गीताः कर्मयोग आर सर्वोत्तम अभीष्ट पर श्रीकृष्णक स्पष्टोक्ति

गीताक तेसर बेरुक स्वाध्याय

(निरंतरता मे – भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा सांख्य योग यानि जीव-जीवात्मा केर परिचय आदिक ज्ञानोपदेश करैत जीवलोक मे स्वधर्म प्रति जिम्मेवारी बोध करैत बंधनहीन कर्म करबाक निर्देशनक संग आब ‘योग’ केर ज्ञान देबाक बात कहलैन। कर्म योग केर ज्ञान भेला सँ कर्मबन्धन सँ मुक्ति भेटैत छैक, संगहि कोनो अधूरा प्रयास सेहो व्यर्थ नहि जाएछ आ नहिये तेकरा सँ कोनो बिपरीत परिणाम भेटैछ, बरु कनेकबो योगरूपी धर्म केर अनुकरण सँ भयंकर भय पर्यन्त सँ मुक्ति भेटैत छैक। आब श्लोक ४१ – दोसर अध्याय सँ….)

krishna arjun mahabharatॐ श्री परमात्मने नमः!!

भगवान् केँ हर रूप मे बेर-बेर प्रणाम – प्रणाम यानि अपना केँ सदिखन शरण मे सौंपनाय!! आत्माक सुरक्षा सदैव परमात्माक पास होयत, हम वैह परमात्माक शरण मे अपना केँ अर्पण करी।

योगक ज्ञानोपदेश सँ पहिले पहिल दुइ बात यानि कर्मबन्धन सँ मुक्ति आर अधूरा प्रयास ब्यर्थ नहि होयब तथा ओकरा सँ कोनो बिपरीत परिणाम नहि भेटबाक बात उपरान्त भगवान् फेर तेसर बात कहैत छथि,

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥४१॥

कुरुनन्दन! इह व्यवसायात्मिका बुद्धिः एका (एव) अव्यवसायिनाम् बुद्धयः हि बहुशाखाः च अनन्ताः।

“हे कुरुनन्दन! एहि मे सुनिश्चित निश्चय (व्यवसायात्मिका बुद्धि – एक टा निश्चित विन्दु पर कार्य पूरा करबाक निश्चितता) रहैछ। जखन कि अनिर्णीत केर उद्देश्य असंख्य आर बहुशाखीय (बहुते दिशा मे) होइत छैक।”

टिप्पणीकार स्वामी स्वरूपानन्द अपन टीका मे लिखैत छथि जे कर्मयोग मे एकमात्र लक्ष्य ‘आत्मज्ञान’ केर प्राप्ति रहैत छैक। जखन कि अन्य जे एकटा सुनिश्चित मार्ग नहि अपनबैत अछि, ओकर उद्देश्य विभिन्न तुच्छ आदर्श सँ प्रभावित विभिन्न प्रकारक होइत छैक, कियैक तऽ ओकर अपनहि निर्णय कालान्तर मे ओकरा अपने असंतोष दैत छैक। यैह कारण ओ बहुशाखीय यानि एकटा योजना सँ दोसर योजनाक तरफ डेग बढबैत रहैत अछि। अंग्रेजी मे एहेन अनिर्णीत केँ ‘रोलिंग स्टोन’ कहि सकैत छी, तऽ हम एहेन लोक केँ ‘छीटखोपड़ी’ नाम धरैत छी। ओ अपनहि घोषणा सँ अपने मुकरैत अछि, फँगैत अछि आ दिमाग छीट-छीट-छिटकैत रहबाक कारण मैथिली मे छीटखोपड़ी कहैत छी।

भगवान् आगाँ कहैत छथि, “वेदवाद मे मग्न भेल आर दोसर किछु अछिये नहि से कहि बहस करनिहार (अर्थात् स्वर्ग मात्र केँ परम स्थान माननिहार), अविवेकी लोक, फूल जेहेन सोहायवला आर रमणीय वाणी बाजयवाला, कामनायुक्त, स्वर्ग केँ खाली सर्वश्रेष्ठ मानयवला लोक, भोग आर ऐश्वर्य केर प्राप्तिक लेल, जन्म-कर्म तथा फल देबयवाला, अनेक प्रकारक क्रिया आदिक वर्णन करयवाला वाणी बजैत अछि, (एहि तरहें) भोग तथा ऐश्वर्य मे आसक्त चित्तवाला आर ओहने कामनाबुद्धि द्वारा मोहित भेल लोकक अंतःकरण मे आत्मतत्त्वक निश्चयवाली बुद्धि उत्पन्न नहि होइछ।”

एतय श्लोक ४२ सँ ४४ धरिक बात केँ एना बुझला सँ आरो स्पष्ट होयतः

भगवान् पहिने कहला जे कर्मयोग मे मात्र आत्मज्ञानक प्राप्ति लेल कर्म करब सुनिश्चित रहैछ, आन बहुशाखी होइछ। तेकरे निरंतरता मे रखैत ओ फेर कहैत छथि जेः

“हे पार्थ! व्यवसायात्मिका बुद्धि एहेन लोक केर मोन मे आबिये नहि सकैछ (१) जे भोग (सुख) आर ऐश्वर्य (राज्य, शक्ति, आदि) लेल आतुर (अतिशय लोभमे) रहैछ, (२) जेकर बुद्धि-विवेक कोनो अज्ञानीक फूल समान सोहनगर बोल मे मोहित भेल हो, (३) जे अनेक इच्छा सँ भरल मात्र स्वर्ग टा केँ अन्तिम लक्ष्य मानैत हो, (४) जे वेद द्वारा वर्णित फलप्राप्ति निमित्त कर्मकांड-अनुष्ठान आदि मे बेसी लागैत हो, आर ई कहय जे एहि सँ अतिरिक्त आर दोसर किछु होइते नहि छैक; एहेन लोकक सोहनगर बोल-वचनक संग वैह सदैव ओहि विशेष कार्य सब मे लागैछ जाहि सँ भोग आर ऐश्वर्यक प्राप्ति भऽ सकय आर जेकर परिणामस्वरूप ओकर अपूर्ण इच्छाक पूरा करबाक लेल ओकरा फेर सँ जन्म लेबय पड़ैछ।”

एकटा छोट पाँति मे एकरा हम एना बुझैत छी, “अनन्त इच्छा रहला सँ व्यवसायात्मिका बुद्धि यानि आत्मज्ञानक प्राप्ति संभव नहि अछि।” भगवान् निर्णीत स्वर मे आ खूब फैरछाकय १, २, ३ आ ४ विन्दु सँ ओहेन लोकक पहिचानक संग ढेर रास इच्छा रखनिहार केँ सेहो एहि योग्य नहि मानलनि अछि।

“वेद त्रिगुण विषय केर वर्णन करैत अछि। एहि सँ मुक्त होउ हे अर्जुन। निर्द्वन्द्व – एक-दोसरक बिपरीत भाव राखयवाला अवस्था सँ मुक्त होउ। नित्यसत्त्वस्थ – सदिखन सुनियंत्रित बनू। निर्योगक्षेम – प्राप्ति करब आ जोगाकय राखब यानि योगक्षेम सँ मुक्त होउ। आत्मवान् – अपना आप मे अपन मूल तत्त्वक संग रहू।”

एतय कर्मयोग लेल निहित आदेश अछि। निर्द्वंद्व, नित्यसत्त्वस्थ, निर्योगक्षेम आर आत्मवान् – चारू अवस्था केँ हम सब धारण करी। भगवानक एक-एक बात एहि किछेक श्लोक द्वारा हमरा सब लेल अत्यन्त मननीय अछि।

“एक ब्राह्मण जे आत्मवान् होइछ – जेकरा मे अपन सत्य अस्तित्व केर जानय योग्य ज्ञान छैक – तेकरा लेल समस्त वेदक ओतबे महत्व छैक जतेक बाढिक समय सौंसे जले-जल भेला पर कोनो एक पोखरि केर होइत छैक।”

जखन अर्जुन सँ आत्मवान् बनबाक लेल भगवान् पूर्वहि मे कहि देलनि, ताहू सँ पूर्व वेद द्वारा वर्णित फलदायी कर्मकाण्ड मे पड़निहार लेल बेर-बेर जन्म लेबाक बात सेहो कहलैन, तखन एतय आत्मवान् ब्राह्मणक उदाहरण दैत वेद केर महत्व कतेक अछि से भगवान् स्पष्ट केलनि अछि। अर्थात् मनुष्य केँ कर्म करबाक लेल निज पहिचान कोन रूप मे करबाक चाही, अभीष्ट कि मानबाक चाही से प्रस्तुत परिस्थिति अर्जुन संग आ हुनका द्वारा कैल गेल व्यवहार अनुरूप बुझल जा सकैत अछि।

आइ, एतहि विराम देब! मनन करय योग्य बहुत बात एतबे ६ टा श्लोक मे देखा रहल अछि। हम सब मिथिलाक थिकहुँ। विदेहक संतान! मुदा कर्मकाण्डक भयावह रूप सँ हमहुँ सब आक्रान्त छी। एतय वेद विरोधक बात भगवान् नहि केलनि अछि, बल्कि अतिवाद आर ओकरे टा सर्वश्रेष्ठ मानि उच्चतम् प्रक्रिया सँ वंचित रहबाक बात केँ ओ अप्रत्यक्ष रूप मे वेदक उदाहरण दैत कटलैन अछि। वेद बहुत बात सुस्पष्ट ढंग सँ कहैत अछि। वेद एकटा विज्ञान थीक जे मनुष्य जीवन सँ जुड़ल हरेक पक्ष पर बात रखैत अछि। ओहि मे जीवन कोना चलाबी, कोन अवसर पर केहन कर्म करी, फेर कोन विध आ कोन विधान… विभिन्न बात केँ खोंइचा छोड़ाकय कहल गेल अछि। लेकिन एतय तऽ अन्तिम युद्ध मे कायरता वा अकर्म सँ उठल प्रश्न छैक, ताहि जगह वेदक उपमा कोन तरहक संकल्प ग्रहण करबाक वास्ते भगवान् कहि रहला अछि ई बुझब जरुरी अछि।

अस्तु!

हरिः हरः!!

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One Response to गीताः कर्मयोग आर सर्वोत्तम अभीष्ट पर श्रीकृष्णक स्पष्टोक्ति

  1. Bhut sundar

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