मिथिलाञ्चल का लोकपर्व मौनापञ्चमी एवं मधुश्रावणी  

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आलेख (हिन्दी)

– डा. रामसेवक झा

• मौनापंचमी – श्रावण कृष्णपक्ष, पंचमी तिथि, शुक्रवार,दिनांक- 14-07.2017
• मधुश्रावणी व्रतारम्भ – श्रावण कृष्णपक्ष, पंचमी तिथि, शुक्रवार, दिनांक- 14-07.2017
• मधुश्रावणी व्रत-पूजन व समाप्ति – श्रावण शुक्लपक्ष, तृतीया तिथि, बुधवार, दिनांक- 26-08.2017
• नागपंचमी – श्रावण शुक्लपक्ष, पंचमी तिथि, शुक्रवार, दिनांक- 28.08.2017
 नवविवाहिता सुहाग की रक्षा के लिए करती है पूजा ।
 सर्प के भय से मुक्ति के लिए होती है नागदेवता की पूजा
 मिथिला का आस्था व विश्वास का है यह त्योहार ।
 गोबर व मिट्टी से बने नाग की होती है पूजा ।
 मौना पंचमीके दिन संध्याकाल में अभिमंत्रित कर घर में मिट्टी और लावा की होती है छिड़काव ।
 13 दिनों तक होगी मधुश्रावणी तथा 15 दिनों तक होगी नाग की पूजा ।
 मौनापंचमी के दिन बनता है आँगन में मिट्टी की थुमहा ।
उत्सवप्रियता भारतीय जीवनकी प्रमुख विशेषता है । देश में समय-समय पर अनेक पर्वों एवं त्योहारों का भव्य आयोजन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । श्रावणमास के कृष्णपक्षकी पंचमी तिथि को मौनापंचमी त्योहार नागदेवताओं को समर्पित है । इस त्योहार पर व्रतपूर्वक नागों का अर्चन-पूजन किया जाता है । वेद एवं पुराणों में नागों का उद्गम महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू से माना जाता है । नागों का मूलस्थान पाताल लोक प्रसिद्ध है । पुराणों में नागलोक की राजधानी के रूप में भोगवतीपुरी विख्यात है । संस्कृतकथा-साहित्य में विशेषरूपसे ‘कथासरित्सागर’ नागलोक वहाँ के निवासियों की कथा से ओतप्रोत है । गरुड़पुराण, भविष्यपुराण, चरकसंहिता, सुश्रुत-संहिता, भावप्रकाश आदि विविध ग्रन्थों में नागसम्बन्धी विषयों का उल्लेख मिलता है । भगवान विष्णु की शय्या की शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं । शिव एवं गणेशजी के अलंकरण में नागों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है । पुराणों में भगवान् सूर्य के रथ में द्वादश नागों का उल्लेख मिलता है । भारतीय संस्कृति में देवरूप में नागदेवता स्वीकार किये गये हैं । हमारे ग्राम-नगर में ग्रामदेवता और लोकदेवता के रूप में नागदेवताओं के पूजास्थल हैं ।
मिथिलांचल में प्रसिद्ध 48 प्रकारके त्योहारों का विधान है। त्योहारों का प्रारम्भ श्रावणमास के कृष्णपक्षकी पंचमी तिथि से होता है । इस दिन सर्प की माता विषहारा ( मनसादेवी) का जन्मोत्सव मनाया जाता है । इस तिथि को प्रत्येक घरों में नागदेवताओं का पूजन-अर्चन विधि विधान के साथ किया जाता है । इस दिन हरेक परिवारों से मिट्टी की कलशा लेकर गाँव के प्रसिद्ध विषहारा स्थान जाते हैं । वहाँ दूध, लावा, दूध-दीपों से नागदेवताओं का पूजन कर वर्षभर नागविष और भय से रक्षा हेतु कामना करते हैं । एक परम्परा विशेष के तहत लोग इस दिन भोजन से पूर्व नीम के पत्ते व निम्बू खाने की प्रथा भी कहीं कहीं देखने को मिलती है । कहा जाता है कि एक बार मातृ-शापसे नागलोक जलने लगा । इस दाहपीडा की निवृत्ति के लिये इस तिथि को गो दुग्ध स्नान जहाँ नागों को शीतलता प्रदान करता है, वहीं भक्तों को सर्पभय से मुक्ति भी देता है ।
श्रावणमास के कृष्णपक्षकी पंचमी तिथि से ही नवविवाहिता स्त्रियाँ मधुश्रावणी पूजारम्भ करती है । यह पूजा लगातार तेरह दिनों तक चलती हुई श्रावणमास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को विशेष पूजा-अर्चना के साथ व्रत की समाप्ति करती है । इन दिनों नवविवाहिता स्त्रियाँ व्रत रखकर गणेश, चनाई, मिट्टी एवं गोबर से बने विषहारा एवं गौरी- शंकर का विशेष पूजा कर महिला पुरोहिताईन से कथा सुनती है । कथा का प्रारम्भ विषहरा के जन्म एवं राजा श्रीकर से होता है ।
इस व्रत के द्वारा स्त्रियाँ अखण्ड सौभाग्यवती के साथ पति की दीर्घायु होने की कामना करती है । व्रत के प्रारम्भ दिनों में ही नवविवाहिता स्त्रियों के ससुराल से पूरे तेरहों दिनों के व्रत की सामग्रियाँ तथा सूर्यास्त से पूर्व प्रतिदिन होने वाली भोजन सामग्रियाँ भी वहीं से आती है । शुरु व अन्तिम दिनों में व्रतियों द्वारा समाज व परिवार के लोगों में अंकुरी बाँटने की भी प्रथा देखने को मिलती है । प्रतिदिन पूजन के उपरान्त नवविवाहिता अपने सहेलियों के साथ गाँव के आसपास के मन्दिरों एवं बगीचों में फूल लोढ़ती हुई ब्रत का भरपूर आनन्द भी लेती है ।
मधुश्रावणी के दिन मिथिलांचल में जलते दीप के बाती से शरीर के कुछ स्थानों पर दागने की परम्परा भी वर्षों से चली आ रही हैं । अलबता जो भी हो मिथिलांचल की लोक आस्था का यह महापर्व बहुत ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है । 
इस दिन महिलाएं मिट्टी की थुमहा आँगन में बनाकर पूजा करती हैं तथा घर के प्रवेश द्वारा पर गोबर से विषहारा का भी निर्माण करने की प्रथा देखने को मिलती है । इसदिन मिट्टी व लावा पंडितों द्वारा अभिमंत्रित कर सभी लोग अपने घरों में संध्याकाल छीटते है । 
 

 

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