मैथिली कथा: भैंसूरक घोघ आ भाभौक योग

कथा

– प्रवीण नारायण चौधरी

भैंसुर केर घोघ, भाभौक योग!!

भारतीय नारीक सुन्दरता निज-सांस्कृतिक परिधान मे विश्व-प्रशंसनीय छैक, मुदा वर्तमान युग कतहु न कतहु एकर सीमा केँ लाँघि अपन सांस्कृतिक पहिरन केँ नकारि रहल अछि। – कथाक सार छैक: अपन पारिवारिक संस्कार आ मर्यादाक निर्वहन जरुर हो!

राम कुमार भैयाक आइ गाम सँ दिल्ली अयला १५ दिन सँ बेसी भऽ गेल छलन्हि। श्याम कुमार हुनक छोट भाइ दिल्लिये मे रहैत छल। ओतहि छोट-छिन काज पकड़ि लेने छल। बाबुक मरलाक बाद श्याम कुमार केँ गाम छोड़य पड़ि गेल छलैक। बाबुक अमलियत मे ५-१० कट्ठा भरनावला जमीन सेहो रहिते टा छलैक। बँटाइ सेहो गोटेक बिग्घा करैत छला हूलन मंडल। परिवार बड प्रसन्न रहैत छल। सब हटिया अबेर सांझ खिन धरि कसरर वालीक कचरी आ आलू चप सेहो खूब बिकाइत छलैक। हाटक दिन हुलन सेहो नियम सँ घरवालीकेँ सहयोग लेल कचरिये दोकान पर समय दैत छलाह। दुनू बेक्कति परिवार केँ सब दिन सब तरहक खुशी देबा मे कमी नहि रखैत छलाह। लेकिन अचानक कोन पपियाहा रोग हुलन मंडल केर प्राण पखेड़ू उड़ा देलकैक आ दुनू भाइ ताहि समय धरि स्कूलो नहि पास केने छल से बापक मरलाक बाद बेलल्ला बनि गेल छल। माय सेहो बापक गेलाक बाद बेसीकाल गंभीर आ चुप्प रहबाक बीमारी सँ ग्रस्त भऽ गेल छल, जखन-तखन दुनू बेटाक मुँह देखय आ कि हाक्रोश पारि ओकर बापकेँ याद करैत अहुँरिया काटि-काटि कानय लागैत छल। केकरो जमीन भरना रखनिहार हुलनक परिवार बड कमजोर भऽ गेलैक। खेती-पाती करय योग्य ई दुनू भाइ नहि छलैक जे सम्हारि लितय… तथापि मायकेँ बोल-भरोस दैत बड़का यानि राम कुमार खूब मेहनति करैत छोटका केँ पढेबाक वचन देलकैक। सबटा भरनावला खेत सब धीरे-धीरे मुदा छूटि गेलैक आ बँटाइवला सब सेहो धियापुताक भरोसे कि उपजा होयत से सोचि खेत आपस लऽ लेलकैक। जेना-तेना बापेक जमा केलहा पूँजी पर राम कुमार अपन छोटका श्याम कुमार केँ खूब पढेबाक सपना देखय। खेतो नहि बचि गेलैक तऽ आनक खेत पर हर जोतबा सँ लैत आन-आन बोनि-मजदूरी करय आ माय संग हाट पर कचरी बेचबाक कार्य सेहो करय। श्याम कुमार आब दिल्ली मे रहैत छल, ओतहि एकटा गार्मेन्ट मे क्वालिटी चेकर केर कार्य करैत छल।

हाले श्याम कुमार अपना पसिनक एकटा कनियां सँ दिल्लिये मे बियाह-दान ठीक कय माय आ भाय केँ ओतहि बजाकय कमे-समे खर्च मे बियाह कय लेलक। दिल्लीक सासूर सँ वर-विदाई सेहो कोनो खास नहि भेटलैक, कारण छलैक जे परदेश मे लोक कोना गुजर-वसर करैत अछि आ कोना बेटीक बियाह ई दु:ख तिनू माय-पुत केँ बुझल छलैक आ एको बेर अपन कुटुम्ब लग मुहो नहि अलगेने छल। गरीबीक दु:सह दिन देखने ई परिवार बस कनियां पढल-लिखल छथि से सोचि कुटुम्ब केँ नहि कोनो माँग केलक, नहिये कोनो बेसी खर्च करबाक आग्रह केलक, बस संछिप्त विवाह कय कनियां केँ घर आनि लेलक। राम कुमारक बियाह मे सेहो किछु एहने तरहक त्याग सँ घर मे पुतोहु अनने छल ओकर माय। श्याम कुमारक बियाह दिल्ली मे हेतैक ताहि मे अयबा-जयबा मे बड खर्च भऽ जेतैक से सोचिकय राम कुमार अपन कनियों केँ दिल्ली नहि अनने छल। करीब १५ दिन धरि मायक संग भायक बियाह आ द्विरागमन उपरान्त भाभौ केर व्यवहारिकता आदि देखि गाम आ शहर मे अन्तर होइत छैक तेहने-तेहने बात सब सोचैत गुमशुम एतेक समय बितौने छल राम कुमार।

मायक आदेश भेलैक जे “बौआ, आर जे होइ, चले गाम आ गामक देवी-देवता आ बड़-बुजुर्ग सब सँ आशीर्वाद लऽ के फेर नोकरी पर आबि जइहें।” श्याम कुमार सेहो सहर्ष एहि बात केँ मानि गेल। अपन कनियां केँ सेहो बियाहक बाद जे लोक हनिमून मनबैत छैक तेहने तरहक आनन्द लेल गामे जायब ठीक होयत से बुझा कय तैयार कय लेलक। राम कुमार माय केँ परोछ मे बजाकय कहलकैक, “देख माय! एतय ई दिल्लीवाली कोना रहैत छथिन से बात अलग भेलैक। मुदा गाम मे एना… नहि माय… नहि! कने तोंहीं बुझा दहीन। कनियों केँ आ बौआ केँ सेहो।” माय मुस्कियाइत कहलकैक, “जाय न दहीन! शहरक कनियां थिकैक। लाज-धाख कम होइत छैक। ई सब कहियो गाम मे नहि रहलैक तांइ नहि बुझैत छैक। हम बुझा देबैक।” राम कुमार चैनक साँस लेलक।

श्याम कुमार कोनो संगी सँ किछु पाइ पैंच-तैंच कय गाम आपसी लेल टिकटक जोगार लगा लेलक। गाम मे जायत तऽ समाज केँ सेहो बियाहक भोज खुआबऽ पड़तैक। बाबुक दोस-महिम आरो बेसी छैक। सौजनियो करत तऽ पाँच मोंन चाउर रान्हय पड़तैक। एक्के गो तरकारी बनतैक, मुदा दही-चीनी तऽ चाहबे करी। सबटा फिरिस्त तिनू माय-बापुत मिलिकय बना लेलक। अपना हाथ पर पाइ कमे छलैक। बियाहो मे कनियां लेल कपड़ा-गहना मे अपने खर्च केने छल। तैँ नियारलक जे चल गाम मे सुइद पर किछु पाइ उठाकय ई अनिवार्य व्यवहार पूरा कय लेब। राम कुमार कहलकैक जे “कनियां केँ बुझा दहुन जे गाम मे एना उदाम नहि रहती, लाज-प्रथा बड पैघ बात होइत छैक। हिनका चलते हमरे उनटा लाज होइत अछि। भैर दिन गमछा ओढने रहैत छी। नहि जानि केहेन जमाना आबि गेलैक।” श्याम कुमार हँसैत भैयाक सीधापन केँ जबाब देलकैक, “जाय न दहक! तहूँ कतेक ई सब सोचैत छहक। आब जमाना से छैक। गामो मे बड़का-बड़काक पुतोहु सब केँ नहि देखैत छहक, कोना मेक्सी पहिरने दरबज्जा पर घूमैत रहैत छैक।” राम कुमार कहलकैक, “गोली मारे एहन बड़का लोक केँ! हम से सब नहि जनैत छी। हम हुलन मंडल सन जोगीक बेटा छी। माय हमर भैर जिनगी त्याग-तपस्या केलक। अपना घर मे ई बड़का-फरका के नकल नहि होउक।” श्याम कुमार हँसैत कहलकैक जे “ठीक छैक! हम बुलोरानी केँ बुझा देबैन। तों चिन्ता नहि करह। गमछा लऽ कय तोरा मुह नहि झाँपय पड़तह।” माय दुनु भांइ केँ लाज आ पारिवारिक संस्कारक बात प्रति संवेदनशील देखि अपन मन मे संतोष केलक जे बेटा सब भगवान् राम-लक्ष्मण सनक देलनि, नहि जानि आब पुतोहु सब कोना निभेती।

आब श्याम कुमार कनियां केँ कोना बुझेलक से नहि जानि, जखन सब कियो ट्रेन मे बैसय लेल गेल, ओतय लोकल डिब्बा मे लोकक ठेलम-ठेल वला अवस्था आ ओतहु कनियां द्वारा भड़काउ कपड़ा पहिरब देखि राम कुमार तामशे पित्त छल। माय तऽ गाय छलीह। हुनका लेल धैन सन। राम कुमार फेर सँ अपन गमछा निकालि अपने मुह झाँपि लेलक। न देखब, न बिगड़ब, सोचिकय भैंसुर केर मर्यादा अनुरूप भाभौ सँ पर्दा करबाक लेल अपने मुँह झाँपि लेलक। एक-दू टा स्टेशन निकललाक बाद लोकलज्जा आ पुरुषक व्यवहार, एहि द्वंद्व मे फँसल राम कुमार आइ नव जमाना मे नारीक स्थान पुरुषक लाज सँ मानवीय व्यवहार केँ निर्वाह करबाक मर्यादा निभा रहल अछि से सोचि रहल छल। ओकर दिल्लीवाली भाभौ पर एहि सब बातक कोनो प्रभाव नहि पड़ि रहल छलैक। ओ उनटे अपन पति सँ पूछय जे, “भैया को क्या हुआ? ये यूँ अपने चेहरे को क्यूँ ढँककर बैठे हुए हैं?” श्याम केँ हँसी लगैक, माय सेहो हँसैक, मुदा राम कुमार धीरे सँ जबाब देलकैक, “नहि-नहि! कनेक मोन घूमय लगलैन। तही द्वारा आँखि झँपने छी।” ओ मोने-मन सोचलक जे अपने इज्जत बचाउ तही मे कल्याण अछि। आधुनिकताक दौड़ मे पुरुखे यदि घोघ तानय तऽ कोन हर्ज छैक!

(गाम गेलाक बाद कि सब भेलैक, से बाद मे).

हरि: हर:!!

पूर्वक लेख
बादक लेख

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