एक जरूरी आ पठनीय लेखः प्रमाणपत्र

प्रमाणपत्र

– प्रवीण नारायण चौधरी

 
जी, एहि लेख मे ओहि ‘प्रमाणपत्र’ अथवा ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ आदि केर चर्चा हम नहि करय जा रहल छी जे विद्यालय सँ जारी कयल जाइछ, जाहि मे उल्लेख रहैत छैक जे विद्यालय अवधि मे फल्लाँक चरित्र आ व्यवहार ‘नीक’ देखल गेल। अंग्रेजी मे सेहो एकर प्रस्तुति कतेको लोक केँ स्मरण मे होयत –
 
CHARACTER CERTIFICATE
Certified that Mr/Ms. …………………………………………………………………. son/daughter/wife of Shri …………………………………………………… is well known to me since last …..…….. years and ………….…… months. To the best of my knowledge and belief he/she bears a good moral character and has nothing which debars his/her suitability for Government Job. Mr/Ms. …………………………………………. is not related to me. I wish him/her all the successes in his/her life. Place: ………………… Signature …………….………. Dated: ……………….. Designation ……………………
 
यैह प्रारूप रहैत छैक एहि औपचारिक चरित्र प्रमाणपत्रक।
 
एकटा आर प्रमाणपत्र देल जाइत छैक उत्तीर्ण वा अनुत्तीर्णक। विभिन्न विषय केर परीक्षाक लब्धांक संग फल्लाँ विद्यार्थी फल्लाँ कक्षा सँ उत्तीर्ण भेलाह कहल जाइत छैक। हम एकरो बात एहि लेख मे नहि कय रहल छी।
 
ई सब प्रमाणपत्र औपचारिकता थिकैक। कोनो खास स्थापित शिक्षा पद्धति अनुसार हम-अहाँ जखन कोनो खास कक्षाक पढाई पूरा करैत परीक्षा दैत छियैक आ उत्तर-पुस्तिकाक जाँच कयनिहार निरीक्षक जखन हमर-अहाँक देल उत्तर केर जाँच करैत छथि तऽ पूर्णांक मे सँ हुनकर निरीक्षण-अन्वीक्षणक आधार पर लब्धांक दैत उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण केर निर्णय करैत छथि। यैह परम्परा पर एखन धरि हमरा लोकनिक मिथिला मे सेहो छात्र-छात्रा सब शिक्षित भेलाह से देखल अछि। मैट्रिक पास कयलाक बाद प्रवेशिका कक्षा या प्लस २ मे प्रवेश करबाक लेल पूर्वक शैक्षणिक संस्थान द्वारा ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ सेहो मांगल जाइत अछि। आर से चरित्र प्रमाणपत्र ओहि छात्रक व्यवहार आ शिक्षक लोकनिक प्रति केहेन आचरण सब देखल गेल ताहि आधार पर देल जाइत छैक। एतय हम एहि तरहक प्रमाणपत्र सभक चर्चा सँ इतर ओहि प्रमाणपत्रक चर्चा करय चाहब जे समाज मे मंगनिये कतेको लोक सब दोसर केँ दैत रहैत छथि।
 
हमरा याद अबैत अछि। बचपन मे गोली खेलाइ, चैत-चिक्का आ कबड्डीक विभिन्न खेल सब खेलाय। फेर ओतय सँ छूटी त पोखरि मे हेलनाय आ गुरकुनियाँ छननाय आ एहि तरहें पानिक कय गो खेल खेलाय। बच्चा उमेर मे लोक बड़का आ छोटका आदिक ज्ञान कमे रखैत अछि तेँ सब संगे झूटका, बघन्डो, अठ्ठा, टाइल-गुल्ली, आदि अनेकों खेल खेलाय, संगहि नहाय, गाछ पर सँ पानि मे कूदल करी, कतहु बैसिकय अन्ताक्षरी खेलाय, नाटक खेलाय… आर बहुत किछु। एहि क्रम मे कतेको मुंहपुरुख आ बड़का लोक केँ देखी जे मंगनी मे प्रमाणपत्र दय देल करथि। कियो बापक नाम लैत कहि बैसैथ, ‘देखहक फल्लाँ भाइ के बेटा के… एकरो दिन जरले छैक। जखन देखू तखन रार-घोर सब संग खेलाइते रहैत अछि।’ कियो त अनेरौ मारय लेल सेहो दौड़थि, ‘भगलें एतय सँ कि नहि तों सब! जखन देखू तखन हसेरी बनाकय कचबच-कचबच करय चलि अबैत अछि। जो खेलाय लेल स्कूल के फील्ड छैक। भाग एहि गली सँ।’
 
ओहि प्रमाणपत्र सब मे एकटा आभास होइत छल जे ओ हमरे वास्ते कहि रहल छथि। हम शायद बेसी बदमाशी कय रहल छी, तेँ डाँटि-दबारि रहल छथि। अभिभावक तुल्य लोक सब छथि। हमरा सभक खेल सँ परेशानी होइत छन्हि, शायद हम सब हल्ला-गुल्ला बेसी करैत छियैक, तेँ स्कूलक फिल्ड दिश चलि जेबाक या फेर बापक नाम लैत हुनका लेल चिन्ता प्रकट करैत छथि। एकटा आदति आर रहय – जोर जोर सँ रफी आ मुकेश सभक गीत गाबय के। जहाँ गेनाय शुरू करी आ कि दोसर कोनो छौंड़ा चौकी, टेबुल, काउन्टर आदि जैह भेटैक ताहि पर ढोल पीटब शुरू कय देल करैक। बगलहि केर अंगना सँ एक वृद्ध बाबी व काकी आदि निकलिकय तुरन्त प्रमाणपत्र देबय लगथि, “कहू त, सबटा रफी आ मुकेश केँ हमरे घर लग आबिकय गीत गेबाक सुर चढि जाइत छैक। जाह तों सब एतय सँ। ओम्हर जा कय रफी-मुकेश बनह ग।”
 
स्वाभाविक छलैक। हल्ला होइक त बाबी-काकी केँ परेशानी भेल करन्हि। ओ सब शायद ताहि द्वारे प्रमाणपत्र दैत ओतय सँ बयला देल करथि।
 
एम्हर कक्षा मे सातमा धरि कोन विषय मे कतेक अंक आयल, नहि आयल, प्रमाणपत्र अनुसार कक्षा मे कोन स्थान पर एलहुँ, नहि एलहुँ से सब फिकिर नहि, या कहू ततेक सुधियो नहि रहय। आठवाँ कक्षा मे हाई स्कूल मे एडमिशन भेलाक बाद जखन अपने चाचा मास्टरसाहेबक अभिभावकत्व मे डेली पढाई करय जाय लगलहुँ आर हरेक सवाल ओ अपने सोझाँ बनबाबथि, नहि आबय त तड़ाक्-तड़ाक् चटकन खाय पड़य, त दर्दहि ज्ञान होबय लागल जे पढब नहि त ई बड मारि मारता। माय हो आ कि पिता, सभक सोझाँ मे तड़तड़बय लागथि। जहाँ १० गोटे केँ देखलहुँ कि बूड़ि बनेनाय शुरू भऽ जाइथ। मोने-मन खूब तामश चढय। मुदा करब की? न माय संग देनिहाइर, न बाप बचेनिहार, न लोक-समाज मे कियो पक्ष लेनिहार। हुनकर सब प्रमाणपत्र, “ई वंशबूड़ि जन्म लेलक”, “फल्लाँ भाइक वंश-कुरहैर”, “एकर दिन बाम छैक”, ओह…. कतेको प्रकारक प्रमाणपत्र ओ जारी कयल करथि, तहिना आरो-आरो कतेको अभिभावक। लेकिन ओ सब हमर नीक चाहैत छलथि। ओ सब एक्के बात कहथि, पढ बढियाँ सँ जाहि सँ दिन सुदिन हेतौक। आखिरी मे हाई स्कूल सँ बाहर निकलैत समय एक दिन कहला, “जोह! आब जतय सेन्टर हेतैक, फर्स्ट डिवीजन भेटि जेतौक।”
 
जीवनक ओ दिन मात्र मन प्रसन्न भेल। मास्टरसाहेब आइ कहि देलनि फर्स्ट डिवीजन भेटि जेतौक – आब निश्चित अपना मे सुधार अछि। ई प्रमाणपत्र बहुत महत्वपूर्ण छल। सच्चे फर्स्ट डिवीजन सँ पास भेलहुँ। आब पढाई करबाक महत्व सेहो बुझि गेलियैक। ओ फर्स्ट डिवीजन वला प्रमाणपत्र कागज मे देखि ओतेक आनन्द नहि भेल जतेक कि सब दिन बेवकूफ बनेनिहार, जिल्लत केनिहार, मारिपीटिकय पढेनिहार मास्टरसाहेब केर ओ कहलहबा प्रमाणपत्र पेबाक स्मृति आइ धरि हमरा उत्साह दैत अछि। तदोपरान्त एक दिन अपन अंग्रेजीक एक शिक्षक संग मुंह लागि जेबाक पहिने जारी एक प्रमाणपत्र मोन पड़ैत अछि – हम अंग्रेजी सिखिये रहल रही आ अपन शिक्षक सभक संग बातचीत मे बेसीकाल अंग्रेजी शब्द केर प्रयोग बेसी करियैक जाहिपर ओ बड बूड़ि बनौने छलाह…. सेहो कालेज मे सब विद्यार्थीक सोझाँ… हमरा बड बोर फील भेल छल। अचानक भीतर सँ चढल तामस आ हम तपाक् सँ सवाल पूछलियनि अपन शिक्षक सँ जेकरा मुंह लागब कहिकय प्रिन्सिपल द्वारा चुप करा देल गेल छल।
 
हमर अंग्रेजी शब्दक प्रयोग गलत छल। शिक्षक हँसी उड़बैत आ हमर नेपाल सँ हेबाक बात केँ जोड़ैत कहैत छथि, “जब अंग्रेजी नहीं आती है तो क्यों दिखाते हो? नेपाल से आते हो सिर्फ परीक्षा देने, चोर कहीं के!” मतलब हम एक निर्धन छात्र, नेपाल मे रहिकय ट्युशन पढाकय, स्कूल मे शिक्षण करैत अपन पढाई कय रहल छलहुँ ताहि सब वेदना व संघर्ष केँ नजरअंदाज करैत परीक्षाक तिथि केर पुष्टि करबाक लेल पूछल एक प्रश्न जाहि मे अंग्रेजीक शब्द कन्फर्म केर प्रयोग गलत ढंग सँ कयल आर ओ हमरा एतेक बात कहि देलनि से नहि पचल। हम तड़ा-तड़ हुनका ऊपर चढिकय बाजय लगलहुँ जे नेपाल सँ एनिहार चोर होइत छैक से अहाँ कियैक कहलहुँ। ओ सफाई देलनि जे क्लास करने जो रेगुलर नहीं आते वो चोरी के बल से परीक्षा पास करने पढते हैं इसीलिये। माने हुनकर प्रमाणपत्र परिकल्पित छलन्हि आर ई घटित नहि भेल छलैक, हुनकर कल्पना मे घटबाक संभावना छलैक। आब त हमरा तामशो चढल आ हँसियो लागल। हम जतबे पढाई करी से ठोकिकय, आ सेहो स्वयं सँ। हम कहलियनि जे सबको एक ही तराजू में नहीं तौला करें सर, आप मेरे शिक्षक हैं। आपको बता दूँ कि मैं एक गरीब छात्र खुद एक अच्छे विद्यालय में पढाने का कार्य करता हूँ। अंग्रेजी माध्यम की विद्यालय है। यदि मेरे अंग्रेजी में किसी तरह की गलती देखे तो आपको सुधार करके शिक्षक का धर्म निभाना चाहिये था, न कि चोर, नेपाली, आदि कहकर दुत्कारना चाहिये था।
 
अहाँ सब विश्वास करब कि नहि, ओ बहस हमर जीवन लेल बड पैघ घातक सिद्ध भेल। हमरा परीक्षा मे एक्सपेल्ड कय देलथि प्रिन्सिपल डी एन राय। हालांकि एकर भुगतान ओ नीक सँ भुगतलथि, प्रकृति हुनका दन्डित केलकनि, लेकिन हमर जीवन मे ओ पीड़ा एकटा नासूर बनि गेल। हमर अभाग भेल। ऐगला वर्ष बाबरी मस्जिद ढलि जेबाक कारण जे दंगा भेल ताहि मे फेर दोसरो वर्ष परीक्षा छूटि गेल। पढाई सँ मोन टूटि गेल। लगातार दुइ वर्ष बी. कौम. द्वितीय वर्ष मे लसैक गेलहुँ। लेकिन कर्मठ पिताक देल एक उपदेश बड काजक सिद्ध भेल। ओ कहला जे, “अरे बेवकूफ! तूँ पढाई पर ध्यान दे। प्रमाणपत्र पर नहि। ई प्रमाणपत्र लय केँ कि हेतैक? विनोबा भावे अपन सारा प्रमाणपत्र आगि मे डाहि देने छलाह। केवल पिताक एक वचन जे आब एमए सेहो पूरा कय लेलहुँ, कतहु नौकरी करब कि नहि – एतबे सुनैत ओ अपन जीवन केवल नौकरी करय लेल प्रमाणपत्र हासिल कयलक से सुनिते सारा प्रमाणपत्र डाहि देने छलाह। बिसर एहि बात केँ। बस अपन काज मे लागल रह। खूब पढ। पूरा जिनगी पढ।”
 
ई वाक्यांश हमर घायल मोन केँ संजीवनी बुटी समान प्रभावकारी सिद्ध भेल। तदोपरान्त हम ट्रेडिशनल एकेडमिक लाइफ सँ दूर भऽ गेलहुँ। अपन विषय गणित मे अभ्यास मात्र सँ प्रखरता एबाक प्रमेय सिद्ध कय चुकल रही। जीवन मे सफलता लेल शिक्षक केर रूप मे केहनो सवाल आ कोनो प्रचलित पब्लिकेशन केर हल कय दैत रही, एहि सँ एक लोकप्रिय शिक्षक हेबाक व्यवहारिक प्रमाणपत्र बिना केकरो देने बल्कि यथार्थ प्रयोगात्मक जीवन मे देखि लेलहुँ। आब की? आब कोन प्रमाणपत्र? ट्युशन सेन्टर पर छेहा एसएलसी (मैट्रिक) केर सैकड़ों छात्र आ ऐच्छिक गणित, अनिवार्य गणित, वाणिज्य गणित – तीनू संकाय केर मास्टर रही। से कोनो प्रिन्सिपल केर प्रमाणपत्र या डिग्री लय केँ नहि, बल्कि छात्र सभक संतोष आ हमरा सँ सिखबाक व्यवहारक बदौलत। ताहि समय मे सेहो किछु-किछु शिक्षक सब प्रतिस्पर्धाक कारण हमर मेथड मे खोट निकालि अनेरहु प्रमाणपत्र जारी कयल करथि। मुदा कहबी छैक न, कोनो शिक्षक सफलताक आधार आम छात्रक संतुष्टि मे निहित छैक। एहि बातक व्यवहारिक प्रमाणपत्र तखन भेटल जखन एक सेकेन्डरी कक्षाक तीनू संकाय केर शिक्षक बनिकय विराटनगरक ताहि दिनक सर्वश्रेष्ठ ‘सेन्ट जोसेफ्स सेकेन्डरी बोर्डिंग स्कूल’ मे कार्य कयलहुँ आर हमर ई आशंका जे ओहि विद्यालयक छात्र केर लूक आ हमर लूक मे कोनो बेसी फर्क नहि हेबाक कारण विद्यार्थी सब कहीं हूटिंग नहि कय दियए से तेकर विपरीत सब विद्यार्थी हमर पढेबाक शैली केँ हृदय सँ स्वागत केलक आ पिन-ड्रौप-साइलेन्स मे हमर कक्षा चलैत छल।
 
आब एहि लेख केर अन्त दिश छी। हम एहि प्रमाणपत्र जारी करबाक किछु सन्दर्भ केर उल्लेख कएने छी। बिन बातहु केर बात पर केकरो लेल चरित्र प्रमाणपत्र देबाक काज कतेको लोक कयल करैत छथि। अहाँक देल योगदान पर कय प्रकारक समीक्षा, टिप्पणी, आलोचना, सुझाव, सलाह आदि देल करैत छथि। ई सब ग्राह्य अछि। मुदा जखन कतहु कियो अहाँ केँ निजी वैचारिक परिवेष्ठन मे जकड़ल रहबाक सीमा बुझितो आ बिना जरूरतहु केर ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ जारी करथि त ई वर्दाश्त योग्य नहि अछि। कोनो लेख केर सार्थकता ओकर पाठकक प्रतिक्रिया सँ होइत छैक, पाठक पर पड़ि रहल प्रभाव आ लेखकक बनि रहल छवि सँ ओकरा लेखकीय प्रमाणपत्र स्वतः प्राप्त होइत छैक। मुदा किछु खास जानल-मानल समीक्षक केर नजरि मे अहाँक लेख हुनकर अन्तर्दृष्टिक मापदंड पर नहि उतैर पबैत अछि – ओ अपना ढंग सँ अहाँ लेल प्रमाणपत्र तहियाकय रखैत छथि। कहियो एक गो, कहियो दोसर, आ अनेक तरहक प्रमाणपत्र ओ लोकनि जारी कय देता। मैथिली भाषा-साहित्य मे लोकदृष्टि मे आयल प्रो. हरिमोहन झा सहित कय गोट रचनाकारक मैथिली मे प्रवेशक एकटा एहने इतिहास भेटैत अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यक औपचारिक ज्ञान – यानि एकेडमिक करियर मुताबिक हासिल डिग्री केकरा लग कतेक रहल ताहि सँ ऊपर पाठक मध्य अपन लेखनी सँ ओ केहेन छाप छोड़लनि ई बेसी महत्वपूर्ण छैक।
 
आइ हमरा दृष्टि मे मैथिली भाषा-साहित्य केँ कतेको अनौपचारिक डिग्रीहोल्डर अपना रहल अछि। कतेको लोक एहि मे अपन प्रभावशाली लेखन सँ प्रभावित करबाक व्यवहारिक स्वरूप स्थापित कय चुकल देखा रहल छथि। कतेको नव लोक केर प्रवेश बहुत तेजी सँ भाषा-साहित्य संग संस्कृति, संचार आ समग्रता केँ नव समृद्धि प्रदान कय रहल अछि। लेकिन हुनका सब केँ हतोत्साहित करयवला प्रमाणपत्र बँटनिहार सेहो ओतबे कछमछाइत देखाइत छथि। ‘दहेज मुक्त मिथिला’ समूह पर आइ सैकड़ों साधारण परिवारक गृहिणी, अत्यन्त साधारण पढाई करबाक पृष्ठभूमिक लोक सब नव-नव सृजन करैत देखा रहला अछि। लेकिन बीच मे कियो बुधियारलाल हुनका भाषाक शुद्धता, लेखनशैली मे सुधार आदिक टोक मारैत सेहो देखा जाइत छथि। हमरा हिसाब सँ एहि तरहक नवप्रवेशी लोकनिक लेख केँ सम्पादनक जरूरत छैक। अहाँ ५-१० बेर सम्पादन करैत कनेक सुझाव दय देबनि त ओ लोकनि स्वस्फूर्त बेहतरीन लेखन करब आरम्भ कय देथिन। से सम्पादन लेल एक अजित आजाद व अन्य किछु लोक छोड़ि सामान्यतया एहि नवप्रवेशी लेल मैथिली क्षेत्र मे किनको कतहु समय दैत नहि देखल। आइ डा. अरुणाभ सौरभ द्वारा लेखनी कार्यशालाक संचालनक बात सुनलहुँ, हुनका धन्यवाद। ई सार्थक काज भेलैक। लेकिन नवप्रवेशी केँ हतोत्साह करयवला टिप्पणी अथवा भेद करयवला विचार – गम्भीर आ अगम्भीर आदिक सीमारेखा तानबाक कार्य – एहि सब सँ बचनाय आजुक अवस्था मे बेसी जरूरी छैक।
 
हरिः हरः!!
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