प्रेरणापुरुषः मैथिलीपुत्र प्रदीप

अर्पण स्मारिका लेल समर्पित ई लेख

– प्रवीण नारायण चौधरी

प्रेरणापुरुषः मैथिलीपुत्र प्रदीप

मध्य विद्यालय, कुर्सों जेकर स्थापना १८९२ ई. ब्रिटिश सरकार कएने रहय, जाहि विद्यालय सँ हजारों छात्र अपन प्रारम्भिक पढाई कय आइ राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र मे अपन अलग ख्याति बनौलनि अछि, जे विद्यालय ओहि इलाकाक दर्जनों गाम केर एकमात्र आधार रहय आर जतय एक सँ बढिकय एक शिक्षक आबिकय छात्र-छात्रा केँ शिक्षित बनौलनि – ताहि विद्यालयक प्रधानाध्यापक केर रूप मे हम मोन पाड़ि रहल छी एक अत्यन्त लोकप्रिय शिक्षक प्रभुनारायण झा केँ। अत्यन्त बाल्यकाल मे देखल-बुझल स्मृति मे आर बात तँ नहि अछि, लेकिन विद्यालयक प्रार्थनाकालक दृश्य, प्रार्थना ‘जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर, हे माय अहाँ बिनु आस केकर’ केर भावपूर्ण गायन, समस्त छात्र आ शिक्षक लोकनिक पंक्तिबद्ध ठाढ होयबाक आ ताहि समय शिक्षक लोकनि द्वारा छात्र-छात्रा केँ देल जायवला महत्वपूर्ण सूचना, आर प्रधानाध्यापकक विशेष सन्देश – ई सब आइयो जीवन्त दृश्य समान आँखिक सोझाँ नाचि रहल अछि। गामक लोक लेल प्रधानाध्यापकक नाम ‘प्रदीपजी’ प्रसिद्ध छल। जी, अहाँ सही अन्दाज लगेलहुँ, मैथिलीपुत्र प्रदीपजी! ओ हमरा सभक अत्यन्त प्रभावशाली शिक्षक छलाह। हमर स्मृति मे हुनक पूरे गाम घुमिकय सभक दलान पर छात्र लोकनि भोर-साँझ पढाई करय लेल बैसैत अछि या नहि, अभिभावक सेहो ओहि छात्र सभक संग समय दैत छथि या नहि, किनको बच्चा लाइन सँ बेलाइन त नहि भऽ रहल अछि – ई सब बात अभिभावक लोकनि संग कयल करथि।

शिक्षा आ पठन-पाठनक ओ युग (१९७०-९० ई. केेर कालखंड) आजुक तुलना मे अत्यन्त अलग आ महत्वपूर्ण बुझाइत अछि। शिक्षक आ छात्र सभक अन्तर्सम्बन्ध मे शायद ओ कलियुग नहि छल। तुलसीकृत् रामायण (रामचरितमानस) केर उत्तरकाण्ड केर दोहा संख्या ९६ सँ १०३ धरिक बीच मे एहि कलियुगक चर्चा जाहि ढंग सँ कयल गेल अछि ओकर स्वाध्याय हमरा लोकनि केँ बहुत पैघ प्रेरणा दैत अछि। एहि मे एक जगह चर्चा गुरु आ शिष्यक बीचक सम्बन्ध केँ सेहो कयल गेल अछि जे आजुक समय सुस्पष्ट रूप मे ओहिना देखाइत अछि, लेकिन हम दावाक संग कहि सकैत छी जे प्रदीपजी समान मास्टरसाहेब केर युग मे कलिकाल नहि छल। एहि लेख मे तुलसीदासजीक ओहि पंक्ति जे काकभुशुन्डिजी गरुड़जी सँ अपन जीवनक पहिल कालखन्डक चर्चा करैत कहलनि अछि ताहि पर ध्यानाकर्षण चाहब –

गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा॥९८.३॥
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥
मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥९८.४॥

तात्पर्य छन्हि जे कलियुग मे ‍- शिष्य और गुरु मे बहिरा ओ अंधा जेहेन हिसाब होइत अछि। एक (शिष्य) गुरु केर उपदेश केँ सुनैत नहि अछि, एक (गुरु) देखैत नहि छैक (ओकरा ज्ञानदृष्टि प्राप्त नहि छैक)। शिष्य सँ धन (ट्युशन फीस) त भरपूर लैत अछि, मुदा ओकर अन्तर्दृष्टि केँ सुशिक्षित बनाकय ओकर भविष्य केँ सुरक्षित करबाक चिन्ता केँ दूर नहि करैत अछि। तुलसीदासजी लिखलनि अछि जे ओहेन गुरु घोर नर्क मे जाइछ, मुदा आजुक संसार मे नर्कक चिन्ता होइते छैक केकरा… बस ठाँय पर ठाँय नोट (टका) आबय, बात कम्प्लीट। एकटा आरो पंक्ति ओहि संगहि लिखि देल अछि – मातु-पिता सेहो अपन धियापुता केँ यैह शिक्षा दैत छथिन जाहि सँ पेट भरबाक कला ओकरा मे आबि जाय। पेट छूटल पहाड़ भऽ गेल!

हमर पिता जे विद्यालयक पठन-पाठन पर निरन्तर अनुगमन आ नजरि राखल करथि एक निगरानी समितिक सदस्यक रूप मे हुनका संग सेहो मास्टरसाहेब काफी नजदीक आ प्रियजनक रूप मे जुड़ल छलाह। लगभग ७ वर्ष धरि ओ कार्यरत रहला। कुर्सों सँ मात्र ५-६ किलोमीटर केर दूरी पर हुनकर अपन गाम कैथवार रहनि, लेकिन ड्युटी के पक्का लोक ओ सब दिन विद्यालयहि पर अपन डेरा राखल करथि। ओहि समय मे बहुत रास मास्टरसाहेब लोकनि विद्यालयहि पर डेरा राखथि। शनि दिन अपन गाम गेल करथि, फेर सोम दिन ससमय हाजिर होइत छलाह। आजुक समय मे मास्टरसाहेब लोकनि विद्यालय मे समय पर एनाय अथवा छात्र केँ पढेनाय अपन मानहानि बुझैत छथि, भैर महीनाक हाजिरी एक्के दिन बना लैत छथि, पंचायत स्तर पर रहल शिक्षा समितिक सदस्य आ मास्टरसाहेब लोकनि मिलिजुलिकय खुलेआम लूटैत रहैत छथि। परञ्च हम जाहि महापुरुष शिक्षक प्रदीपजी केँ स्मरण करैत ई लेख लिखि रहल छी त बुझू आजुक स्थितिक वर्णन केनाय तक पापमय लगैत अछि।

प्रदीपजीक नाम ‘मैथिलीपुत्र’ ओहिना नहि पड़ल छन्हि। ओ हिन्दी माध्यम सँ पढेबाक विद्यालयक हेडमास्टर रहितो मातृभाषाक माध्यम सँ पढेबाक बहुत पैघ वकालत कयल करथि। एक्स्ट्रा एक्टिविटिज मे मैथिली लेखन, वाचन, गायन आ नाटक खेलेबाक तालिम बच्चा सभ केँ देल करथि। महिला उत्थान लेल छात्रहि जीवन सँ मंच पर छात्रा केँ प्रोत्साहित करब आ अभिभावक लोकनि केँ सेहो एहि बात लेल तैयार करब जे बेटी सभ केँ पर्दा सँ बाहर निकलि अपन प्रतिभा देखेबा मे कदापि अवरोधक नहि बनथि – प्रदीपजीक कय गोट गुण आइ धरि लोक चर्चा करैत छथि। हमर वृद्ध माय सेहो हुनकर निष्ठा आ समर्पण संग जन-जन मे शिक्षा केँ प्रसार आ सभक जीवनस्तर मे सुधार केर प्रयास केँ सराहना करैत एक सन्त, महात्मा आ महापुरुष केर रूप मे प्रदीपजी केँ बेर-बेर मोन पाड़ैत रहैत छथि। गामक हुड़दुंग धियापुता केँ प्रदीपजीक आदेश रहल करैक जे तूँ सब अपन घर पर नहि, साँझ आ भोर विद्यालय पर आबि हमरा सोझाँ मे पढमे। जमीन्दारी प्रथाक गाम रहितो प्रदीपजी एहेन आदर्श शिक्षक छलाह जे ब्राह्मण, कियोट, चमार, दुसाध, कमार, कुम्हार, नौआ, मुशहर, मुसलमान जातिक ग्रामीण छात्र-छात्रा सँ लैत आसपड़ोसक गामक आरो जाति-समुदायक धियापुता केँ एकसमान रूप सँ व्यवहार करैत ‘सामाजिक न्याय आ समरस समाज निर्माण’ केर अभूतपूर्व तालिम जन-जन मे देल करथि। हुनकर कय गोट प्रिय छात्र हुनका भगवान जेकाँ आइ धरि पूजा करैत छथि। प्रदीपजीक बनायल रस्ता पर आरो कतेको शिक्षक लोकनि चलल करथि। लोकप्रियता वैह शिक्षक केँ भेटैत छल जे प्रदीपजीक आदर्श केँ अपन जीवनचर्या मे अनुकरण कयल करथि।

मैथिलीपुत्र प्रदीपजी द्वारा एक शिक्षक केर रूप मे शिष्य संग समस्त अभिभावक व आम मानवीय समाज केँ शिक्षाक वास्तविक मर्म प्रति आजीवन समर्पित रहि मानव सेवा जेहेन परोपकार धर्म निभायल गेल।

बादक जीवन मे हमरा हुनकर संग-संसर्ग प्राप्त नहि भेल, सिवाये एक बेर २०१६ मे मिथिला राज्य निर्माण सेनाक राष्ट्रीय अधिवेशनक आमसभा जे ९ नवम्बर दरभंगा विश्वविद्यालयक परिसर मे आयोजित छल ओतय हुनकहि प्रमुख आतिथ्य मे आयोजित आमसभाक संचालन करबाक क्रम मे ईश्वर संग साक्षात्कार करबाक परमानन्दक अनुभूति संग आशीर्वाद लेबाक अवसर भेटल। ओ बहुत गदगद छलाह। मिथिला आ मैथिली मानू हुनकर हृदयक सर्वथा पैघ संवेदना रहनि। हमरा स्वयं जे अनुभूति अपन भाषा, भेष आ भूषण प्रति होइत अछि – आर जाहि आध्यात्मिकता सँ मैथिली व मिथिलाक संरक्षण, संवर्धन आ प्रवर्धन लेल एकनिष्ठ समर्पण भाव रखैत छी – तेकर मुख्य प्रेरणास्रोत मैथिलीपुत्र प्रदीप केँ कहय मे कोनो अतिश्योक्ति नहि होयत।

एक बेर फेर लय चली अपने सब केँ १९७५ ई. – हमर आयू बड कम छल, मात्र ३ वर्ष। हमरा झलफली दृश्य सेहो लोक सभक बेर-बेर कहलाक कारण वैह मिडिल स्कूलक फील्ड पर लागल विशाल पंडाल मात्र नजरि पड़ैत अछि – यानि ताहि वर्ष कुर्सों मे ‘विद्यापति स्मृति पर्व समारोह’ केर विहंगम आयोजन भेल छल। ओकर मुख्य कर्त्ता-धर्त्ता स्वयं मास्टरसाहेब प्रदीपजी छलाह। कार्यक्रमक संयोजनक बड पैघ जिम्मेदारी निभौने रहथि। स्कूलक छात्र-छात्रा सभ केँ मैथिली गीत, कविता, स्वागत-सत्कार वास्ते कार्यदल आ धियापुताक मुंह सँ मधुर गायन सँ लैत सब व्यवस्थापन मे अनुशासित स्वयंसेवी केँ खटौने रहथि। पटना सँ इंडियन नेशन केर सम्पादक गजेन्द्र नारायण चौधरी ऊर्फ फेकन काका केर नेतृत्व आ संयोजन मे मुख्य अतिथि बी. एन. ओझा जे बिहार इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के चेयरमैन छलाह ओ एहि समारोह मे एलाह। समारोहक चरम उत्साह व ऊर्जा सँ प्रेरणा पाबि – लोक सभक शालीनता आ शान्तिप्रियता देखिकय ओ मंचहि सँ घोषणा कयलनि जे एहि गाम केँ बिजली सँ जोड़बाक कार्यादेश जारी करब। आर से हुनकहि कार्यादेशक कारण कुर्सों-नदियामी आ ओहि पूरे इलाका मे बिजली १९८० केर दशकक आरम्भहि मे आबि गेल। पीरा-पीरा बल्ब केर बरब हमरा सभ बालमन लेल कतेक हर्षित करयवला छल ओकर वर्णन हम शब्द मे कोना करू, शब्द नहि अछि। बस एकरो श्रेय मास्टरसाहेब केँ आ समस्त ओहि कर्णधार महापुरुष ग्रामीण व्यक्तित्व केँ जाइत छन्हि जे जीवन मे कतहु रहला अपन अलग शेखी आ पुरुषत्व सँ मानव समाज केँ उच्चकोटिक सेवा प्रदान कयलनि। ओ सब हमरा समान जिज्ञासू मुमुक्षु मैथिलीक सेवक – मिथिलाक पुत्र लेल प्रेरणाक महत्वपूर्ण स्रोत छथि।

अफसोस, एहि तरहक समारोह केँ ग्रामवासी मास्टरसाहेब केर ट्रान्सफर भेलाक बाद निरन्तरता नहि दय सकलाह! हमर अपनहि जेठ भाइसाहेब (पितियौत) जिनका हम सब ‘लालभाइ’ कहियैन, ओहो मध्य विद्यालय जमालपुर (दरभंगा-सहरसाक सीमा, कोसीक पेट) मे शिक्षक रहथि आर कुर्सों सँ वैह एकमात्र व्यक्ति भेलाह जे प्रदीपजी संग निरन्तर सम्पर्क मे रहल करथि। बादक जीवन मे प्रदीपजी आर बेसी आध्यात्मिकताक महासागर बनि गेल छलाह, से बात लालभाइ सँ सुनल करी। लोक सब केँ देवी उपासना, गायत्री साधना व अन्य कतेको तरहक धर्मनिष्ठताक सदुपदेश देबाक कथा-गाथा लालभाइ सुनबथि प्रदीपजीक सम्बन्ध मे।

वर्ष २०१० ई. सँ हमरो अपन मातृभाषा-मातृभूमि केर सेवा प्रति रुचि जागल आर कार्य करब आरम्भ कयलहुँ। ताहि क्रम मे प्रो. उदय शंकर मिश्र (दरभंगा) सँ भेंट बहुत रास जानकारी करौलक मास्टरसाहेबक सम्बन्ध मे। बकौल प्रो. मिश्र – प्रदीपजी मैथिलीक समर्थक होयबाक संग-संग एकटा प्रखर साहित्यकार सेहो रहथि। सीतायन समान महाकाव्य केर रचना सेहो ओ कएने छथि। हुनकर कइएक रचना जन-जन केर वाणी मे समाहित अछि। ‘जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर’, ‘बाबा बैदक नाथ कहाबी से सुनि शरण मे एलहुँ ना’ – ई दुइ रचनाक अमरता केर बातहि जुनि पुछू। पीढी-दर-पीढी एकर प्रयोग होइत रहत।

मैथिली लेल कतेको तरहक त्याग सेहो कयलनि प्रदीपजी। आकाशवाणी दरभंगाक स्थापना क्षेत्रीय भाषाक उत्थान लेल कयल गेल, परञ्च अराजक आ षड्यन्त्रपूर्ण राजनीति सँ एतय मैथिलीक उपेक्षा कयल जाइत रहल – एहि बातक घोर विरोध करैत आन्दोलन सेहो कयलनि प्रदीपजी। कहल जाइछ जे हुनका बाकी लोकक संग नहि देलापर असगरो अनशन पर बैसि मैथिली लेल न्याय मंगैत रहला। सरकारी नौकरी मे रहैत आन्दोलनी होयबाक कारण नौकरी पर खतरा सेहो एलनि मुदा ओ ताहि सब सँ कनिकबो विचलित नहि भेलथि।

एतबा नहि, प्राथमिक शिक्षा मे मैथिली माध्यम सँ सब विद्यालय मे पढाई हो ताहि लेल हुनका द्वारा एकटा संस्था सेहो खोलल गेल छल, जाहि लेल हुनका ‘कारण बताउ’ आर ‘निलंबन’ तक केर सजाय भुगतय पड़लनि। हिनक जीवन चरित्र एकटा उपदेश अछि।

“एकटा बात कहब हम सदिखन मिथिलावासी सँ
मैथिलीक अधिकार लेल लड़ू नहि डरू जहल आ फाँसी सँ”
– श्रीमैथिलीपुत्र प्रदीप

एहि पाँति संगे ‘मिथिला क्रांतिदूत संघ’ चलयबाक लेल दंडित भेल छलाह मैथिलीपुत्र प्रदीप। सीआईडी इन्कवायरी बिहार सरकार करेने छल हिनक विरूद्ध। इन्कवायरी कयनिहार पदाधिकारी मिथिला आन्दोलनक पुरोधा व्यक्तित्व डाक्टर लक्ष्मण झा केर ग्रामीण रहथि, डा. झा केँ कहलखिन जे एना ई अपन बात पर अड़ल छथि ताहि मे नौकरी जा सकैत छन्हि। डाक्टर साहेब प्रदीपजी केँ बजेलनि आ कहलनि जे अहाँक नौकरी करबाक अछि, अहाँ हिनका सहयोग करियौन। तहन नौकरी बाँचल। संस्था ताहि उपरान्त पं. देव नारायण झाजी चलाबय लगलाह।

मैथिली जिन्दाबाद वेब न्यूजपोर्टल पर सेहो प्रकाशित प्रो. मिश्र केर ई संस्मरण अनुसार आकाशवाणी दरभंगा द्वारा मैथिलीक उपेक्षा पर बिन्दुवार एकटा नम्हर पत्र वरिष्ठ साहित्यकार आकाशवाणी महानिदेशक दिल्ली केँ देल गेल छल। ओतय सँ जे उत्तर आयल ताहि मे मैथिली प्रति लक्षित अपमानजनक भाषाक प्रयोग कयल गेल छल। ओकर प्रकाशन ०२/०६/१९८३ केँ ‘स्वदेश दैनिक मैथिली’ जे परम आदरणीय सुरेन्द्र झा सुमन केर समपादकत्व मे दरभंगा सँ निकलैत छल, ताहि मे छपल रहय। साहित्यकार पत्र आ ३ जून केँ महनिदेशक केर उत्तर छपल आ ४ जून एकटा आदरणीय साहित्यकार केर आह्वान जे एहि स्थिति मे जे आकाशवाणी दरभंगा मे कार्यक्रम मे जाओत ओ मैथिली विरोधी होयत। ई देखि प्रदीपजी ५ जून केँ स्वदेश पत्र मे लिखलनि जे ६ जून केँ हमर कार्यक्रम अछि, ओकर हम बहिष्कार करैत छी। जाबेतक मैथिलीक सम्मान नहि भेटत ताबेतक आकशवाणी दरभंगा मे नहि जायब। हिनकर देखादेखी आरो १२ गोटे साहित्यकारक पत्र ६ जून केँ छपल जे हमहुँ सब बहिष्कार करैत छी।

एहि तरहक बहिष्कार करबाक प्रतिक्रिया देखि लोक मे उत्साह आयल जेकर बदौलत मैथिली आन्दोलन १९८३ सँ चलल सेहो दाबी करैत कहैत छथि प्रो. मिश्र। परंच जून मे शुरू भेल दिसम्बर तक अबैत-अबैत बेसी साहित्यकार आकशवाणी जाय लागल छलाह। ई आन्दोलन कमजोर भेल। दूटा साहित्यकार मात्र आन्दोलन मे बाँचि गेला। एकटा आदरणीय साहित्यकार १९९३ मे प्रदीपजी केँ पत्र लिखलनि जे हम साहित्य अकादमी केर पुरस्कारक दौड़ मे छी तैँ हम भारत सरकारक एकटा संस्था सँ पुरस्कार लेब आ दोसर केर विरोध करब, से ठीक नहि होयत, तैँ हम आकाशवाणी जायब, अहूँ चलू। प्रदीपजी पत्रक माध्यम सँ उत्तर देलखिन जे हमर मैथिली केँ सम्मान नहि भेटत, हम नहि जायब, अहाँ जा सकैत छी। आब असगरे रहि गेला श्रीमान्। ओहि साहित्यकार केँ आकादमीक पुरस्कार भेटि गेलनि।

एकटा आर अत्यन्त महत्वपूर्ण आख्यान केँ स्मरण करैत कहलथि प्रो. मिश्र जे जखन २००४ मे संविधानक आठम अनुसूची मे मैथिली केँ स्थान भेटि गेल, तेकर बाद आकाशवाणी दरभंगाक निदेशक स्वयं प्रदीप जीक आवास पर आबिकय कहलखिन जे अपनेक सब माँग मानैत छी, आबो अपने आकाशवाणीक बहिष्कारक परित्याग करू। तखन प्रदीपजी फरबरी २००४ मे लगभग २१ बर्खक बाद आकाशवाणी दरभंगा मे फेर सँ गेला।

एहि महान मनीषी आ मैथिलीपुत्रक हालहि ३० मई २०२० केँ देहावसान भऽ गेलनि। हुतात्मा केँ बेर-बेर नमन! एहि मैथिलीपुत्रक अंश मात्रो जँ अपन जीवन मे मैथिली प्रति सेवाभाव राखि सकब त अपन जीवन धन्य बुझब। अन्त मे सम्पादक डा. महेन्द्र नारायण राम प्रति सादर आभार जे हमरा ई लेख लिखबाक प्रेरणा आ आदेश देलनि, हम अपना केँ लेख लिखि गंगा स्नानक लाभ प्राप्त होयबाक अनुभूति कय रहल छी। उम्मीद अछि जे पाठकहु लोकनि केँ यैह अनुभूति भेटतनि। ॐ तत्सत्!

हरिः हरः!!

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