दहेज प्रथा और मैं – एक जरूरी हिन्दी लेख

लेख

– प्रवीण नारायण चौधरी

दहेज प्रथा और मैं

 
एक लेख हिन्दी में – उनलोगों के लिये जो अक्सर हिन्दी ही लिखते रहते हैं, हिन्दी लिखने-पढने में सहजता की बातें करते हैं…! लेख की ओर बढें…. आप भी अपना विचार जरूर लिखेंगे, अनुरोध है।
 
अक्सर देखने में आया है कि ‘दहेज प्रथा’ के सम्बन्ध में और विशेष तौर पर मिथिला के सन्दर्भ में लोग ‘यह कभी संभव नहीं है कि मिथिला दहेज मुक्त हो जाये’, ‘दहेज का अन्त कभी संभव नहीं’, आदि कहते हैं। मेरा मानना है कि ऐसा कहना कहनेवालों की अपनी दृष्टिदोष है।
 
समाज में कई सारे गाँवों में मैं लोगों से मिला, उनसे दहेज प्रथा की जरूरत और व्यवहारिकता के ऊपर सकारात्मक चर्चा किया। कई लोगों ने माना कि दहेज प्रथा उनके बेटे-बेटियों के शादी का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, दहेज के कारण ही शादी तय हो पाता है, शादी के बाद भी जिन्दगी में कोई गिला-शिकवा या एक-दूसरे से नाराजगी-असन्तोष नहीं रहता, अतः यह जरूरी है कि दहेज लेन-देन करके ही शादी करायें। उनलोगों ने साथ ही यह भी माना कि दहेज लेन-देन औकात के अनुसार ही करना चाहिये। बेटीवाले अपनी बेटियों को जितना दे सकते हैं उतना मांगनेवालों के घर ही बेटियों की विदाई करें। चूँकि समाज में दहेज प्रथा धीरे-धीरे व्यवहारिक खर्चों को पूरा करने का रिसोर्स (साधन) बन चुका है, साध्य है विवाह एवं परिवार-गृहस्थी बसाना… तो इस मानसिकता से घिरे लोगों में दहेज प्रथा स्वाभाविक रूप से ‘मान्य और जरूरी’ प्रथा के तौर पर स्थापित है, स्थापित हो जाता है। कुछ लोगों ने प्रथा की बुराई करते हुए और दहेज निर्धारण में आनेवाली कई समस्याओं, ऊपर-नीचे की वाकयाओं और उसके कारण दहेज कम-बेसी होने के कारण घरेलू हिन्सा, दहेज हत्या आदि की बातें करके इसे बद से बदतर प्रथा यानि ‘कुप्रथा’ भी माना। अतः समाज में हम दोनों तरह के लोगों को सहज ही पा जाते हैं, एक समर्थन और दूसरा विपक्ष।
 
अब सवाल है कि समर्थन और विपक्ष के अपने-अपने तर्क रहते हुए भी मेरा अपना विचार क्या है? मैं इस प्रथा को किस तरह से देखता हूँ? मेरे समझ में यह प्रथा है या कुप्रथा है?
 
यदि मैं अपनी दृष्टि साफ रखता हूँ और अपना कार्य करने के लिये संकल्प लेता हूँ तो यह प्रथा-कुप्रथा दोनों नहीं है, अर्थात् दहेज नाम या परिकल्पना ही गलत है, मुझको ऐसा लगता है। मैंने लोगों से कहा – यदि मैं बेटी का शादी करूँ या बेटा का, शादी करने में जो खर्च होंगे वह मेरी भी जिम्मेदारी है। चूँकि मैं सामाजिक प्राणी हूँ, समाज में विद्यमान कुछ नियम-कायदे और सामाजिक रीति-रिवाज हैं जिन्हें मुझको भी पूरा करना है, अतः शादी पर आनेवाली खर्च को मैं खुद का कर्तव्य मानता हूँ। बेटी की शादी में दूल्हा व दूल्हा का परिवार पसन्द आ जाने पर उनसे वैवाहिक प्रस्ताव रखकर शादी के लिये उनकी इच्छाओं का जानना भी मेरा कर्तव्य है। मैं जरूर पूछूँगा कि आपलोग हमारे घर शादी करेंगे तो इसके लिये मेरे ऊपर क्या भार देना चाहेंगे और मैं किस योग्य हूँ यह भी खुलकर कहूँगा। इस प्रकार राजी-खुशी हम दो परिवार आपस में समन्वय करके सभी रस्मों-रिवाजों को पूरा कर सम्बन्ध स्थापित करूँगा। मेरा बेटी और समधी के बेटे के बीच रिश्ता बनेगा, ईश्वर की कृपा से वो लोग मानवीय संसार में चार-चाँद लगायेंगे एक पति-पत्नी-परिवार बनकर। उनसे सुहृदजनों-सन्ततियों का आना हो यह भी ईश्वर से प्रार्थना करूँगा। शादीका सर्वथा यही अर्थ है मेरे दृष्टि में। बेटे की शादी में भी कन्यापक्ष के प्रस्ताव व उनकी आर्थिक अवस्था के मुताबिक उनके द्वारा किये जानेवाले खर्च और मेरे योग्य जो भी खर्चे होंगे, हम दो परिवार मिलकर करेंगे। इस तरह जो शादियाँ होंगी वह ‘दहेज मुक्त’ कहलायेगा। हमारी यही परिकल्पना दहेज मुक्त मिथिला का है। आवश्यक खर्चे पूरा करने के लिये मैं दहेज गिनूँ, या दहेज मांगूँ यह मेरे योग्य कथमपि नहीं है।
 
समाज के लोगों में मैंने मिश्रित प्रतिक्रिया देखा। लोगों ने मेरे बातों को आदर्श के तौर पर तो लिया परन्तु फिर भी उन्होंने मेरे जैसा सभी नहीं हैं, सभी के अपने विचार होते हैं, आदर्श के नाम पर बाद में काफी तरह का लोभ और मांग, उलाहना-उपराग आदि का वातावरण बनता है और सम्बन्ध मधुर होने के बदले तीखा बन जाता है। कई सारे तर्कों से मुझे दुबारा उन्हीं के विचारों के जैसे ढुलमुल बनाने पर अमादा दिखे। मैं समझ गया। दहेज के विषय में कई भ्रान्तियाँ हैं हमारे समाज में। कोई इसको सम्बन्ध तय करने का समुचित माध्यम – विवाह की मानक – मानदंड मानते हैं, कोई इसे पापमय व्यवहार मानते हैं। निरपेक्ष सोच रखनेवाले इसको कुछ भी नहीं मानते हैं, परन्तु अपनी जिम्मेदारी समझकर बेटी-बेटा का शादी करना धर्म-कर्तव्य जरूर मानते हैं। मैंने आगे और भी कई तर्क दिया परन्तु बात वहीं पर अटकी रही। लोगों को समझा पाना मेरे वश में नहीं है ऐसा सोचकर मैंने अपने आपको समझाया – तुम खुद अपने तक सीमित रहो, संसार स्वतः तुम्हें अपने जैसे दिखेगी… अन्यथा तुम भटकते रह जाओगे, तर्कों के संसार में गोता लगाते रहोगे, अन्त कहीं नहीं मिलेगा। और फिर क्या था! मुझे मेरे जीवन के लिये ‘दहेज मुक्त मिथिला’ मिल गया। आज कई वर्षों से मैं अपने इसी आदर्शों पर खुद को दहेज मुक्त मानता हूँ, मेरे परिवार के सारे लोग मेरे जैसे ही हैं संयोगवश… और यही कृपा भी है ईश्वर का। हमलोग अपनी जिम्मेदारी से मतलब रखकर स्वच्छता ‍- स्वेच्छाचारिता को ही दहेज मुक्त मानते हैं।
 
अभी-अभी ‘दहेज मुक्त मिथिला’ समूह पर एक भाईसाहब ने हिन्दी में वही बात कही – ‘यह असम्भव है, बहुत समय लगेगा… क्या-क्या’। मैंने उनको जो जवाब लिखा है शायद आपलोग भी सहमत होंगे –
 
“हमें केवल खुद को बदल लेना है सर। बाकी मिथिलांचल शीघ्र बदला नजर आयेगा। जबतक हम नहीं बदलते हैं, हम हारे हुए मानसिकता के कारण खुद ही सारा संसार में दोष देखते हैं। यह हमारी अपनी दृष्टिदोष है। मैं यह सामाजिक शोध के आधार पर कह रहा हूँ। आशा है इसे समझेंगे।”
 
आपलोगों से भी आशा है कि उपरोक्त लेख को समझेंगे! शुभकामना सभी के जीवन को ईश्वर सफल बनावें।
 
हरिः एव हरः!!
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