Maithili Jindabaad Kona

मैथिली हरदम जिंदाबाद अछि आ रहबो करत

पंकज कुमार झा, मैथिली जिंदाबाद

ई शब्द केँ अगर हम शास्वत आ सनातन कही तँ कोनो अतिश्योक्ति नहि होयत. सब सँ पहिने मिथिला आ मैथिली शब्द केर गप्प करी तँ ई शब्दे अपना आपमे चीरंजीविताक प्रतीक अछि. रामायण केर एक कथाक अनुसार ओए समय मे मिथिलाक राजा निमि छलाह जिनका एक ऋषिक शापक कारण प्राण त्यागय पड़ल छलनि. फेर उत्तराधिकार केँ संकट उपस्थित भेला उपरान्त एहेन मान्यता अछि जे राजाक शरीरकेँ मथि कय एकटा नव व्यक्ति केर जन्म भेल जिनक नाम मंथन के कारण मिथि पड़ल आ ओ राजा फेर मिथिलाक राज-काज सम्हारलाह. कहल इहो जाइत अछि जे फेर राजा निमि केँ ई वरदान भेटलनि जे ओ मनुक्खक निमेष मे निवास करताह. हुनके ओतय निवासरत हेबाक कारण हम सब अपन पलक दिन भरि झपकाबैत रहैत छी. गोस्वामी तुलसीदास जी एकर बड्ड नीक वर्णन केलाह अछि मानस केर फुलवारी प्रसंग मे. प्रसंग अछि जे फुलवारी मे भगवान् राम आ जगज्जननी मैथिलीक आँखि मिलिलनि. आ दुनु गोटे एक दोसरा केँ अपलक देखिते रहि गेलाह. ‘जीमि निमि तज़े दिगंचल’ एकर व्याख्या एना कयल गेल जे चुँकि नातिन आ जमाय केर ई पहिल मिलनक अवसर छल तैँ हुनका दुनू केँ आपस मे भेट होइत केना देखि सकैत छलाह, हुनक पूर्वज तऽ कनेकाल लेल निमि दुनू गोटेक आँखि सँ बाहर भऽ गेलाह. तैँ दुआरे दुनूक पलक झपकेनाई असंभव भऽ गेलनि. कहबी अछि जे जतय नहि जाइथ रवि, ततय पहुँचथि कवि. से सच बात जे हो मुदा उपरोक्त सुन्दर उद्धरण द्वारा हम सब अपन सुन्दर, सुरेबगर आ मीठगर-रसगर संस्कृति सँ परिचित त भैये सकैत छी.

देखि सकैत छी जे केहेन आमोद सेहो भरल रहल अछि अपना सभक माइट-पाइन मे. कहबाक तात्पर्य ई जे उत्थान आर पतन केँ हम सभ एकहि दृष्टि सँ देखबाक परंपराक लोक रहलौँ अछि. अनेक झंझावतक बावजूद अगर हम सब फेर-फेर उठि केँ ठाढ़ भऽ जाइत छी त एहि लेल जे अपन मृत शरीर सँ सेहो नव पल्लव जेकाँ अंकुरित होयबाक सामर्थ्य हमरा सभ मे विद्यमान अछि. मिस्र केर एकटा फिनिक्स पक्षी बारे सहिये कहल जाइत अछि जे ओ अपनहि छाउर सँ बेर-बेर जनम लैत अछि. अपना ओतुका खजन-चिरैयाक बारे भैरसक सेहो ई गप्प कहल जाइत अछि, मुदा मानव शरीर सँ सेहो मृत्युक बाद उठि कय एहि तरहेँ ठाढ़ भऽ जेबाक शायद एक्कहि टा उदाहरण अपनहि सबहक अछि. तऽ ओहि मैथिल परंपरा सँ निकलल हम सब, ओहेन निमि सनक पुरखाक वंशज हमरा सभ केँ अपना भीतर कोनो तरहक दयनियता केँ आबय देबाक कोन प्रयोजन?

निश्चित हमर सबहक मिथिला आ मैथिली जिंदाबाद छल, अछि आ रहत. अधजल गगरी जेकाँ छलकैत किछु बेसी पढ़ल लोक सभकेँ अवश्य कतेको बेर ई बुझना जाइत छनि जे अहाँ अगर मैथिलीक गप्प करैत छी तऽ एकर अर्थ अछि जे अहां अप्पन राजभाषाक विरोध कय रहल छी. मुदा एहेन लोक सभ केँ ई नै बुझल छनि जे भाषा विमर्श मे सेहो हम सभ अपना केँ कृष्ण जेकाँ बुझैत छी जिनका देवकी आ जशोदाक रूप मे दू टा माय छलनि आ जतबे हुनका देवकीनंदन केर नाम सुनि कय आनंद भेटैत छलनि ओहिना जशोदानंदन कहेनाइ ओतबे पियरगर छलनि.

जाहि राष्ट्रवादक हम सभ गप्प करैत छी ओकर मूल यैह अछि जे अहां अगर अपना मायकेँ सम्मान देब तखनहि अप्पन मौसी आ नानी केँ सेहो सम्मान दऽ सकैत छी. एना नै होइत छै जे मौसी आ नानी केँ तऽ बहुत सम्मान दी अहाँ आ अप्पन माइये केँ बिसरि जाइ. अहिना आधुनिक भारत मे राष्ट्रवाद केर प्रखर अध्येता पंडित दीनदयाल उपाध्याय केर कहब छलनि जे अप्पन राष्ट्र आ संस्कृति तहने मजगूत होयत जहन क्षेत्रीय संस्कृति सभ केँ प्रश्रय भेटनाइ शुरू होयत. एहि अर्थ मे जय मैथिली कहबाक यैह अभिप्राय होइत अछि जे जय हिन्दी आ जय भारत सेहो हम संगे कहि रहल छी. ओहुना संस्कृति एहेन वस्तु नहि जेकरा कागज़ पर रेखा खीँचि कय अहां बदलि सकैत छी. ओ सनातन परंपरा सँ निकलल, युगों-युगोँ सँ निर्मित होइत वास्तु होइत अछि. आई अप्पन मिथिला भले भारत आ नेपाल दू टा प्रशासनिक इकाइ मे बंटल हो मुदा संस्कृति हमर सबहक एक्के अछि. हम सब एक्के छी. तऽ खूब मोन सँ, खूब जोर सँ, पूरा ताकत सँ जय मिथिला, जय मैथिली कहू. भरोसा राखू , जखन-जखन अहाँ माँ मिथिलाक स्मरण करब तखन-तखन अपने-आप ओकर अभिप्राय जय भारत भऽ जायत. आ अगर अहां नेपाल में छी त ओकरे मतलब जय नेपाल सेहो होयत. त हम सब अप्पन सांस्कृतिक विरासत, बाप-पुरखा केर थातीक प्रति गौरव सँ भरल रही. चाहे जाहि कोनो क्षेत्र मे रही ओतय एहेन काज करी जाहि सँ अप्पन सबहक पुरा गौरव आरो उद्दीप्त आ जग्जियार हो यैह प्रार्थना अहाँ लोकनि सँ. जय मां मिथिला- जय माँ मैथिली.

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