रोचक आ प्रेरणादायक रचना – भाग-१ः मैथिली साहित्यक सर्वोत्तम उपयोगिता पर केन्द्रित (अत्यन्त पठनीय)

१५ सितम्बर २०२० । मैथिली जिन्दाबाद!!

आइ सँ एकटा नव अवधारणा पर चलबाक संकल्प संग मैथिली पाठक लेल सर्वोपयोगी रचना सभक संकलनक धारावाहिक आरम्भ कय रहल छी। मैथिली जिन्दाबाद वेब न्यूजपोर्टल पर साभार फेसबुक आ विशेष रूप सँ ‘दहेज मुक्त मिथिला’ समूह जतय एक सँ बढिकय एक विद्वान् आ विदुषी सदस्य सभ उपस्थित छथिन हुनका सभ द्वारा लिखल गेल रचना सभ एतय श्रृंखलावद्ध तरीका सँ राखब।

भाग १

१. कोलकाता सँ सीए रंजीत झा केर ई काव्य-रचनाः

यै सुनैत छी, कतय जा बैसल छी
बेटा IAS भ गेल, ककरो भेजि मिठाई अनाव
तीस लाख लेबय दहेज, देबय मोछ पर ताव
घर जे फुस के अछि, ओकरा महल बनायब
बेटी जे कुमाइर अछि, तकरो विआह करायब
बेरोजगार बड़का बेटा के, रोजगार में लगायब
जे एतैक कमजोर घटक, ओकरा भगायब
यै चिंता किये करैत छी, कतय जा बैसल छी
जे एताह पैघे लोक, ऑफिसर आ जमींदार
चाहे घूस लैथ या जमीन बेचैथ, लेबै हम कार
लड़की अनपढ़ होय या पागल, करबै एकर विआह
दहेज लेबय मे टॉप करब हम, गाँव देतै गवाह
कि हम फूसि बाजैत छी, कतय जा बैसल छी
बरियाती के हाल ने पुछू, देलक नै खेनाय
सभ के कल जोरि कहलैथ, पाय अहाँ लेलहुँ गिनाय
बर के त घर ल गेल, ग्रामीण देलक भगाय
एहन हीन्स्ताय भेल कि कहू, यै बौआ के माय
यै किये कनैत छी, बेइज्जत हम भ रहल छी
बौआ कानैत फ़ोन केलक, हमरा गदहा बनवने अछि
केहन पागल कानिया क देलौ, पीठ चढ़ि बैसल अछि
खेनाय केँ के पूछत, बान्हिके हमरा रखने अछि
कहैथ पाय आ समान लौटाबु, जे हमर बाबू देने अछि
यै सत्ते कहैत छी, अहाँ किये कनैत छी
जाएत छी लौटा देबै, पाय आओर कार
दहेज लेनाय-देनाय गलत अछि व्यवहार
कुप्रथाक के छोड़िके, जागू सभ्य समाज
बेटी-बेटा मे करु ने अन्तर, आबु आव बाज
यौ अहाँ सभ बुझैत छी, बेटी अछि तेँ कनैत छी

२. नीतू झा केर खिस्सा मार्फत मिथिला मे दहेज गनबाक प्रवृत्ति

खट्टर काका आ दहेज प्रथा

– नीतू झा
दहेज गिनबाक बाध्यता के ऊपर एकटा खिस्सा सुनाबय चाहब –
खट्टर काका के ३ टा बच्चा, २ बेटा और १ टा बेटी। दृश्य अछि पहिल बेटा के विवाह।
कन्यागत एलैथ घटकैती करय, हुनकर बेटी मास्टर्स केने रहथिन प्रोफेशनल कोर्स सऽ आ नौकरी करैत रहथिन। लड़का सेहो एमबीए क के प्राइवेट फर्म मे कार्यरत रहथि।
खट्टर काका के परिवारक सम्पन्नता के सेहो आभास छलन्हि त जहन कन्या के पिता देबय-लेबय के मुद्दा पर गप कयलथिन त कहलखिन अहाँ केँ जे इच्छा हुए अहाँ करू अपन बेटी के लेकिन विवाह राति १५० के लगभग बरियाती आयत हुनकर नीक सँ व्यवस्था करब, सब के बर-विदाई नीक सँ हेबाक चाही। आबय-जाय के व्यवस्था सेहो देखब आ एकटा लिस्ट बढेलखिन जे हमर घरबारिक सब के नाम अछि। सब लेल नीक सँ कपड़ा-लत्ता देबनि। आ बाँकी के बिध-व्यवहार त अहाँ बुझिते छी।
बेस कन्या के पिता पैसो गिनलथि, कार आ दुरागमन मे सबटा समान और खट्टर काका के इच्छानुसार सबटा व्यवहार कयलथि। लेकिन अपना बेटी के किछु नहि बुझय देलथि, सबटा चुप्पे-चुप्पे पठा देलखिन किये कि हुनकर बेटी दहेज लेल मना केने रहथिन।
विवाह के बाद जहन कनियाँ सासुर गेली त सब हकार पुरयवाली लोक सब सँ सुनथि जे बड्ड देलकय, आ जहन सच्चाई के पता चलल त बड दुःख भेलनि। ओ जहन अपना पति सँ पूछलथि जे अहाँ केँ ई सब बुझल छलय त कहलखिन नय, दहेजविरोधी त हमहुँ छी लेकिन हमहुँ त बाहरे रही, विवाह स दू दिन पहिने गाम एलहुँ और दोसर बात जे ई सब गप त नम्हर लोक के बीच भेलय, हम बाबूजी सँ केना किछु पूछितियनि।
दृश्य – २, बेटी के विवाह
खट्टर काका के बेटी आईटी इंजीनियर आ नौकरी करैत रहथि। लड़का सेहो सेम प्रोफेशन के ताकल गेल ताकि आगू के लेल एक शहर मे अपोर्चुनिटी रहय सोचि कय।
पैसा गिनबाक लेल खट्टर काका तैयार नहि रहथिन जे हमर बेटी त बड्ड कमाइ य, लेकिन जहन बात बिगड़ैत देखलखिन त काकी कहलखिन जे आइ जे खर्च नहि करब त नीक लड़का हाथ सँ निकलि जायत आ बाद मे बेटी के सब दिन दय स बढियाँ एखनहि खर्च कय लिअ।
तहन पैसा गिनल गेल, लड़का के पिता जहन बाँकी बिध-व्यवहार के बात कयलथि त खट्टर काका कुहैर गेलाह मोनेमोन। एक तरफ तैयारी करथिन ब्याह के आ खौंझाइत बजैत छलाह, “बाप रे बाप, लूटि लैत छैक ई सब बेटी ब्याह मे। बेटीक बाप भेनाय पाप त नहि छै!”
दृश्य – ३, दोसर बेटा के विवाह
खट्टर काका के छोटका बेटा दाँत के डाक्टर आ अपन क्लिनीक चलबैत छलथि। उमा बाबू दलान पर अबिते खट्टर काका के पूछलखिन, “कि यौ, सुनय छी बेटा के ब्याह ठीक केलौं हँ?”
खट्टर काका – हँ, फल्लाँ गाँव ठीक भेलय हँ।
उमा बाबू – आ देब लेब?
खट्टर काका – दुर्र! कि कहू! हमर बेटा त डाक्टर अछि, किछु हेबाक त जरूर चाही लेकिन ई कुटुम्ब सेहन्तगर नय अय, पहिनहि कहलक हम एकोटा पैसा नय गानब।
उमा बाबू – अच्छे? अहाँ चिन्ता जुनि करू, अहाँक बेटा त अपने डाक्टर छथि, बड्ड कमाइथ।
खट्टर काका – हँ, से त छै लेकिन एखन त बेटा ढंग स नहिये कमाइत अछि।
विवाह बड बढियाँ सम्पन्न भेल। खट्टर काका के इच्छा अनुसार बरियाती आ घरवारी के विध-व्यवहार नहि भेल।
सबटा भेला के बाद खट्टर काका कहलखिन, ई कुटुम्ब एको रत्ती हमर मान-मर्यादा नहि रखलक। जे अपना मोन भेलय से केलक।
खिस्सा समाप्त
ऊपर के कथा मे ३ टा परिस्थिति के चित्रण एक्के टा आदमी के ऊपर कयल गेल हँ आ तात्पर्य ई अछि जे सब लोक अपना सुविधानुसार कार्य कर’ चाहय छी। जाबे तक कोनो विपत्ति अपना ऊपर नय आबय अछि ओकर परेशानी नय बुझय छियै।
और दहेज के एक्के टा मूल कारण अछि अपन सब के ई संकीर्ण सोच। लेकिन जहन आइ अपन सब एहि सामाजिक रोग के पहचान कय लेलहुँ त आवश्यकता अछि एकर इलाज के।
एक टा बात और राखय चाहब जे आइ दहेज प्रथा के बढाबय मे अप्पन सभ के सामाजिक संरचना सेहो जिम्मेदार अछि। जेना कि –
१. लैंगिक असमानता (Gender Inequality)
२. अशिक्षा और बेरोजगारी (Lack of Education & Job Opportunity)
३. नैतिकता के कमी (Lack of Morality & Values)
ई बदलाव एक्के दिन त नय हेतय लेकिन जे डैमेज भेल से भेल, लेकिन आब शुरुआत अपन परिवारे स करू, ऐगला जेनरेसन के सेन्सिबल बनाउ एहि सब मुद्दा पर अपना आप के एहेन समर्थ बनाउ जे अप्पन लाभ आ हानि के देखने बिना हम सब दहेज के विरोध करी।
जय मिथिला!

३. नीलम झा केर लेखः शिक्षाक महत्व

आइ हम अहाँ सभक समक्ष शिक्षा क महत्व के बारे मे बात करय चाहय छी कि अपना सब के जीवन मे शिक्षा क कोन स्थान य। ओना त सब जनिते होयब, हम अपन मोनक बात अहाँ सभक समक्ष क रहल छी, हमरा सँ जे गलती होयत तेकरा क्षमा करब।
शिक्षा मनुष्यक जीवन क ओ अंग छी जेकर बिना मनुष्य कोनो करम क नय य। आइ क डेट मे शिक्षा सब के पास छैन। जे एहि अमूल्य रत्न सँ वंचित छथि ओ कोनो करम क नय छथि। शिक्षा अपन सभक जीवन मे ओ स्थान रखय य जेकरा एना तुलना कय सकैत छी – मनुष्य शरीर मे जेना प्राण के महत्व अछि तहिना शिक्षा के महत्व अछि। जेना फूल मे सुगन्ध तहिना मनुष्यक जीवन मे शिक्षा। शिक्षा एहेन धन भेल जे नय चोर चोरा सकय य नय डकैत लूटि सकय य। जखन अहाँ क मोन होयत तखने अहाँ ककरो द सकय छियै। एकर बहुत उदाहरण छय जेकर वर्णन करय म बहुत समय लागत।
हम जे बात करय चाहि रहल छी, ओ छी, “बेटी के शिक्षा मे माय-बाप के योगदान”। सब सँ महत्वपूर्ण बात छै माय-बापक योगदान केर। पहिने हमरा सभक समय क बात खराब छल। ओ समय छल जे बेटी के शिक्षा वैह दय छला जे शिक्षा के महत्व क जनय छला और बेटी क भविष्य क बारे मे सोचय छला।
हमरा याद य जखन हमर एडमिशन कालेज मे भेल रहय त हमर दादी हमर पापा के कहलखिन बेटी के बेसी नय पढा, नहि त ओकरो स ज्यादा पढल लड़का ढूंढय पड़तौ, बेसी पढाई क कि करतै, एकरा नौकरी थोड़े करबा के छै। लेकिन पापा पहिल बेर दादी के बात क विरोध केलखिन जे दादी के परम भक्त रहथिन। एक आज्ञाकारी बेटा और हुनकर गुरुआइन सेहो रहथिन दादी। पापा हमर दादीक बात काटि हमर भविष्य क बारे मे सोचलथि।
जखन हम अपन सासुर अयलौं त हमर ससूर केर खुशी क ठिकाना नय रहनि। ओ बहुत गर्व स सब केँ कहय छलथि जे हमरा घर मे ग्रेजुएट पुतोहु आयल छथि। पूरा गाँव मे ओहि समय मे केकरो घर मे ग्रेजुएट पुतोहु नहि रहनि।
हमर बाबा क नाम छलनि पंडित श्री अभिराम झा। ओ पटना मे बहुत पहिने आर्यावर्त अखबारक रिपोर्टर रहथि। हुनकर लिखल किताब एखनहुँ लाइब्रेरी मे हेतनि।
आब बात कय रहल छी अपन बेटी के शिक्षा पर।
जखन बच्चा क एडमिशन करबय जाय छलहुँ त पहिने माँ-बाप क शिक्षा पूछय छल जाहि सँ कि बच्चा के होमवर्क माँ करा सकैत छथि कि नहि। हमर मोन मे मनोरथ य कि हम जतेक पढलहुँ हमर बेटी हमरो सँ आगाँ, बहुत आगाँ पढथि। एहि लेल हमरा जे करय पड़त से हम करब। हुनकर पापा सेहो पूरा कोशिश मे रहैत छथिन जे हमर बेटी क कोनो ख्वाहिश एहेन नहि रहय जेकरा हम पूरा नहि कय सकी।
पढाई क कोनो अन्त नहि होइ छै। जतेक सामर्थ्य य पूरा कोशिश मे लागल रहय छी जे हम नय केलहुँ ओहि सऽ आगा हमर बेटी करथि। हम हमेशा अपन झलक अपन बेटी म देखय छी। बात त बहुत य मोन म लेकिन एखन एतहि विराम लगा रहल छी। जय माँ जानकी!!

४. कृष्णकान्त झा द्वारा मैथिलीपुत्र प्रदीपक प्रसिद्ध रचना जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर केर संस्कृत भावानुवाद

जगदम्ब त्वमसि अवलम्ब मम
हे मात त्वमेव हि आश मम॥
 
त्यक्तोस्मि अहं तु निखिलजगतः।
माँ तव चरणे शरणे पतितः॥
मध्ये जलचक्रगता तरणी।
आगात्य सुरक्षय जगजननी॥
जगदम्ब त्वमसि….
 
काली दुर्गा कल्याणी असि।
तारा अम्बे रुद्राणी असि॥
अपराधक्षमां कुरु हे जननी।
एकासि त्वमेव हि सुखकरणी॥
जगदम्ब त्वमसि….
 
यदि त्वं नहि श्रोष्यसि दुःख मम।
वद कां कथयामि कष्ट स्वकं॥
अहमास्मि बालः तव जननी।
अंके लालय मम मां जननी॥
जगदम्ब त्वमसि ….

५. माधव झा केर एक कृति मिथिलाक लोकक नाम

मैथिलजन सब मिथिला बचाबू
त्यागि सकल अभिमान यौ,
मिथिला आब डूबि रहल अछि
बीच भँवर मझधार यौ!
धोती कुर्त्ता साड़ी आँगी
छोड़ि धेलौं शहरी ठाठ यौ
मैथिल जन…
कुरत्ता क आहाँ कोट बनेलौं
धोती बेलबटम स्टार यौ,
साड़ी आँगी एस्कर्ट बनेलौं
त्यागी मिथिला संस्कार यौ,
मैथिल जन सब मिथिला बचाबू
त्याग‍ि सकल अभिमान यौ
मिथिला आब….
सब मिली संक्लप करू
होयब हम सब एक यौ,
जे जतय छी ओतहि करब
मिथिला रीत रिबाज यौ,
तखनै मिथिला फेर सँ औथिन
देव लय निज अवतार यौ
हम “माधव” विनय करय छी
करू मिथिला सम्मान यौ
मैथिल जन सब मिथिला बचाबू
त्यागि सकल अभिमान यौ
मिथिला आब…..
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