मैथिलीक आजुक टटका विशिष्ट रचना सबः कवित्रय विनोद, हरित ओ दिलीपक किछु रचना

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जुलाई २२, २०१७. मैथिली जिन्दाबाद!!

सन्दर्भः मैथिली साहित्यक वर्तमान

सोशल मीडिया मैथिली भाषा-साहित्य हेतु क्रान्ति अनबाक कार्य कय रहल अछि आर एहि मे शामिल छथि काल्हिक जन्मल बच्चा-कवि सँ युवाकवि एवं वयोवृद्ध कवि उदय चन्द्र झा विनोद धरि जे अपन सुन्दर-सुन्दर रचना सब फेसबुक केर माध्यम सँ हमरा अहाँक वास्ते पोस्ट करैत रहैत छथि। आइ टटका-टटकी तीन गोट कवि केर विशिष्ट रचना भोरे सँ तहलका मचा रहल अछि काव्य-संसार मे। आउ, देखी जे मैथिली समुद्र मे उठि रहल एहि ज्वार-भाटाक दिशा कोन दिशि पाठक आ समाज केँ लय जा रहल अछि।

१. श्री उदय चन्द्र झा ‘विनोद’ 

आयल छी त जायब निश्चित, तकरे नाँ संसार थिकै
जाधरि काया रहल कैल की, सैह जीवनक सार थिकै

सत्यक रक्षा केलिऐ कतबा, देलिऐ कतबा धर्मक ठाम
बनि निमित्त कतबा संपादन, काजक केलिऐ रामक नाम

माया मे कतबा बोहियलिऐ, कतबा राखल अपन ठेकान
चिन्तन मे जग रहल कते धरि, कतबा खायल गूआ पान

कतबा आनन मुस्की आनल, जीयब कते कैल आसान
कोना स्वयं के सार्थक केलिऐ, कतबा परक कैल कल्याण

कतबा मातु पिता के सेवा, राखल बन्धुक कतबा ध्यान
कतबा परम्परा मे जोडल, कतबा कैल शरक संधान

जीवन कते कमलवत जीलहुँ, तकरे लेखा तकरे मान
कर्मे बनबैए मनुक्ख के, राम कृष्ण सन कृपानिधान

२. श्री हरिश्चन्द्र हरित

कोना के रहतै गाम

बिठुआ जकर जते बिसबिस्सी
उरबिस्सी, काबिल भरि गाम ।
सुधबौका के अलग फँसाबय,
एखनो छथि शकुनी सन माम ॥
गाम कोनाके रहतै गाम ?

सदिखन करय कुचर्ये लोकक,
पाशा-पलथी चाह-दोकान ।
अनकर नीक चिड़ाइन गंध सन
थबकल नाकक पूड़ा जाम ॥
गाम कोनाके रहतै गाम ??

गोड़-नाड़, धोती-कुर्त्ता संग
धोधि फुलाबथि बिच्चे ठाम ।
धी-बेटीकेर रोच ने राखय,
पुरखारथ मे लिखबय नाम ॥
गाम कोनाके रहतै गाम ???

३. दिलीप झा

ललिता

नित्तह ठोर पर मुस्कीक संग
पाठशाला मे प्रवेश करैत अछि ललिता
हमर सहकर्मी/कर्मिणी लोकनि

एकर नामे चौवनिया मुस्कान रखने छथिन
ठीक नौ बजे पाकशाला मे प्रवेश करैत अछि
पजारैत अछि बड़का-बड़का चूल्हि
उतारैत अछि बड़का-बड़का हंडी, बरगुना
चारि सय सोलह चटियाक नित्य बनबैत अछि भानस
आ एकटा बिषाह सत्यक संग घर घुरैत अछि ललिता
पर्स टांगि जे अबैत छथि
लालिता के आदेश क’ चाह-पानि पिबैत छथि
अपन अधिकार लय बेर पर बजैत छथि
करैत छथि पढ़ौनी
पबैत छथि नित्तह भारतीय मुद्रा एक हजार
मुदा घर घुरैत काल ललिता
पबैया इकतालीस रुपैया छियासठि पाइ
ललिता! अहाँ नित्तह ऐना मुसकिआउ नहि
कहियो काल बाजू! जोर सँ बाजू
मृतसागर सँ स्नान क के आयल
लोक सभसँ बजबाक अपेक्षा जुनि करु
चिकरि-चिकरि कहियौ
जे हमरो जीबाक अछि अधिकार
कोन आधार पर द’ रहलै हमरा
एकतालिस टाका छियासठि पाइ
सेहो मानदेय बढलाक पछाति
ई सुशासन के सरकार।
पूर्वक लेख
बादक लेख

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