महादुर्गाक समष्टि एवं व्यष्टि उपासनाक पद्धतिः वैकृतिकं रहस्यम्

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नवम्बर १७, २०१७.

आध्यात्मिक परिचर्चाः वैकृतिकं रहस्यम्

ॐ श्री दुर्गायै नमः!!

आस्थावान् भक्त हेतु विगत किछु समय सँ आदिशक्ति जगदम्बाक विभिन्न स्वरूपक रहस्य आदिक बारे दुर्गा सप्तशतीक पूर्वार्घ मे उल्लेखित स्तोत्र सभक अनुवाद रखैत आबि रहल छी। वैकृितिकं रहस्यम् अन्तर्गत ऋषि द्वारा जिज्ञासू राजन सँ भगवतीक पूजाक विधान केर वर्णन कयल गेल अछि। 
 
इत्युक्तानि स्वरूपाणि मूर्तीनां तव पार्थिव।
उपासनं जगन्मातुः पृथगासां निशामय॥वैकृतिकं रहस्यम्-१७॥
महालक्ष्मीर्यदा पूज्या महाकाली सरस्वती।
दक्षिणोत्तरयोः पूज्ये पृष्ठतो मिथुनत्रयम्॥१८॥
विरञ्चिः स्वरया मध्ये रुद्रो गौर्या च दक्षिणे।
वामे लक्ष्म्या हृषीकेशः पुरतो देवतात्रयम्॥१९॥
अष्टादशभुजा मध्ये वामे चास्या दशानना।
दक्षिणेऽष्टभुजा लक्ष्मीर्महतीति समर्चयेत्॥२०॥
अष्टादशभुजा चैषा यदा पूज्या नराधिप।
दशानना चाष्टभूजा दक्षिणोत्तरयोस्तदा॥२१॥
कालमृत्यु च सम्पूज्यौ सर्वारिष्टप्रशान्तये।
यदा चाष्टभुजा पूज्या शुम्भासुरनिबर्हिणी॥२२॥
नवास्याः शक्तयः पूज्यास्तदा रुद्रविनायकौ।
नमो देव्या इति स्तोत्रैर्महालक्ष्मीं समर्चयेत्॥२३॥
अवतारत्रयार्चायां स्तोत्रमन्त्रास्तदाश्रयाः।
अष्टादशभुजा चैषा पूज्या महिषमर्दिनी॥२४॥
महालक्ष्मीर्महाकाली सैव प्रोक्ता सरस्वती।
ईश्वरी पुण्यपापानां सर्वलोकमहेश्वरी॥२५॥
महिषान्तकरी येन पूजिता स जगत्प्रभुः।
पूजयेज्जगतां धात्रीं चण्डिकां भक्तवत्सलाम्॥२६॥
अर्घ्यादिभिरलंकारैर्गन्धपुष्पैस्तथाक्षतैः।
धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्नानाभक्ष्यसमन्वितैः॥२७॥
रुधिराक्तेन बलिना मांसेन सुरया नृप।
(बलिमांसादिपूजेयं विप्रवर्ज्या मेरिता॥
तेषां किल सुरामांसैर्नोक्ता पूजा नृप क्वचित्।)
प्रणामाचमनीयेन चन्दनेन सुगन्धिना॥२८॥
सकर्पूरैश्च ताम्बूलैर्भक्तिभावसमन्वितैः।
वामभाऽग्रतो देव्याश्छिन्नशीर्षं महासुरम्॥२९॥
पूजयेन्महिषं येन प्राप्तं सायुज्यमीशया।
दक्षिणे पुरतः सिंहं समग्रं धर्ममीश्वरम्॥३०॥
वाहनं पूजयेद्देव्या धृतं येन चराचरम्।
कुर्याच्च स्तवनं धीमांस्तस्या एकाग्रमानसः॥३१॥
ततः कृताञ्जलिर्भूत्वा स्तुवीत चरितैरिमैः।
एकेन वा मध्यमेन नैकेनेतरयोरिह॥३२॥
चरितार्धं तु न जपेज्जपञ्छिद्रमवाप्नुयात्।
प्रदक्षिणानमस्कारान् कृत्वा मूर्ध्नि कृताञ्जलिः॥३३॥
क्षमापयेज्जगद्धात्रीं मुहुर्मुहुरतन्द्रितः।
प्रतिश्लोकं च जुहुयात्पायसं तिलसर्पिषा॥३४॥
जुहुयात्स्तोत्रमन्त्रैर्वा चण्डिकायै शुभं हविः।
भूयो नामपदैर्देवीं पूजयेत्सुसमाहितः॥३५॥
प्रयतः प्राञ्जलिः प्रह्वः प्रणम्यारोप्य चात्मनि।
सुचिरं भावयेदीशां चण्डिकां तन्मयो भवेत्॥३६॥
एवं यः पूजयेद्भक्त्या प्रत्यहं परमेश्वरीम्।
भुक्त्वा भोगान् यथाकामं देवीसायुज्यमाप्नुयात्॥३७॥
यो न पूजयते नित्यं चण्डिकां भक्तवत्सलाम्।
भस्मीकृत्यास्य पुण्यानि निर्दहेत्परमेश्वरीम्॥३८॥
तस्मात्पूजय भूपाल सर्वलोकमहेश्वरीम्।
यथोक्तेन विधानेन चण्डिकां सुखमाप्स्यसि॥३९॥
 
(इति वैकृतिकं रहस्यम् सम्पूर्णम्)
 
उपरोक्त समस्त श्लोक केर माध्यम सँ ऋषि जिज्ञासू राजन सँ वर्णन ई कय रहला अछि जे शक्ति – महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वतीक पूजा-आराधना कोन विधि सँ करी। एकर सम्पूर्ण अनुवाद काल्हि या क्रमशः राखब। ताबत धरि श्लोक केर एक-एक शब्द केँ बुझबाक प्रयास करू। मैथिली भाषाक अधिकांश शब्द स्वयं संस्कृत समान होयबाक कारणे ढंग सऽ सन्धि-विच्छेद करैत अर्थ बुझल जा सकैत छैक। आशा करैत छी जे गंभीर पाठक एहि समस्त स्वाध्यायांश सँ लाभ उठा रहल होयब।
 
हरिः हरः!!
ॐ श्री दुर्गायै नमः!!
 
पैछला दिन अपने वैकृतिकं रहस्यम् केर श्लोक १७ सँ आखिर ३९म धरि सिर्फ संस्कृत मे देखने-पढने रही। आइ, अनुवाद दिश चलीः
 
राजन! एहि तरहें अहाँ सँ महाकाली आदि तिनू मूर्तिक स्वरूप बतेलहुँ, आब जगन्माता महालक्ष्मीक तथा महाकाली आदि तिनू मूर्तिक पृथक्-पृथक् उपासना श्रवण करू।
 
जँ महालक्ष्मीक पूजा करबाक हो, त हुनका मध्य मे स्थापित कय केँ हुनकर दक्षिण (दाहिना भाग) तथा वाम भाग मे क्रमशः महाकाली आ महासरस्वती केर पूजन करक चाही आर पृष्ठभागमे तिनू युगल देवता लोकनिक पूजा करक चाही। महालक्ष्मीक ठीक पाछाँ मध्यभाग मे सरस्वतीक संग ब्रह्माजीक पूजा करू। हुनकर दक्षिण भाग मे गौरीक संग रुद्र केर पूजा करू तथा वामभाग मे लक्ष्मी सहित विष्णु भगवान् केर पूजा करू।
 
महालक्ष्मी आदि तिनू देवी केर समान निम्नाङ्कित तीन देवीक सेहो पूजा करक चाही। मध्यस्थ महालक्ष्मीक आगाँ मध्यभाग मे अठारह भुजा (हाथ) वाली महालक्ष्मीक पूजा करू। हुनकर वाम भाग मे दस मुख (मुंह) वाली महाकालीक तथा दक्षिण भाग मे आठ भुजा (हाथ) वाली महासरस्वतीक पूजा करू।
 
राजन! जखन केवल अठारह भुजावाली महालक्ष्मी अथवा दशमुखी कालीक या अष्टभुजा महासरस्वतीक पूजा करक हो, तखन सब अरिष्ट सभक शान्तिक लेल हिनक दक्षिणभाग मे कालक आर वामभाग मे मृत्युक सेहो भलीभाँति पूजा करक चाही।
 
जखन शुम्भासुरक संहार करयवाली अष्टभुजा देवीक पूजा करक हो, तखन हुनका संग हुनक नौ शक्तिक आर दक्षिणभाग मे रुद्र एवं वामभाग मे गणेशजीक सेहो पूजा करक चाही। (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती तथा चामुण्डा – यैह नौ शक्ति थिकीह।)
 
‘नमो देव्यै…’ आदि स्तोत्र सँ महालक्ष्मीक पूजा करक चाही। तथा हुनक तीन अवतारक पूजाक समय हुनकर चरित्र मे जे स्तोत्र आर मन्त्र आयल अछि, ताहि केर उपयोग करक चाही।
 
अठारह भुजावाली महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी टा विशेषरूप सँ पूजनीय छथि, कियैक तँ वैह महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती कहाएत छथि। वैह पुण्य पापक अधीश्वरी तथा सम्पूर्ण लोकक महेश्वरी थिकीह। जे महिषासुरक अन्त करयवाली महालक्ष्मीक भक्तिपूर्वक आराधना केलक अछि, वैह संसारक स्वामी थिक। तैँ जगत् केँ धारण करयवाली भक्तवत्सला भगवती चण्डिकाक अवश्य पूजा करक चाही।
 
अर्घ्य आदि सँ, आभूषण सँ, गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप तथा नाना प्रकारक भक्ष्य पदार्थ सँ युक्त नैवेद्य सँ, रक्तसिञ्चित बलि सँ, मांस सँ तथा मदिरा सँ सेहो देवीक पूजा होएत छन्हि। राजन! बलि आर मांस आदि सँ कयल जायवला पूजा ब्राह्मण केँ छोड़िकय कहल गेल अछि, हुनका लेल मांस आ मदिरा सँ पूजाक विधान कतहु नहि अछि।
 
प्रणाम, आचमनक योग्य जल, सुगन्धित चन्दन, कपूर तथा ताम्बूल आदि सामग्री सब केँ भक्तिभाव सँ निवेदन कय केँ देवीक पूजा करक चाही। देवी केर सोझाँ बायाँ भाग मे कटल मस्तकवाला महादैत्य महिषासुरक पूजा करक चाही, जे भगवतीक संग सायुज्य प्राप्त कय लेलक। ताहि तरहें देवीक सामने दक्षिण भाग मे हुनक वाहन सिंहक पूजा करक चाही, जे सम्पूर्ण धर्मक प्रतीक आ षड्विध ऐश्वर्य सँ युक्त अछि। वैह एहि चराचर जगत् केँ धारण कय केँ रखने अछि।
 
तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुष एकाग्रचित्र भऽ देवीक स्तुति करय। फेर हाथ जोड़िकय तिनू पूर्वोक्त चरित्र द्वारा भगवतीक स्तवन करय। जँ कियो एक्के गोट चरित्र सँ स्तुति करय चाहय त केवल मध्यम चरित्रक पाठ सँ कय लियय; मुदा प्रथम आर उत्तर चरित्र सँ एक टा केँ पाठ नहि करय। आधा चरित्रक सेहो पाठ करब मना अछि। जे आधा चरित्रक पाठ करैत अछि, ओकर पाठ सफल नहि होएत छैक। पाठ समाप्तिक बाद साधक प्रदक्षिणा आर नमस्कार करय तथा आलस्य छोड़िकय जगदम्बाक उद्देश्य मस्तकपर हाथ जोड़य आर हुनका सँ बेर-बेर त्रुटि या अपराधक लेल क्षमा-प्रार्थना करय। सप्तशतीक प्रत्येक श्लोक मन्त्ररूप अछि, ताहि सँ तिल आर घृत मिलल खीर केर आहुति दियय। अथवा सप्तशती मे जे स्तोत्र आयल अछि, ताहि केर मन्त्र सँ चण्डिकाक लेल पवित्र हविष्य सँ हवन करय। होमक पश्चात् एकाग्रचित्त भ महालक्ष्मी देवीक नाम-मन्त्रक उच्चारण करैत फेरो-फेरो हुनकर पूजा करय। तत्पश्चात् मन आर इन्द्रिय केँ वश मे राखैत हाथ जोड़ि विनीत भाव सँ देवी केँ प्रणाम करय आर अन्तःकरण मे स्थापित कय केँ ओहि सर्वेश्वरी चण्डिका देवी केर देर समय धरि चिन्तन करय। चिन्तन करैत-करैत हुनकहि मे तन्मय भऽ जाय। एहि तरहें जे मनुष्य प्रतिदिन भक्तिपूर्वक परमेश्वरीक पूजा करैत अछि, ओ मनोवाञ्छित भोग आदि केँ भोगिकय अन्त मे देवीक सायुज्य प्राप्त करैत अछि।
 
जे भक्तवत्सला चण्डीक प्रतिदिन पूजन नहि करैत अछि, भगवती परमेश्वरी ओकर पुण्य केँ जराकय भस्म कय दैत छथिन। तैैँ, हे राजन! अहाँ सर्वलोकमहेश्वरी चण्डिकाक शास्त्रोक्त विधि सँ पूजा करू। एहि सँ अहाँ केँ सुख प्राप्त होयत।
 
अस्तु!
 
पूर्वोक्त प्राकृतिक या प्राधानिक रहस्य मे कारणात्मक प्रकृतिभूता महालक्ष्मीक स्वरूप तथा अवतारक वर्णन कयल गेल छल। एहि प्रकरण मे विशेषरूप सँ प्रकृतिसहित विकृतिक ध्यान, पूजन, पूजनोपचार तथा पूजनक महिमाक वर्णन भेल अछि। तैँ एकरा वैकृतिकं रहस्यम् कहल गेल अछि। एहि मे सप्तशती मे पहिनहि वर्णित तीन चरित्र मे वर्णित महाकाली, महालक्ष्मी आ महासरस्वतीक ध्यानक वर्णन कयल गेल अछि; एतय महाकाली दशभुजा, महालक्ष्मी अष्टादशभुजा तथा महासरस्वती अष्टभुजा छथि।
 
हरिः हरः!!
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