तेज काकी (हास्य कथा)

कथा

– दीपिका झा

एकटा काकी छली। ओ स्वभाव स कनी तेज छलखिन। एक दिन हुनकर घरक बगल में एकटा दुल्हा बाली काकी रहै छलखिन। ओ अंगना एलखिन आ कहलखिन –
“बहिन यै! यै बड़ सुन्दर रमलिला होइ छै, फल्ला चिल्ला जाइ छै। ईहो चलती?”
“गे माय, हम कोना जैब? हम सैं-बेटा तर में छी। एहेन फूजल ऊक नै छी। आ अहां जे जेबै से अहांके घरबला के डर नै अइ? (हुनकर वर बड तमसाह छलखिन)
“यै बहिन, भानस-भात क सबके खुआ देबै, आ जहन सब सुइत रहतै त चुपचाप चैल जेबै आ पह फटै स पहिने घर आइब जेबै। हम काल्हियो त अहिना केने रहियै, कहां बुझलखिन।”
“बड़ नीक, त अहां जाऊ।”
आब राइत में जहन दलान पर दुल्हा बाली के वर एलखिन घूर तापै त ई काकी के नै रहल गेलैन। ई कहलखिन हुनका सँ –
“ऐँ यौ बौआ? अहां नै जाई छी रमलिला देख?”
“ओह! नै!”
“अहांके आंगनबाली त जाइ छैथ”
“नहि! ई संभव नै।”
“जा! तहन आइ राइत में देखियौ अहां।”
राइत भेल। दुल्हा बाली के घरबला गब्दी मारने पड़ल छलैथ। जाइते पकैड़ लेलखिन। बड मारि मारलखिन।
भोरे-भोर दुल्हा बाली दुआरि धेने कनैत।
ओ काकी के बेटा देखलखिन त पुछलखिन…..।
“की भेल काकी? अहां हमरा अंगना में कियै कनैत ठार छी?”
ओ सबटा बात कहलखिन।
“बेटा माय केँ बजेलैथ पुरवासय लेल।
“माय, सत सत कह! तू काका के कहलहीं कि नै?”
माय – “रे बौआ! एक आखर हमरा बजा गेल, आब ओइ लेल जे कहबैं से कह।”😁
बेटा कहलखिन
“गे माय! एके आखर में एते क लेलैं त दोसर कि करितैं बाजि क?”
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