कि मैथिलीक बदला हिन्दी या अंग्रेजी झाड़नाय मिथिलावासीक कोनो विशेष रोग थिक?

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विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

कि हिन्दी-अंग्रेजी बेसी झाड़नाय कोनो बीमारी थिक?

(बीमारी सँ वरदान धरिक दृष्टान्त)
 
अपना सब ओतय एक फैशन अछि, जतेक हिन्दी, अंग्रेजी झाड़ब – अपना लागत जे हम बड होशियार आ बुधियार छी…. कारण अलबटाह जेकाँ लोक सब मुंहे ताकैत रहि जायत, बुझलक नहि बुझलक धरि मुंह ताकय लागल त ई भान अपना भीतर भेनाय स्वाभाविके लगैत छैक। मुदा ई बीमारी थिकैक जे बाद मे पता लागैत छैक।
 
मैट्रीक पास केलाक बाद दरभंगा मे एडमिशन लेने रही। किछु दिन ओतय रहबाक अवसर सेहो भेटल। अंग्रेजी बजबाक अभ्यास कय रहल रही। कौआ, कुकूर, बगुला, हंस सब सँ अंग्रेजी बाजी। कारण ओ सब त बात बुझत नहि। गलती-सलती सबटा चलैत छल। पढल-लिखल लोक लग मूरी गोतने अपनहु भाषा मे बाजय सँ डर लगैत छल, कारण भीतरका विश्वास (आत्मविश्वास) कमजोर छलय। अंग्रेजी मे कोनो विज्ञजन सँ बात करितहुँ से सच मे हिम्मत नहि होएत छल। कतय सँ होयत! एक त शब्दक अकाल, ताहि पर सँ व्याकरणक कोनो खास ज्ञान नहि, आ नहिये विद्यालय मे अंग्रेजीक तेेहेन पढाई या आपस मे कक्षा मित्र सब संग कोनो बाजबाक अभ्यास…. तखन त अपनहि एकटा पितियौत जे बाहरे रहैत पढाई कय रहल छल ओकर किताब सब हरेक विषयक अंग्रेजिये मे देखने रहियैक त मोन मे एहि भाषाक महत्व किछु बेसिये गैर गेल छलय। एहि प्रेरणा सँ जेना-तेना ई भाषा सीखक अछि से सोचिकय मूर्खाहा लोक सब ताकि-ताकि अंग्रेजी झाड़ैत रही त ओ सब पीठ ठोकि दैत छलय, वाह रे किशोर… खूब अंग्रेजी बजैत अछि। कन्हा कुकूर माँरहि तिरपित! आब कि चाही किशोर केँ!
 
जीवनक ओ महत्वपूर्ण मोड़ जे आब किशोर प्रवीण बनिकय अपन भविष्यक बाट सुनिश्चित करय, ओतय अपन ओकादि पता लागय लागल। एकटा ट्युशन पकड़लहुँ – कक्षा ६ केर विद्यार्थी केँ अंग्रेजी माध्यमक गणित पढेबाक छल। जेठ भैयारी सँ सिफारिश कराकय ट्युशन धेने रही। ताहि सँ पूर्व गणित पढेबाक अनुभव त प्राप्त कय लेने रही, मुदा माध्यम जखन अंग्रेजी भऽ गेलैक त स्वाभाविके मेहनत अपना करू पहिने तखनहि विद्यार्थी केँ किछु पढा सकब आ कि बुझा सकब। तहिया सँ जे मेहनत चालू भेल तेकर छोट वृत्तान्त एतबे बुझू कि राति भैर अपने खूब लगन सँ पढी ओहि विषय-वस्तु केँ जे काल्हि (ऐगला दिन) विद्यार्थी केँ पढायब…. आर ई मेहनत सच मे काज आयल। विद्यार्थी रिझ गेल। बात बुझय लागल। क-ट – प-ट अंग्रेजिये बाजिकय वैह कौआ-कुकूर संग जेना बात करी तहिना ओहि छठा कक्षाक छात्र केँ पढाबी। कहबी छैक न – करत करत अभ्यास जड़मत होत सुजान; बिल्कुल तहिना भेल। कनिके दिन मे एकटा स्कूल स सेहो अफर भेटल। गणितक शिक्षक बनि गेलहुँ प्राइमरी कक्षाक। जेठ भैयारीक स्थान पर सब्स्टीच्युट टीचर बनिकय पढाबय गेलहुँ, आर फेर गाड़ी कतहु रुकल नहि। ई बढिते चलि गेल।
 
लेकिन एकटा गंभीर अनुभव आब करैत छी। आइ सँ २७ वर्ष पूर्व विद्यालय मे शिक्षण पेशा मे प्रवेश पेबाक समय सँ लैत निरन्तर १० वर्ष धरि जे पढेबाक अनुभव ग्रहण कयलहुँ ताहि मे पूर्णता कतेक धीमा गति सँ भेटल से स्मृति मे आनि आइयो ओहि समयक मेहनति केँ हम सराहना करैत छी। बाद मे एकटा एहेन काजक अफर भेटल मारवाड़ी फर्म मे जे शिक्षण पेशाक संग-संग बिजनेस मैनेजमेन्ट केर कोर्स जेकाँ सिद्ध भेल। वैह कौआ-कुकूर संग बाजयवला अंग्रेजी आइ करीब १२ वर्षक तपस्या सँ एकटा नीक स्टैन्डर्ड केर लेखन क्षमता दय देने छल। आब शब्दक भंडार सेहो खूब बढि गेल छल। ताहि पर सँ जखन जीवनक आधार – कोनो पेशागत कार्य मे आवश्यकताक रूप मे अंग्रेजीक अभ्यास आबि जाय त फेर मेहनति दस गुना अधिक भऽ जाएत छैक। वैह भेल! आब बिजनेस कोरेस्पोन्डेन्स लेल अपना लेटर राइटिंग स्कील केर व्यवहारिक ज्ञान एक सक्षम गुरु – एक विशाल बिजनेस ग्रुप केर मैनेजर केर अधीन रहि लिखी, ओ काटैथ, सुधारैथ आ सिखबैथ… एना करैत-करैत मिथिलाक माटि-पानि सँ बनल किशोर सही मे नाम अनुरूपे प्रवीण भऽ गेल। पुनः ऐगला ५ वर्ष मे प्रवीण अंग्रेजीक लेखनी सँ ऊपर व्यवहारिक ब्यापार व्यवस्थापन मे प्रवेश पाबि जाएत अछि। पुनः ऐगला १० वर्ष धरि व्यवहारक ज्ञान ग्रहण केलाक बाद ओकरा मोन मे अपन मातृभाषाक अनुराग ‘विद्यापति प्रभाव’ सँ प्रवेश करैछ। आर तेकर यथार्थ योगदान समाज आ लोकहित मे बहुत बेसी होएत देखैत अछि। यैह त थिकैक जीवन।
 
हमरा हिन्दी-अंग्रेजी झाड़बाक बीमारी लगभग २० वर्ष मे छूटल। २० वर्ष मे ओहि बीमारीक नीक देन केँ सेहो सुमिरन करैत रहलहुँ, आर अनुभव भेट गेलाक बाद दोसर केँ उपदेश देनाय आरम्भ केलहुँ। सहिये कहबी छैक जे उपदेश देनाय सहज, मुदा पालन केनाय कठिन…. जाहि व्यक्तिकेँ अपने २० वर्ष धरि कोनो रोग खेहारने हो ओ कोनो २-४-५ वर्षक रोगी केँ कि इलाज बतेतैक! तखन त अपनहि एखन करय जोग छी, कय रहल छी। समाज सँ ई रोग केँ भगेबाक वास्ते सही शिक्षाक प्रसार बेसी आवश्यक छैक। चोरी-चपाटी सँ कोनो परीक्षा उतीर्ण करब त जिनगी भैर गार्मेन्ट मे क्वालिटी चेकर धरि बनिकय प्रवासक जीवन मे तेरे-कु मेरे-कु वला हिन्दिये मे सिमटल रहब। अतः जीवनक यथार्थ आवश्यकता केँ परिपूर्ति करैत समाज लेल किछु कय सकी तेहेन सामर्थ्यक विकास करू, हमर शुभकामना अछि। बीमारी आबय त ओकरो नीक दिशा मे परिणति दय समाज आ लोकहित मे अपन जीवन केँ अर्पित करू।
 
अस्तु!
 
हरिः हरः!!
पूर्वक लेख
बादक लेख

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