असल एजुकेटेड पॉलिटिशियन आ जनक समाजवाद: मनन योग्य विमर्श

असल पढ़ल लिखल राजनेता के
(विमर्श लेल समर्पित एक लेख)

अहाँक विचार आमंत्रित

काल्हि एक महत्वपूर्ण वेबिनार में बिहार केर राजनीतिक स्थिति पर परिचर्चा के दरमियान भारतीय सर्वोच्च न्यायालय केर पूर्व न्यायाधीश आ अपन ठांय पर ठांय बात विचार लेल जानल गेनिहार मार्कण्डेय काटजू एजुकेटेड लोक केर परिभाषित करबाक एक बेहतरीन तर्क रखलाह। हुनकर बात केँ हम जतेक बुझि पेलहुँ ताहि अनुसार सिर्फ किताबी ज्ञान भेने लोक पढ़ल लिखल नहि कहेता, कोनो समस्या केर निदान तकबाक सामर्थ्य केर विकास होयब वास्तविक एजुकेटेड लोक केर पहिचान होयबाक बात दोहरेला।

परिचर्चा में सहभागी युवा सब हुनका इंडियन पॉलिटिक्स में जेएनयू केर कन्हैया कुमार आ उमर खालिद आदिक नाम देखेलकनि जे ई सब पढ़ल लिखल युवा आगू आबि रहल छथि, किछु एहि सब नाम पर श्री काटजू कहलखिन्ह कि ई सब एजुकेटेड कम आ मास अटेन्शन सीकर बेसी छथि, एजुकेटेड लोक अपन विजन सँ समस्या केर समाधान सहित आगू आओत नहि कि दोसरक छुछ आलोचना आ विरोध मात्र करैत अपन पक्ष में समर्थन जुटेबाक जोगाड़ लगायत।

बिहार केर सन्दर्भ में पुष्पम प्रिया चौधरी केर प्रवेश आ हुनकर पढ़ाई आदिक चर्चा पर काटजू बजलाह जे she is just a joke, माने कि अहाँ लण्डन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स सँ पढू या हॉवर्ड यूनिवर्सिटी सँ, यदि अहाँक अपन देशक अवस्था, संसाधन, सम्भावना आदिक समुचित जानकारी नहि अछि त अहाँक किताबी पढ़ाई कोनो काजक नहि होयत। हुनकर इशारा साफ रहनि जे किताबक पढ़ाई मात्र सँ लोक एजुकेटेड नहि होइछ, महज डिग्री हासिल कय लेला सँ कियो सुशिक्षित नहि कहाइछ, परन्तु विद्यमान स्थिति-परिस्थिति आ समस्या केर निदान तकबाक क्षमता होयब केकरो शिक्षित होयबाक परिचय दैत अछि।

बजैत बजैत काटजू संग में बैसल आधा दर्जन सुशिक्षित आ जिज्ञासू युवजन केँ सम्बोधित करैत बजलाह जे तोरा लोकनि सेहो एजुकेटेड नहि कहा सकैत छँ। यदि एजुकेटेड छँ त वर्तमान बेरोजगारी केर स्थिति सँ देश केँ केना मुक्त करबें से बता, तों अपन विजन राख। लगभग सब युवा गुम भ गेल। एक बेर लेल ई अनपेक्षित प्रश्न केकरो चकित कय सकैत अछि। बेरोजगारी केँ दूर करबाक जादुई तरीका कदापि नहि भ सकैत छैक। एहि लेल अवसर बढ़ेबाक विकल्प छोड़िकय आन कोनो उपाय नहि भ सकैत छैक।

प्रत्येक मानव में स्वाभिमान आ स्वबलम्बन केर नैतिकता देबाक संग सभक लेल रोजी-रोटी केर उपलब्धता सुनिश्चित करबाक प्रयास मात्र करब सरकार केर हाथ मे होइत छैक। आजुक लोकलुभावन चुनावी भाषण आ दाबा जे हम 10 लाख केँ नौकरी देब त हम 20 लाख केँ, ई सब लोक केँ मूर्ख बनेनाय मात्र होइत छैक। हँ अवसर बढाएब, उद्योग धंधा विकसित करब, उद्यमशीलता दिश लोक केँ बढाएब, स्वरोजगार योजना आनब, सामुदायिक स्तर पर आजीविका मिशन चलायब, आदि सैद्धांतिक प्रारूप राखि बेरोजगारी नियंत्रण करबाक प्रयास मात्र कयल जा सकैत अछि, आर से सब बात नीतीश कुमार सरकार करैत आबि रहल अछि हमरा बुझने।

हम मिथिला के लोक, मिथिला केर आत्मनिर्भर व्यवस्था केर बहुत पैघ प्रशंसक सेहो छी आ बेर बेर ‘जनक समाजवाद’ केर टर्मिनोलॉजी सँ एहि ठामक आर्थिक विकास केर सुनियन्त्रित परिकल्पना पर सभा-समाज बीच प्रकाश दैत आबि रहल छी। गौर करू – एकमात्र कृषि पर निर्भर सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था सँ मिथिला में सर्वसामुदायिक विकास केँ कोना लागू कयल जेबाक व्यवहारिक विधान रहल अछि मिथिला में। श्रम आधारित जातीय व्यवस्था आ घरैया लूरि केर पुश्त दर पुश्त चलयवला स्वाभाविक तकनीकी शिक्षा, कमार काठक काज करत, कुम्हार माटि केर वर्तन बॉसन बनायत, डोम बांस के कमानी सँ कृषि उपयोगी व घर गृहस्थी लेल जरूरी सामान बनायत, नौआ, मल्लाह, कियोट, ब्राह्मण, दुसाध, चमार, कोइरी, माली, पटवारी, बरई, मुसहर, आदि हिन्दू में; कालान्तर में यैह व्यवस्था मुसलमान केर जुलहा, दुनिया, कुजरा, राजमिस्त्री, रेजा, आदि अनेकों श्रमजीवी वर्ग में सुव्यवस्थित समाज केर परिकल्पना संग चलल।

जनक समाजवाद केर अर्थ ई भेल जे अहाँ सक्षम वर्ग केँ यजमान बनिकय रोजीरोटी लेल निर्भर वर्ग प्रति जिम्मेदारी लेबय पड़त। अहाँ कोनो विशेष समुदाय केर यजमान रूप में हुनक श्रम सेवा उपभोग नहियो करब त एक निश्चित अनुपात केर खोराकी जेकरा ‘साली’ कहल जाइछ से देबय पड़त। नदी टपबाक लेल कोनो मल्लाह परिवार केर नाव पर चढू वा नहि, सालाना ओ साली लेबे करत। लोकभाषा में समाजवाद केर परिभाषा छैक जे अहाँक पास दू टा गाय अछि, ओ दुनू गाय सरकार अहाँक जिम्मेदारी में छोड़ि देलक लेकिन शर्त ई भेल जे दूध बाँटिकय खाउ।

त मिथिला केर व्यवस्था हमरा तेहने बुझाइत अछि जे समयक क्रम में प्रदूषित भेल, लोक सामन्ती बनल आ आश्रित समुदाय केर शोषण कयलक। विशेष रूप सँ वर्गीय संघर्ष चालू भेलाक बाद एहि तरहक छल प्रपंच शुरू भेल होयत। लेकिन हम अपनहि जीवन मे लगभग 40-45 वर्ष सँ देखैत आबि रहल छी जे राजनीतिक व्यवस्थापन केर कारण समाज कोना प्रभावित होइत अछि। आइ मिथिला केर अगुआ समाज अपन मूल डीह सँ उपइट गेल कहि सकैत छी। जाति जाति में भयावह मतांतर आनि देलक राजनीतिक व्यवस्था। त असल पढ़ल लिखल के होयत जे आजुक दयनीयता केँ जनक समाजवाद में पुनर्स्थापित कय देत, सवाल यैह अछि।

हरि हर!!

पूर्वक लेख
बादक लेख

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