दुर्गा पूजा मनेबाक असल वजह आ लाभ

नवरात्र 2020 विशेष

भवानी केर भवन में लागल भक्तक भीड़

किछु मनन योग्य बात

के थिकीह दुर्गा, कि थिकैक दुर्गति

(आध्यात्मिक स्वाध्याय)😊

मैया अर्थात सभक जननी, कहलो जाइत छन्हि जगज्जननी, हुनकर आराधना ओना त साल में कुल चारि बेर विशेष नवरात्र व्रत सँ कयल जाइछ लेकिन दुइ नवरात्र बेसी प्रसिद्ध अछि, वासन्तीय व शारदीय नवरात्रि। नवरात्रि माने भेल शुक्ल पक्ष केर प्रतिपदा तिथि सँ महानवमी तिथि। चैत, आषाढ़, आश्विन, माघ – एहि चारू मास के नवरात्र व्रत विशेष महत्व केर वर्णित अछि देवी महात्म्य व अन्य ग्रन्थ में। आषाढ़ व माघ मास केर नवरात्र गुप्त कहल गेल अछि। मुदा विशेष सिद्धि लेल साधक गुप्त नवरात्रि केँ पर्यन्त विशेष साधना कयल करैत छथि।

दुर्गा दुर्गतिनाशिनी थिकीह। निज दोष, दुर्जनता, दीनता, दुर्गुण, दुरूहता, दुर्गन्धता आदि दुर्गम दुर्गति थिक। जेकर केकरो जीवन मे ई छह दोख हावी होइछ, ओकर जीवन केर दुर्गति तय बुझू। आर वर्ष में चारि गोट वा प्रमुख दुइ चैती नवरात्र आ शारदीय नवरात्र केर व्रत व अन्य विशेष साधना सँ समस्त दुर्गति केर नाश होइछ। विदित हो जे दोष सेहो स्वयं सँ आरम्भ आ स्वयं सँ अन्त केर अन्तर्ज्ञान होयब जरूरी अछि प्रत्येक साधक लेल, अम्बिका केर दयालुता तदनुसार प्राप्ति केर विनियोग सम्भव होयत।

साधारण शब्द में उपरोक्त छह दोख केँ अपना भीतर ताकू आ तदनुसार भगवती समक्ष शरणागत होउ। समाधान शीघ्र भेटत। दुर्गा सप्तशती में कुल 700 श्लोक अछि। देवी-देवता केर आराधना, ऋषि मुनि संग सत्संग चर्चा, राजा (सर्वसमर्थ) आ वैश्य (व्यवसायी) द्वारा विपरीत परिस्थितिक समनाक माध्यम सँ भगवती दुर्गा व हुनक अनुगामिनी अनेकों महाशक्ति केर प्रादुर्भाव सँ दुष्ट-दुर्जन-दुरूह-दुर्गुणी-दुर्गन्धित-दोषी केर अन्त करबाक विलक्षण वर्णन थिकैक ‘दुर्गा सप्तशती’। एहि में एतेक रास सिद्ध सूत्र (प्रमेय) सब छैक जे साधक (पाठ कयनिहार) केँ अपन जीवन संग सँगतिया सहयात्री स्वजन-परिजन सभक लेल कल्याण मार्ग निर्दिष्ट होइत छैक, तेँ दुर्गा पूजा केर विशेष महत्त्व होइछ।

कालान्तर में देखबटी आ आडम्बरी बात बेसी होबय लागल अछि। विशुद्ध आध्यात्मिक उन्नति व प्रगति केर वास्ते व्यक्तिगत आराधना केँ जाहि औचित्य लेल सामूहिकता प्रदान कयल गेल तेकर विपरीत काज बेसी होबय लागल अछि। आजुक समय मे यज्ञ आ पूजा-पाठ, व्रत, साधना, सुसंस्कृत व्यवहार कम आ दुर्गा भगवती केर पूजा के नाम पर आडम्बरी साज सज्जा, हल्ला हंगामा, नाच गाना, दारूबाजी, जुआ, कुश्ती, गस्ती, मस्ती अत्यधिक मात्रा में जहाँ तहाँ होबय लागल अछि। आपसी इरबाजी, तूँ-तूँ-मैं-मैं आदिक प्रदर्शन में नवरात्र केर असल मर्म पाछू पड़ि गेल आ भौतिकतावादी सोच उल्टा दुर्गति केर छहो अवयव केँ बढाएब शुरू कय देने अछि। सम्भ्रान्त समाज आ सचेतक सुविज्ञ चिंतित बुझि पड़ैत छथि, लेकिन समाधान के बदला उपद्रव बढ़ैत देखि रहल छी। शासन-प्रशासन आ न्याय व्यवस्था सेहो मूक आ विधायक सब वाचाल देखि कलियुग केर पराकाष्ठा देखि रहल छी।

निशा रात्रि केर महाअष्टमी पूजन केर अर्थ नशापान करब बुझेनाय वा बुझनाय उपरोक्त समस्त चिन्ता केँ उजागर करैत अछि। सामूहिकता में सेहो सद्गुरु लोकनि समाज केँ सही मार्गदर्शन करथिन तखनहि भगवती केर विसर्जन में शालीन जयकार केर गूंज में समदाओन गाबि नवरात्र निर्मित नव मूर्तिरूपी देवी सँ प्रार्थना सम्पूर्ण साल केर दुर्गतिनाशिनी बनबाक लेल सम्भव होयत, अन्यथा आली-हौसे आ होली-दीपावली जेकाँ विजयपर्व मनेबाक बोध सँ दुर्गति बढ़त, घटत कदापि नहि।

अन्त में, भगवती माय छथि, बहुत किछु बर्दाश्त जरूर करैत छथिन। अबोध बालक जखन साँप पकड़य दौड़ैत अछि त माय झट ओकर बांहि पकड़ि साँप सँ दूर कय लैत छथिन…. मुदा होशियार आ बुद्धिमान बेटा यदि साँप पकड़बाक अकड़ देखाबय त माय यैह बुझि छोड़ि दैत छथिन जे जो बुझनुक अपने छँ, नीक बेजा अपने बुझमे। अस्तु! सभक नीक हो से शुभकामना!😊

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमोस्तुते।।

हरि हर!!

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