आ नर्क बनि गेल स्वर्ग (उपदेशप्रद कथा)

एक संयुक्त परिवार केर बात छी। एक सम्पन्न दम्पति केर पांच गो बेटा आ दुइ गो बेटी रहनि। बेटा पांचों के विवाह भ गेल रहय, बेटी दुनू कुमाइर रहथि। छोटका बेटा के विवाह हालहि भेल रहय, कनियाँ के दुइरागमन बाकिये रहय। घरक पुरुष सब काज धंधा में लागल रहैत छल आर स्त्रीगण लोकनि घर मे विभिन्न प्रकार केर विवाद में घर केँ नर्क बनेने छलीह। ओ लोकनि घरक काज करय में पर्यन्त ओ करती त ओ करती जेहेन ओदौद में फँसल सदिखन एक दोसर केँ नीचाँ देखेबाक काज करैत छलीह। एहि बीच छोटका बेटाक कनियाँ दुइरागमन भ सासुर एलीह आ एतुका वातावरण देखि ओ क्षुब्ध भ गेलीह। अत्यंत निराश भ ओ अपन रूम में असगर में खूब कनलिह, बेर बेर अपन इष्टदेव केँ कहथि जे हे भगवान हमरा केहेन भाग्य देलहुँ जे एहेन सासुर भेटल, जतय ईर्ष्या, डाह आ इरबाजी में सब फँसल सदिखन हन हन पट पट में लागल अछि। हुनका कनिते कनिते आँखि लागि गेलन्हि। ताबत हुनका एना बुझेलनि जे हुनकर इष्टदेव हुनका सँ कहलखिन्ह जे अहाँ चिन्ता जुनि करू, अहाँक जानि बुझिकय एतय पठेलहुँ अछि, अहाँक जरूरत छैक एहि परिवार में। एतबा सुनैत ओ कनियाँ सुरफुरा कय उठलीह। हुनकर मन मे रहल कष्ट खत्म भ गेलन्हि। ओ अपन इष्टदेव केर बात पर भरोसा करैत ठानि लेलन्हि जे एहि परिवार में हुनकर कि काज छन्हि।

भोरे उठलीह त अपन सब सँ पैघ दियादनी समक्ष जा कय बजलीह, दीदी हम अहाँ सँ एक खास बात करय लेल आयल छी। हमरा बुझल अछि जे आइ खाना बनेबाक पार अहाँक अछि से हम माँगय लेल आयल छी। दियादनी कहलखिन्ह जे नहि नहि बहिन, एखन अहाँ नवकनियाँ छी, हँसय-खेलाय के समय थिक, हमर काज हमहीं करब, एकर चिन्ता अहाँ छोड़ू। मुदा छोटकी कनियाँ ततेक जिद्द कयलखिन जे अन्त में हुनका अपन काजक भार छोड़य पड़लन्हि। तहिना दोसर दिन ओ दोसर दियादनी सँ सेहो हुनकर काजक पार अपना ऊपर लय लेलीह, तेसर आ चारिम दिनक सेहो अपना पर लैत दिनका भोजन वैह बनाबय लगलथि। सब दियादनी छगुनता में छलीह। सासु, ननदि सभक जिम्मेदारी सेहो ओ कनियाँ अपना ऊपर लय लेलीह। धीरे-धीरे दिनक खाना पकेबाक भार वैह लय लेलीह। आब त घरक झंझटि ओहिना आधा भ गेल छल। एम्हर सब केँ भोजन करेलाक बाद ओ स्वयं भोजन करथि, कनिकबो थकान नहि होइन्ह, आत्मसंतुष्टि सँ खूब प्रसन्न रहल करथि छोटकी। हुनकर फुर्ती सँ काज करब, स्वादिष्ट भोजन बनायब, बाते बाते में सब काज निबटारा करब, ई सब देखि पूरा परिवार मन्त्रमुग्ध छल।

एक दिन सासु एहि छोटकी पुतोहु सँ एना सभक हिस्सा केर काज अपना ऊपर लेबाक कोन जरूरी से पोल्हा कय पुछलखिन्ह त ओ कहलखिन्ह जे हमर माता पिता हमरा यैह सिखेलथि जे शरीर त एक दिन माटि में मिलि जायत, एकरा तेँ बेसी सँ बेसी दोसरक सेवा में लगाउ। यैह एकर सही उपयोग होइछ। सेवा मात्र सब सँ पैघ धन थिकैक। अहाँ सेहो हमरा एहि तरहें उत्साहवर्धन करू हम प्रार्थना करैत छी। घरक काज में भोजन बनेनाय बहुत पैघ धर्म केर काज होइत छैक, एहि सँ आत्मकल्याण होयत हमर। मनुष्य जीवन मे जे आत्मकल्याण लेल जागरूक नहि होइत अछि तेकर जीवन व्यर्थ भ जाइत छैक। हुनकर सासु केँ ई बात हृदय केँ छुबि देलकन्हि। हुनका एना बुझेलन्हि जे ई कोनो देवी छी, मनुष्य त एहेन सुन्दर भाव केर भ नहि सकैत अछि।

दोसर दिन ससुर जी हरेक पुतोहु सब केँ वर्ष भरि लेल 12-12 गो साड़ी आनि देलखिन्ह। छोटकी अपन हिस्सा के सबटा साड़ी अपन जेठ दियादनी, सासु आ ननदि केँ बाँटि देलक। कहलकैक जे हमरा पास नैहर सँ देल बहुत रास साड़ी ओहिना पड़ल अछि, हमर काज ओतबे सँ निकलि जायत। कृपया अहाँ 2 टा साड़ी राखि लिय दीदी। सब दियादनी केँ 2-2 गो, सासु केँ सेहो 2 गो आ ननदि सब केँ 1-1 गो साड़ी बाँटि देलक छोटकी। ओकर एहि तरहक आदर आ उदारता सब पर बहुत गहींर प्रभाव देलकैक। सासु फेर पुछलखिन्ह कारण त कनियाँ कहलखिन्ह कि हम अहु काज में अहाँक मदद आ प्रोत्साहन चाहैत छी माँ, शरीर जेकाँ ई वस्त्र सभ सेहो क्षणभंगुर अछि। एकर संग्रह आत्मकल्याण में बाधक होइछ। एहि में मोह आ फाँस भेला सँ मोन एहि में लटकल रहि जाइत अछि, मरय बेर में सेहो जँ मन एहि में लटकल रहि गेल त फेर प्रेत योनि में भटकब तय बुझू। सेवाक कार्य मे लगेनाय मात्र एकर सही आ सर्वोत्तम उपयोग थिक। नहि त एक दिन ई सब एहिना रखले राखल चौपट भ जायत। सासु हुनकर बात सुनिकय मन्त्रमुग्ध भ गेलीह। पुतोहु केर खूब प्रशंसा करय लगलीह।

एम्हर घर मे पाय सेहो बढ़ि गेल, ससुर जी फेर सब पुतोहु लेल 6-6 गो गहना बनबा देलखिन्ह। छोटकी पुतोहु फेर अपन हिस्सा केर गहना अपन जेठ दियादनी आ दुनू ननदि सब केँ बाँटि देलक। अपना लेल एकहु टा नहि राखलक। पुछला पर कहि देलकैक जे हमर पिताजी के देल पर्याप्त गहना ओहिना पड़ल अछि, एतेक फाजिल गहना राखिकय ओ कि करत। बरु सेवा में लगेला सँ ओकरा आत्मसंतुष्टि भेटल। एहि तरहें छोटकी कनियाँ केर साधु व्यवहार सँ सब कियो अत्यधिक संतुष्ट आ प्रसन्न रहय। सभक मोन में ओकरा प्रति लगाव आ हृदय में स्थान स्वाभाविक रूप सँ बनि गेल छलैक।

एक दिन छोटकी अपन जेठ दियादनी सँ हुनकर रातुक खाना बनेबाक जिम्मेदारी अपना पर लेबाक मांग करैत सासु देखलीह त ओ पूछि बैसलीह जे ई कि कहि रहली अछि। पता चलल जे आब रातुक भोजन बनेबाक जिम्मेदारी सेहो ओ अपना पर लेबय चाहि रहल अछि तखन सासु हँसिकय बजलीह, अहाँ सब अपन छोटकी दियादनी सँ सावधान रहू, ई अहाँ सब सँ वास्तविक लाभ केर ठके चाहैत अछि। बड़की पुतोहु हुनका पर बजैत कहलखिन्ह जे ई अहाँ कि कहि रहल छी, ई त साध्वी समान पवित्र आ निश्छल अछि, ई भला केकरो सँ कियैक ठकत किछु। त सासु हुनका बुझेलखिन, अहाँ बात नहि बुझलहुँ, ई हमरा सभक सेवा कय केँ, हमरा सभ केँ गहना-कपड़ा जेहेन तुच्छ वस्तु सभ दय केँ ओकर बदला में तप आ आध्यात्मिक कमाइ जे आत्मोद्धार में सहायक होइछ से हमरा सभ सँ छीनि रहल छथि। एहि सँ बढिकय दोसर कोन ठकनाय हेतैक? ई हमरा एक दिन कहने रहथि जे दोसरक सेवा सँ अन्तःकरण शुद्ध भ आत्मकल्याण लेल समर्थ भ जाइत अछि। ईहो कहने रहथि जे शुद्ध भाव सँ भोजन बनेला सँ एक्के वर्ष में कल्याण भ जायत। तेँ, कनियाँ! सांझुक भोजन बनेबाक पार हम अपना जिम्मा लेब। हमरो त आत्मकल्याण करक अछि। हमहीं एहि सँ वंचित कियैक रहू?

सासुक बात सुनिकय सभक आँखि खुजि गेलनि। आब त सब केँ अपन कल्याण केर चिन्ता होबय लगलन्हि। कतय सब गोटे काज करय में आलस करथि, आब सब कियो अपन अपन जिम्मेदारी दिनको भोजन वला वापस लय लेलीह। जतय काजक कारण आपस मे झगड़ा भेल करय ततय आब सब कियो बड़ा उत्साह सँ अपन अपन भागक काज करय लगलथि। छोटकी कनियाँ केर उपाय प्रभावकारी भ गेल।

आब छोटकी देखलथि जे खाना बनेबाक भार हमरा नहि देती त ओ सेवा करबाक दोसर उपाय तकलीह। घर मे रोज 8-10 सेर आंटा केर खर्चा छलैक, सबटा बाजार सँ कीनिकय आनल जाए, एहि सँ त नीक जे रोज भोरे उठिकय अपने गहूँम पीसि ली। एकर कय टा लाभ छैक। बाजार के आंटा में गहूँम संग घुन सेहो पीसल रहैत छैक, माटि सेहो मिलल रहैत छैक, फेर मशीनक चक्की में पीसेला सँ ओकर सारतत्त्व सेहो मारल जाइछ, से स्वास्थ्य लेल हानिकारक सेहो होइछ… आब अपन आत्मकल्याण वास्ते छोटकी यैह काज करबाक सोच बनेलीह। तुरन्त ई बात अपन पति संग शेयर कयलीह। गहूँम के व्यवस्था हाथोंहाथ भेल। बाजार सँ आंटा कीनब बन्द भ गेल। पहिल दिन गहूँम केँ धो कय सुखा देल गेल। ऐगला दिन भोरे आंटा तैयार! सासु एलीह, पुछलखिन्ह जे कनियाँ आत्मकल्याण केर ई नवका मार्ग ताकि लेलहुँ की? कनियाँ कहलक जे एहि में डबल फायदा, आत्मा संग शरीर सेहो स्वस्थ होइछ, शरीर मे फुर्ती आ बल अबैत छैक। परिवारक सब सदस्य स्वच्छ आंटा खायत त ओहो सब स्वस्थ। गर्भवती महिला केँ प्रसव सेहो जल्दी आ सुखपूर्वक भेल। ताहि लेल हमरा वास्ते ई काज श्रेयस्कर भेल माँ। आशा अछि जे अहाँ हमरा एहि काज लेल आशीर्वाद देब, सहयोग करब।

आब सासु लेल त छोटकी कनियाँ गुरुवत छलीह। हुनकर सब बात सारगर्भित बुझि अनुकरण करथि। ऐगला दिन छोटकी के समय 6 बजे सँ पहिने 5 बजे ओ जागि गेलीह आ ओहि काज में लागि गेलीह। दोसर दियादनी आ ननदि सब सेहो 4 बजे जागिकय ओहि काज केँ पूरा कय देल करथि। काज करबाक लेल देह चोरेबाक बदला काज करबाक होड़ लागि गेलैक आब। सब चाहय जे केकरो सँ बेसी हम काज करी। कियैक त सब केँ एहि में आत्मकल्याण केर दर्शन होइन्ह। छोटकी कनियाँ केर ई दोसर विजय छलन्हि।

आब छोटकी कोठरी सफाई आ इनार पर सँ पानि भरबाक काज शुरू कय देलीह। नौकर के आबय सँ पहिने ओ ई भरिगर काज केँ अपन चुस्त दुरुस्त आ फुर्तीला शरीर सँ काज कय देल करथि। सासु फेर पुछलखिन्ह, बेटी, अहाँक ई काजक कि अभिप्राय अछि? छोटकी बड़ा मीठ स्वर में कहलखिन्ह, माँ, अहाँ केँ एहि सब बातक भेद कहला सँ सेवा सँ वंचित होबय पड़ैत अछि, तेँ आब एकर रहस्य हम अहाँ केँ नहि कहब। एहि अविनय लेल अहाँ हमरा माफी दिय। सासु तखन वचन देलखिन्ह, बेटी! आब हम अहाँक काज में बाधा नहि बनब, अहाँ हमरा एकर आध्यात्मिक रहस्य बुझा दिय। पुतोहु तखन कहलकन्हि, माँ, जेना भोजन बनेला सँ साल भरि में, आंटा पीसबाक काज केला सँ छः मास में आत्मकल्याण होइत छैक, ओतय पानि भरबाक सेवा कयला सँ तीन मास में काज भ जाइत छैक। कियैक त ई काज ओहि सब सँ बेसी कठिन छैक। एहि में श्रम आ कष्ट बेसी छैक। जान के जोखिम सेहो छैक। बस एतेक सुनिते सासु फेर छोटकी केर एहि काज में संग देबय लगलीह। फेर हुनका पानि भरैत देखि आर सब हुनकर अवस्था पानि भरयवला नहि अछि से ई काज हुनका नहि करबाक चाही। त सासु कहलखिन्ह जे हमरा आत्मकल्याण नहि चाही की? फेर हम वृद्धावस्था में छी, तेँ हमरा जल्दी जल्दी आत्मकल्याण केर काज सब कय लेबाक चाही। ताहि पर आर कनियाँ सब एहि काज में लागि गेलीह।

तखन छोटकी फेर बर्तन माँजय लागल। सासु एहि पर आपत्ति करैत कहलखिन्ह जे एहि सँ अहाँक कपड़ा खराब होयत, गहना सेहो घसा जायत। एना अहाँ जे नौकर वला 5 टका बचत कय देब ताहि ठाम 10 टका के नोक्सान करब। ताहि पर पुतोहु कहलखिन्ह, माँ, मानल जे आर्थिक रूप सँ लाभ के बदला हानि होयत, कपड़ा सेहो मैल भ जायत, लेकिन हमर अंतःकरण त एहि सँ जल्दी शुद्ध होयत। बात एना छैक कि जे काज जतेक कठिन आ लौकिक दृष्टि सँ नीच होइत छैक आध्यात्मिक दृष्टि सँ ओ ओतबे उच्च आ कल्याणकारक होइत छैक। बर्तन माँजय सँ हमरा विश्वास अछि जे दुइ मास में हमर कल्याण भ जायत। आर यदि कहियो भगवान एहेन संयोग पठा देथि जे कोनो रोगीक पैखाना पेशाब उठाबय पड़य तखन त एक्के मास में कल्याण सुनिश्चित अछि। अवश्य टा भाव हमरा लोकनिक ऊंच सँ ऊंच – पूर्ण निष्कामता केर होबाक चाही।

सासु केँ त छोटकी पुतोहु केर एक एक बात में वेदवाक्य समान श्रद्धा भ गेल छलन्हि। पुतोहु केँ ओहि काज में सेहो सहयोग करय लगलीह। पुतोहु सब अहु लेल हुनका मना कयलखिन। बुढ़ी कहलखिन्ह जे बेटा सभक आन्ठि त माँजिये सकैत छी, फेर वृद्धावस्था के कारण आत्मकल्याण पर सब सँ बेसी अधिकार अछि। तेँ अहाँ सभक बात एहि विषय मे नहि चलत। तखन फेर सब पुतोहु सेहो एहि कार्य केँ करय लगलीह। आब मोटामोटी सब काज सब बढि चढ़िकय करय लागल छल। सब मे परस्पर प्रेम आ सहयोग केर सद्भावना आबि गेल छलैक। जाहि घर मे कलह आ अशान्ति केर एकच्छत्र राज छलय वैह आब सुख-शान्ति केर निकेतन बनि गेल छल।

एना सेवा बहुत जल्दी मुक्ति केर कारण बनि जाइत अछि –

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात।

– गीता, 2/40

मूल लेख: श्री जयदयाल जी गोयनका

पूर्वक लेख
बादक लेख

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

4 + 6 =