Ke Likhat Naatak – Pradeep Bihari

आलेख: के लिखत नाटक?

– प्रदीप बिहारी

सुप्रसिद्ध मैथिली नाटककार स्रष्टा - प्रदीप बिहारी

सुप्रसिद्ध मैथिली नाटककार स्रष्टा – प्रदीप बिहारी

मैथिलिए नहि भारतक आन-आन भाषा सभमे सेहो मौलिक नाटक लिखनिहार बड़ थोड़ अछि। एखनहुँ साहित्यक आन विधाक अपेक्षा नाटक लिखनिहारक संख्या कम अछि। नाटक लिखनिहारक संख्या कम होयब चिन्ताक विषय थिक। जँ संख्या आ अभिलेखक दृष्टिएँ देखल जाय तँ मैथिलीमे कम नाटक नहि लिखायल अछि, मुदा रंगमंचीय दृष्टिसँ बहुत रास नाट्य रचना फाइले धरि रहबा योग्य प्रतीत भेल अछि। ई गप्प बरोबरि होइत रहल अछि जे रंगमंचक लेल नाटक होअय वा नाटकक लेल रंगमंच? एहि पर बहुत रास चिन्ता कयल गेल अछि। हमरा जनैत ई चिन्ता काल सापेक्ष थिक। से जँ नहि, तँ ‘ध्रुवस्वामिनी’क मंचन एक समय एहि दुआरें नहि होइत रहल जे ई मंचीय नाटक नहि अछि, माने रंगमंचक दृष्टिकोणसँ नहि लिखल गेल अछि। मुदा हेबनिमे ‘ध्रुवस्वामिनी’क मंचन कतेक सफल मंचन भेल अछि। मैथिलीमे सेहो बहुत रास एहन नाट्य रचना अछि जकरा पर मंचीय नहि होयबाक मोहर लागि चुकल आ चौपेतल पड़ल अछि। ताहि समय रंगमंचक अपन सीमा रहैक। आइ रंगमंचक कैनवास बहुत विस्तृत भेलैक अछि। मैथिलीमे सेहो प्रतिभावान आ दृष्टिसम्पन्न रंगकर्मी छथि, जे एहि प्रकारक काज क’ सकैत छथि। पूर्व मे घोषित कतेको अमंचीय नाटकक मंचन भऽ रहल अछि।
मैथिलीमे मूल नाटक लिखनिहारक संख्या आंगुर पर गनल जाइ बला अछि। जे केओ अछियो, ताहिमे बड़ थोड़ एहन जे नाट्य-लेखनकेँ अपन लेखकीय प्रतिबद्धताक रूपमे स्वीकारने हो। मैथिलीमे साहित्यक आन विधाक अपेक्षा प्रत्येक बर्ख कतेक नाटकक पोथी अबैत अछि, तकर स्थिति देखने सहजहिं नाट्य-लेखनक दारिद्र्यक अनुमान लगाओल जा सकैत अछि। मौलिक नाट्य लेखनक अभाव कथा वा काव्य मंचनकें लोकप्रिय बनौलक अछि। मौलिक नाटक नहि लिखल जयबाक वा नाटककारक उदासीनताक कारण ताकल जायब आवश्यक सन भ’ गेल अछि। नाटककारकें नाट्य-लेखनक प्रति उदासीन होयबाक वा भ’ जयबाक लेल साहित्य आ रंगमंच दुनू उत्तरदायी अछि। जहिया किछु नाटककेँ मंचनक दृष्टिएँ ओकरा अनुपयोगी मानि लेल जाइत छल, ओहू समय नाटककार उदास होइत छल। आइ नाट्य-संस्थाक अभाव भेल जा रहल अछि। गाममे नाट्य-मंचनक परम्परामे दिनानुदिन ह्रास भ’ रहल अछि। गाम सभमे आब नाटक कम खेलल जाइत अछि। जाहि पाबनि-तिहार सभक अवसर पर नाटक खेलायल जाइत छल, ताहि पाबनि-तिहारमे आब भी.सी.आर. वा सी.डी. सँ बम्बैया फिलिम देखाओल जा रहल अछि। नाटककार एहूसँ उदासीन होइत छथि।

ओना ग्रामीण रंगमंचक ह्रासक आरो बहुत रास कारण भेल अछि। पारसी थियेटरक अवधारणासँ आधुनिक रंगमंचक अवतरण धरिक बहुत रास संदर्भ छैक, जे कारण बनल अछि। गामक बदलैत सामाजिक आ आर्थिक कारण सेहो एकटा कारण बनल अछि। शहरक चसक सेहो एकटा कारण कहल जा सकैत अछि, खाहे ओ स’खे होअय वा मजबुरिये। ओना, एहि विषय पर गप एत’ अभीष्ट नहि, तें एकरा एतहि छोड़ि नाट्य-लेखनक दायित्व पर चिन्तन करब बेसी समीचीन बुझाइत अछि।
नाटक लिखनिहारकेँ साहित्यक लोक रंगमंचक जीव मानैत अछि आ रंगमंचक लोक साहित्यकेँ। ई एकटा विचित्र विडम्बना थिक। नाटककार झिझिर कोना खेलाइत रहैत अछि। कोनो नाट्य कृति तखने पढ़ल जाइत अछि, जखन ओकर मंचनक प्रस्ताव होइत छैैक। कथा-कविता जकाँ नाटक आइयो नहि पढ़ल जाइत छैक। नाटककारकेँ नहिये साहित्य दिससँ समुचित प्रोत्साहन भेटैत छनि आ न रंगमंच दिससँ। रंगमंचक आजुक स्थिति तँ ई बनि गेल अछि जे ओ (रंगमंच) कोनो नाटकक प्रदर्शन क’ ओहि नाटककार पर उपकार करैत अछि।
एहि संदर्भमे हम हिन्दीक कथाकार-नाटककार सुरेन्द्र वर्माक चर्च करब उचित बुझैत छी। ‘मुझे चाँद चाहिए’सँ जतेक प्रशस्ति/लोकप्रियता सुरेन्द्र वर्माकें भेटलनि, ताहिसँ पूर्व करीब बारह गोट नाटक लिखलो सँ नहि भेटि सकलनि। जखन कि नाटककें लोकसँ जुड़बाक सोझ विधा मानल जा रहल अछि।
हमरा लगैछ जे एहि हेतु हमरा लोकनिक आलोचना पद्धति सेहो कम दोषी नहि अछि। आलेचना-कर्ममे जे नामवरी लोक लागल अछि, जानि नहि किएक ओ लोकनि नाटकक आलोचना/समीक्षाकेँ महत्वपूर्ण बात नहि मानि रहल अछि। या तँ ओ नाट्य-लेखनकेँ दोसर-तेसर क्लासक लेखन मानैत अछि या नाट्यालोचना हेतु अपेक्षित नाटक आ रंगमंचक दृष्टि स्वयंमे नहि पबैत अछि वा आलोचनाक नामवरी रैंकक टाॅप टेनमे अपन स्थान एकाध पौदान घुसकैत देखैत अछि। दोसर पीढ़ीक जे आलोचनाकर्मी अछि, ओकर कहब होइत अछि जे हमर बात के मानत? हम टाॅप टेनमे कतहु रहबह, तखन ने किछु क’ सकबह, भाइ नाटककार! पहिने तँ हमरा टाॅप टेनमे न पठाबह। विचित्र भयाओन स्थितिक बीच जीबि रहल अछि नाटककार। ओ मात्र साहित्यिक भयावहताक बीच नहि जीबैत अछि, मंचीय भयावहता सेहो ओकर स्थितिकें दारुण बनबैत छैक।

 

नाट्य-शास्त्रमे भरत नाटकक पहिल तत्व ‘वस्तु’कें मानैत अछि। ‘वस्तु’ माने भेल कथा-वस्तु। नाटकक कथा-वस्तु आ नाट्यालेख नाटककार गढ़ैत-बुनैत अछि। थियेटरमे नाटककारकेँ महत्वपूर्ण स्थान देल जयबाक चाही। थियेटरक बारेमे आइ एकटा प्रश्न बरोबरि उठाओल जयबाक चाही जे थियेटर ककर? नाटककारक, कि निर्देशकक, कि अभिनेताक, कि नेपथ्यक रंगकर्मीक आकि सभक? समकालीन थियेटर पर नजरि खिरौने तँ साफे झलकैत अछि जे थियेटर आर ककरहु नहि, मात्र निर्देशकक थिक। ओना आजुक बदलैत समयमे थियेटर जाहि तरहें अपन फ्रेमकेँ तोड़ैत नजरि आबि रहल अछि, ताहिसँ लगैछ जे थियेटर आब निर्देशकक हाथसँ बहार भ’ डिजाइनरक आँगुरमे जा रहल अछि। एहना स्थितिमे, थियेटरमे नाटककारकेँ ताकब बड़ जरूरी बात बुझल जयबाक चाही।

 

आइ ओही नाटककारक नाटकक मंचन भ’ रहल अछि जे कोनो-ने-कोनो रंगमंचीय संस्थासँ जुड़ल हो वा कोनो-ने-कोनो निर्देशकक प्रिय पात्र बनल हो वा स्वयं अपन नाट्य-संस्था चला रहल हो। थियेटर आइ जाहि नाटकक मंचन क’ रहल अछि, तकर नाट्य-वस्तु प्रेक्षागृहमे दर्शक धरि अबैत-अबैत नामे लेल नाटककारक रहि जाइत अछि। वस्तु निर्देशकक भ’ जाइत छैक। निर्देशक जेना चाहैत अछि, प्रस्तुत करैत अछि। भले कथाक आत्मा वा लेखकक आत्माकेँ जे कचोट हो! बहुधा ई देखल जाइत अछि जे, जे नाटककार निर्देशकक संग अपन बात मनयबाक जोर दैत अछि, ओकरा पर रंग-दृष्टिक अभावक मोहर लगैत छैक वा अगिला बेरसँ ओकर नाटकक मंचन होयब बन्न भ’ जाइत छैक। तेँ नाट्य लेखनक स्वरूप नाटककारक अनुसारें नहि, निर्देशकक अनुसारें निर्धारित होम’ लागल अछि आ नाटककार ‘फरमाइसी’ नाट्य-लेखन शुरूह क’ रहल अछि।
बिहाड़िक दिशामे पीठ कयनिहार नाटककार फरमाइसी लिखब प्रारंभ करैत अछि। बिहाड़िक विपरीत छाती रखनिहार नाटककार एहि दंशकें भोगैत-भोगैत अपन विधा बदलि लैत अछि। रचनाकर्म तँ स्वान्तः सुखाय लेल सेहो छैक। दोसर गप ई जे आन-आन विधामे एहिसँ कम्मे मेहनतिमे लोकप्रियता आ स्थापत्य भेटि जाइत छैक। कोनो जरूरी छैक जे नाटके लिखथि?

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