मीमांसा – मैथिली केर मर्यादा आ मिथिलाक लोकक मानहीनताक मूल कारण

मैथिली पर पैसा आ जातिक दम्भ?
 
पैसाक दम्भ या जातिक दम्भ यदि मैथिली केँ आकर्षित करितय त इतिहास ओ नहि रहितय जे अछि। पुछू केना? रावण द्वारा मैथिली (सीता) केर अपहरण कयल गेल छल। रावण जातियो मे श्रेष्ठ आ सम्पदा मे सेहो श्रेष्ठतम् छल, स्वयं अपन भाइ कुबेर आ ओकर सारा सम्पदा हथिया लेने रहय। ओकरा बड इच्छा छलैक जे जानकी एको बेर ओकरा दिश ताकियो टा दीतथि, ओकर ई अभिलाषा ओकरा मनहि मे चलि गेलैक। मारल गेल। बाद मे विलाप कय-कय केँ पश्चाताप कय रहल छल।
 
मैथिली भाषा – मधुरतम् भाषा आ जानकीक दोसर नाम साक्षात् जानकीक पर्याय रूप सेहो थिक। एकर वास्तविक मर्म केँ हम एहि ढंग सँ आत्मसात करैत छी। यथार्थतः एहि भाषाक बजनिहार मानवक मानव सभ्यता लेल कयल गेल योगदान केर जे विरासत देखैत छी त ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे संस्कृत यदि देवभाषा थिक आ मैथिली मानुसी भाषा – त ई निश्चित पराम्बा जानकी केर जानकीतत्त्व सँ ओतप्रोत अछि। एकटा आर ठोस आधार जे मैथिली केर सेवा लेल स्वस्फूर्त लोक सोझाँ अबैत अछि, एहि लेल कथमपि केकरो चेला बनाकय या स्वयंसेवक के गुर सिखाकय काज करबा सकल वा सकत से बात आइ धरि हम नहि देखलियैक…. १० हजार मे १ कार्यकर्ता मैथिलीक बनैत अछि आर से ‘जानकीतत्त्व’ सँ प्रेरणा पाबिकय मात्र बनैत देखलियैक। कतबो कियो मैथिली केँ कोनो उच्च जाति या वर्गक भाषा कहि दियए – ई वास्तव मे जन-गण-मन केर भाषा थिक।
 
स्पष्ट छैक जे कथित उच्चवर्ग या उच्च जाति मे घोर सन्देह व्याप्त छैक – मैथिली बजला सँ कहीं लोक छोट नहि बुझि जाय… मखैर-मखैर कय ई वर्ग-जाति-समुदाय अपनहि बाल-बच्चा सँ आन भाषा मे बाजि रहल अछि। ओकर उच्चता आइ निम्नताक पराकाष्ठा नांघि रहल छैक। ओकरा ईहो सुधि नहि छैक जे भाषा बिसरला पर साहित्य, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता आ स्वाधीनता – पाँचो मूल तत्त्व बिसराइत छैक आर यैह सब पहिचानविहीन समाज केँ आन भाषा-वेश केर उपनिवेश बनिकय ‘दोसर दर्जा’ के नागरिक बनिकय जीवन गुदस्त करय पड़ैत छैक। आइ बिहार आ मधेशक उदाहरण सँ बेसी प्रत्यक्ष दोसर केकर कहू! जड़िक बात एहि दुनू पहिचानक लोक संग केना चरितार्थ भऽ रहल अछि से स्वतः बुझय योग्य, चिन्तन-मनन योग्य विषय छी।
 
दुनियाक सर्वोच्च गूढ ज्ञान गीता मे भगवान् कृष्ण केर ई वाक्यांश एतय मोन पड़ैत अछि –
 
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ (४) अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ (५)
 
संशय केँ मेटबयवला बुद्धि, मोह सँ मुक्ति दियाबयवला ज्ञान, क्षमा केर भाव, सत्य केर आचरण, इंद्रिय केर नियन्त्रण, मन केर स्थिरता, सुख-दुःख केर अनुभूति, जन्म-मृत्यु केर कारण, भय-अभय केर चिन्ता, अहिंसा केर भाव, समानता केर भाव, संतुष्ट होयबाक स्वभाव, तपस्या केर शक्ति, दानशीलता केर भाव और यश-अपयश केर प्राप्ति मे जे कोनो कारण होइत छैक से सब मनुष्य केँ अनेकों प्रकार केर भाव हमरहि टा सँ उत्पन्न होइत छैक। (४-५)
 
हे प्रभु! अहाँ मिथिलावासी मे सही ज्ञान आ सही मार्गदर्शन करू, बस एतबा प्रार्थना!!
 
हरिः हरः!!
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