे पूर्ण भाव जाग्रत करय सैह पुनीत उद्देश्य राखिकय कोनो वरिष्ठ साहित्यकारक प्रेरणा पर अनुवाद राखल अछि। एकरा ओहि तरहें अपने स्वीकार करी, आर किछु नहि।

  2. बहुत नीक 🙏

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