महाकवि विद्यापति केर जनप्रिय बनबाक बहुत रास कारण – विचार

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विचार
– प्रवीण नारायण चौधरी

जन-जन मे प्रिय कवि – महाकवि कोकिल विद्यापति

बस दुइ दिन पूर्व कातिक मासक इजोरिया पक्ष केर त्रयोदशी तिथि बीतल – अपन मिथिलाक एक अमरतत्त्व विद्यापतिक अवसान दिवस – जेकरा सौंसे संसार मे ‘विद्यापति स्मृति दिवस’ केर रूप मे साहित्य, संस्कार, शिक्षा, समाज, मैथिल समुदायक पहिचानक वैशिष्ट्य आदि मे आस्था रखनिहार मनबैत आबि रहला अछि। धीरे-धीरे ई राष्ट्रीय पर्वक रूप मे मिथिला मे स्थापित होबय लागल अछि। कुटिल मनसा सँ भरल दुष्ट प्रकृतिक लोक द्वारा विद्यापति केँ सेहो ब्राह्मण जातिक बना वर्तमान ब्राह्मण विरोधक लहरिया युग मे एहि क्रम केँ अवरुद्ध करबाक कतेको कूचक्री खेलावेला सेहो करैत रहैत छथि, परञ्च जाहि महान विभूति पर स्वयं महादेवक कृपा बरसल हो आर जे अपना पास प्राप्त ओहि परमसत्ताधारीक महान कृपा केँ बिना कोनो लागलपेट समदृष्टि आ समान व्यवहार सँ आम जनहित बाँटि देलनि, तिनकर स्मृति या गान केँ भला ई छद्म-क्षुद्र दुष्ट प्रकृतिक दानवी मानव समुदाय कतेक काल रोकि सकैत अछि, ओ दिन-ब-दिन आरो प्रखर सूर्य जेकाँ लोकमानस मे अपन अमिट छाप केँ गहिंर बनौने जा रहल छथि।
 
महाकवि कोकिल विद्यापति – देसिल वयना सब जन मिट्ठा कहि ताहि युगक संस्कृत माध्यम मे शिक्षा आ संस्कार प्राप्तिक कठिनता केँ आत्मसात करैत अपन रचना मातृभाषा मैथिली मे सिर्फ एहि लेल आरम्भ केलनि जे उच्च वर्गक अलावो आम मैथिल जनमानस मे शिक्षा आ संस्कार केर सुन्दर प्रभाव पड़य। विद्यापति ओ पहिल क्रान्तिकारी भेलाह जे सर्वहारा वर्गक पिछड़ापण मे सुधार अनबाक लेल उचित शिक्षा आ संस्कार पेबाक चिन्तन कयलनि। यैह कारण छैक जे संस्कृत भाषा मे पठन-पाठन आ साहित्य परसबाक प्रचलन विरुद्ध जा ओ मातृभाषा मैथिली (ताहि समय अवहट्ट नाम लोकमानस मे बेसी प्रिय) मे रचना कार्य आरम्भ कयलनि। ताहि समयक राजाक दरबार मे प्रभावशाली भूमिका निर्वहन करैत अपन कर्तब्य समस्त प्रजाक हित लेल सोचब हुनकर महानताक स्पष्ट झलकबैत अछि। प्रजा मे आजुक जनप्रतिनिधिरूपी राजा सब जेकाँ वोटबैंक पोलिटिक्स केर फर्मूला पर कोनो जाति विशेष आ संख्याक आधार पर राजनीति करबाक काज जँ विद्यापति द्वारा कयल जाएत त ओ आइ कथमपि जनकवि रूप मे जन-जन केँ कंठ मे विराजमान नहि भऽ सकितैथ।
 
हुनकर लेखनीक विषय मे मुख्य रूप सँ भक्ति (भक्ति पक्ष – राधा-कृष्ण पर या गौरी-शंकर पर) चुनल गेल जे सर्वप्रिय – सभक हित मे रहल। मिथिलाक लोकाचार पर अनेकानेक रचना जे महिला, पुरुष – सब जाति-वर्गक लोक केँ कंठ मे बसि गेल। के नहि चाहैेत अछि जे अदृश्य शक्ति – यानि भगवानक कृपा हमरो भेटय, आर ताहि क्रम मे भजनक लोकप्रियता युगों-युगों सँ अपन मिथिला मे रहबे कयल अछि। यैह कारण सँ विद्यापतिक रचना मे भक्ति पक्ष मुख्य रहल जे हुनका जन-जन मे प्रिय बनबैत ‘जनकवि’ सेहो बनेलक। जनतारूपी जनार्दन जिनकर रचना आ प्रस्तुति सँ महोमहो होएत रहल तैँ विद्यापतिक आराध्यदेव हुनका संग अति साधारण जनताक रूप यानि सेवक उगना बनिकय रहय लगलाह। विद्यापतिक हृदय मे आमजन प्रति – सेवक जन प्रति कतेक सिनेह रहनि से उगना विलोपित भेलाक बाद हुनकर विलाप मे स्पष्ट भेल अछि। “उगना रे मोरा कतय गेलाह, कतय गेला सिव किदहु भेलाह” – हुनक ई रचना सँ स्पष्ट अछि जे उगनारूपी सेवक केँ ओ साक्षात् महादेव केर रूप मे देखलनि, हुनका हेरा गेलाक बाद ओ दर-दर भटकलाह। एहि रचना मे लिखने छथि – “नन्दन वन बीच भेटल महेस – गौरी मन हरखित मेटल कलेस” – एकर व्याख्या हमरा दृष्टि सँ बाबा बैद्यनाथ केर दर्शन सँ उगना केँ भेटबाक संकेत करैत एहि वास्ते गौरी केर हर्ष आ प्रसन्नता सँ भेटल प्रसाद कहिकय संबोधन कयने छथि। आर अन्तक जे पंक्ति अछि ओ स्पष्ट कहैत छैक – “भन विद्यापति उगना सँ काज – नहि हितकर मोरा त्रिभुवन राज” – मात्र आ मात्र उगना चाही, त्रिभुवनक राज सेहो बेकार अछि।
 
रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित विद्यापतिक जीवनी मे जे पढलहुँ ताहि सँ हुनकर राज्य प्रति ईमानदारिता, राजा प्रति समर्पण आ हुनकर यशगान मे वीररस केर विभिन्न रचनाक बात सेहो कयल गेल अछि। किंवदन्ति सब सुनला सँ स्पष्ट अछि जे राजधर्मक निर्वाह सेहो विद्यापति पूर्ण निष्ठाक संग कएलनि। कविक रूप मे बेसी प्रखर रहलाह ताहि सँ आइयो धरि जीबित छथि। सच छैक जे राजा आ राजधर्म निर्वाह कयनिहार युगों-युगों सँ होएत रहल छथि, लेकिन भाषा-साहित्य आ शिक्षा-संस्कार प्रति जे जागरुक बनि आमजन मे जागरुकताक प्रसार कएलनि ओ अमर भेलाह। बाकी जे एलाह से एलाह आ गेलाह। वर्तमान राजसत्ताक पोषक तत्त्व सब कोनो तरहें कुर्सी पेबाक संघर्ष करैत छथि, छल-बल-कल सभक प्रयोग करैत छथि। मुदा विश्वक अति प्राचीन भाषा आ संस्कृति लेल कहियो मुंह सँ बोली तक सदनक पटल मे नहि निकालि पबैत छथि। ईहो सब बहती गंगाक पानि जेकाँ अबैत छथि, जाएत छथि। मिथिलाक जनप्रतिनिधिक अस्तित्व जिबैत या मरलाक बाद केकर कतेक अछि से देखिये रहल छी। आयल पानि – गेल पानि – बाटहि बिलायल पानि! स्वराज्य मिथिला – जन-जन केर विकास – मिथिलाक अपन सरोकार – सब नदारद! कानि रहल अछि मिथिलाक समाज – कानि रहल अछि वैह पिछड़ा वर्ग आ दलित-महादलित आदि कहेनिहार आम जनता। ओ आइयो एतबे पाछाँ अछि जतेक दशकों पूर्व मे छल। शिक्षा आ संस्कार मे आइयो बाटक काते-काते पैखाना फिरेनिहारे वर्ग मे पड़ल अछि। शौचालयक वास्ते सरकारी खराती पाइयो उठा बाटक काते मे अपने आ धिया-पुता हगि रहल छैक। किताबक अक्षर कारी अक्षर भैंस बराबर आइयो छैक एहि वर्ग वास्ते। आइयो विद्यापति जेकाँ जन-जन मे शिक्षा आ संस्कार केर अलख जगेबाक लेल सपुतक आवश्यकता छैक।
 
निज विद्यापतिक डीह विस्फी मे विद्यापति सल्हेश दीना-भद्री स्मृति पर्व समारोह केर आयोजन भेल। सब साल होएत छैक। बहुत उपेक्षित अबस्था मे छैक कहाँ दिना – राज्य केर तरफ सँ जे पाइ-कौड़ी भेटलैक से त चपेलक ठीकेदार आ नेता-चमचा-बेलचा सब। बेचारा आम जनता केँ जगेनिहार कियो विद्यापति आइयो जन्म लितैथ तखनहि सही ढंग स सब केँ बुझा सकितैथ। लेकिन निराशाक बीच एकटा आशाक विन्दु सेहो देखा रहल अछि। एहि समारोह मे अग्रज भरत भूषण यादव सेहो पहुँचल छलाह। बचौल भाइ ओहि आसपास केर वासिन्दा छथि – ओहो छलाह। आचार्य किशोर नाथ झा केर बात सेहो सुनलहुँ। एक सँ बढिकय एक दिग्गज लोकनि पहुँचल छलाह। हमरा बुझल रहैत त जरुर प्रयास करितहुँ, मुदा भरत भूषण भाइ केर सम्बोधन सँ बहुत बात बुझय मे आयल जे ओ स्थान अत्यन्त उपेक्षित अछि। ठीक छैक – दहेज मुक्त मिथिलाक अभियान जे ‘उपेक्षित धरोहर केँ संरक्षण, संवर्धन आ प्रवर्धन करब’ एहि क्रम मे ऐगला कार्यक्रम ओतुक्के राखब। जय बाबा विद्यापति! हमर एहि लेख केर संग भरत भूषण भाइ केर ओ गरिमामय संबोधन सेहो लिंक मार्फत राखि रहल छी। हड़बड़ायल लोक लेल ई सब कदापि नहि छैक, आ नहिये बाटक काते-काते हगनिहार लेल। तैँ गंभीरतापूर्वक विचार कयनिहार मात्र ई सब पढी-बुझी-सुनी। आग्रह! ॐ तत्सत्!!
 
सुनू भरत भूषण यादवजी केर ई गरिमामय संबोधनः एखन धरि ७२५ लोक सुनलनि अछि, आर हमरा उम्मीद नहि विश्वास अछि जे आब ई हजारों-हजार लोक सुनता आ लाभ उठेता, स्वयं किछु करबाक लेल अपन जीवन केँ समर्पित करता।
 
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हरिः हरः!!
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