रक्षाबंधन लेल पूर्णिमाक दिन मात्र उचितः शास्त्रीय निर्णय पर विश्लेषण, ७ अगस्त केँ होयत पर्व

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विराटनगर, जुलाई २६, २०१७. मैथिली जिन्दाबाद!!

एहि बेर श्रावणी पूर्णिमाक दिन ग्रहण लागि रहल अछि आर एहि कारण पञ्चांग निर्णय मे रक्षाबन्धन मनेबाक तिथि पर विभिन्न विवेचना सँ विवादक स्थिति देखा रहल अछि। एहि सम्बन्ध मे विभिन्न आख्यान – तर्क आदि पर विवेचना करैत ई निर्णय मान्य भेल अछि जे रक्षाबन्धन मनेबाक लेल पूर्णिमाक बदला आन कोनो विकल्प नहि अछि। श्रावणी पूर्णिमा दिन अन्य शास्त्र-विहित ब्राह्मण कर्म हेतु विकल्पक सुझाव शास्त्र देने अछि, लेकिन रक्षाबन्धन सब जाति-वर्गक पाबनि होयबाक कारण सिर्फ पूर्णिमाक तिथि केँ मनेबाक विधान अछि। आउ देखी एक विश्लेषण विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित तथ्य अनुरूप।

रक्षाबंधन मनेबाक तिथि पर विवादक समाधान

नेपाल मे रक्षाबंधन कहिया मनायल जाय एहि विषय मे काफी विवादक स्थिति देखल जा रहल अछि। एक तरफ नेपाली पञ्चांग निर्णायक समिति द्वारा जारी कएल गेल एक विज्ञप्ति मार्फत सूचना देल गेल अछि जे पूर्णिमाक दिन जँ ग्रहण लगबाक दोष लागय त कोनो पूर्व निर्धारित शुभकार्य पूर्णिमाक बदला पञ्चमी तिथि केँ करब शास्त्रोक्त निर्णय अनुरूप बेस अछि। एहि सम्बन्ध मे सन्दर्भ दैत कहल गेल अछिः
 
संक्रान्ति ग्रहणं वापि पौर्णमास्यां यदा भवेत्।
उपाकृतिस्तु पञ्चम्यां कार्या वाजसनेयिभिः॥
 
– सत्कर्मरत्नावली
 
अर्थात् – श्रावण शुक्ल पूर्णिमा मे संक्राति पड़य आ कि ग्रहण पड़य त शुक्ल-यजुर्वेदक वाजसनेयी शाखी लोकनि उपाकर्म यानि गणस्नान, यज्ञोपवीत अभिमन्त्रण सम्बन्धी कृत्य सब श्रावण शुक्ल केर पञ्चमी तिथि केँ पूरा करैत छथि।
 
अर्धरात्राब्धस्ताच्चेत् संक्रान्तिर्ग्रहणं तदा।
उषाकर्म न कुर्वीत परतश्चेन्न दोषकृत्॥
 
– निर्णयसिन्धु
 
संक्रान्तिर्ग्रहणं वापि यदि पर्वणि जायते।
तन्मासे हस्तयुक्तायां पञ्चम्यां वा तदिष्यते॥
 
– निर्णयसिन्धु
 
अर्थात् पूर्वप्रसङ्गानुसार जँ श्रावण शुक्ल पूर्णिमाक दिन ग्रहण वा संक्रान्ति पड़ैछ त श्रावण महीनाक हस्तयुक्त शुक्ल पञ्चमी वा केवल श्रावण शुक्ल पञ्चमी मे श्रावणीकर्म केँ (हस्त नहियो पड़ला पर) पर्व मनेबाक चाही।
 
पौर्णमास्यां संक्रान्ति – ग्रहणमर्धरात्रदर्वाक् चेत् पञ्चम्यां पूजनं रक्षाबन्धन च कार्यम्।
 
– कृत्यवाटिका
 

एक अन्य मत अनुरूप

रक्षाबन्धन पुराण मे विधान कएल गेल अलगे कृत्य थिक। एहि रक्षाबन्धन-कृत्यक अधिकारि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सेहो अछि। ई दुइ कृत्य अलग-अलग स्वतन्त्र कृत्य थिक। ताहि हेतु एहि दुइ कर्म केँ आपसे मे कोनो लेना-देना नहि छैक। ताहि कारण निर्णय-सिन्धुकार केर अनुरूपः
 
इदं रक्षाबन्धनं नियतकालत्वाद् भद्रावर्ज्यग्रहणदिनेकपि कार्यं होलिकावत्, ग्रहसङ्क्रान्त्यादौ रक्षानिषेधाभावात् –
 
ई उपदेश केलनि अछि। (निर्णयसिन्धु, निर्णयसागरप्रेस, पञ्चम संस्करण, पृष्ठ ९४)।
 
एहि वाक्य-उपदेश अनुरूप रक्षाबन्धन नियतकाल मे होयबाक कारण होलिकापर्व मनेबाक जेकाँ भद्रा केँ छोड़ि ग्रहणक दिन मे सेहो ई कर्म करबाक चाही कहल गेल अछि। ग्रहण सङ्क्रान्ति आदि मे रक्षाबन्धन निषेध नहि कएल गेल अछि, ई स्पष्ट अछि।
 

धर्मसिन्धुमे सेहोः

रक्षाबन्धनमस्यामेव पूर्णिमायां भद्रारहितायां त्रिमुहुर्ताधिकोदयव्या-पिन्यामपराह्णे प्रदोषे वा कार्यम्।
इदं ग्रहणसङ्क्रान्तिदिनेकपि कर्तव्यम्॥
 
यैह बात कहल गेल अछि (धर्मसिन्धु, निर्णयसागरप्रेस, द्वितीयावृत्ति, पृष्ठ ५३)। एकरा मुताबिक सावनक पूर्णिमाक दिन रक्षाबन्धनक कर्म सम्पन्न करबाक चाही कहल गेल अछि। ग्रहण वा सङ्क्रान्ति केर दिन भेलाक बादो ई रक्षाबन्धनक कर्म कएला सँ हेतैक, ई शास्त्रविहित कहल गेल अछि। अतः रक्षाबन्धनक लेल पूर्णिमा मात्र नियत दिन थिक आर एकर कोनो विकल्प शास्त्र मे उल्लेख नहि अछि।
 

निर्णय

एहि तरहें यज्ञोपवीत धारण तथा रक्षाबन्धन एहि दुइ कार्य मे रक्षाबन्धनक लेल दिन परिवर्तनीय नहि देखाएछ, मुदा यज्ञोपवीत धारणक लेल विकल्प रहबाक बात स्पष्ट अछि। ताहि अनुसार उपाकर्म, ऋषितर्पणी तथा यज्ञोपवीत धारणक लेल शास्त्रक निर्देश अनुसार श्रावणशुक्ल पञ्चमी केँ करब उचित अछि, लेकिन रक्षाबन्धन लेल व्यावहारिक कारण सँ एकरा मे कोनो फेर-बदल करब उचित नहि देखाएछ। तखन नेपाल मे भ्रमक स्थिति सरकारी छुट्टी दुइ दिन अलग-अलग नहि देल जा सकबाक कारणे एकरा लेल एक्के गोट दिन निर्धारित करबाक स्थिति सँ भेल स्पष्ट अछि।
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