नेपाल मे मगही के जनम आ विकास ऊपर दुइ टप्पी

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

सब कोइ पढय, सब कोइ बढय
 
हमर एक मित्र-भाइ संतोष कुमार साह (रौतहट) आइ अपन एक संवाद से ध्यानाकर्षण कयलाह। ओ लिखने रहथि निम्न पोस्ट केर बारे मे जे ई एक नौटंकी थिक – सन्दर्भ पोस्ट जहिनाक तहिना लिखि रहल छीः
 
“नाम :- दिपेन्द्र कुमार कापरी
ठेगाना :- हसपुर नगरपालिका:-१ धनुषा
समाजबादी युवा संघ धनुषा अध्यक्ष
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मगहीयन समाजके लेल कुछ इ जानकारी
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तराई मधेश क्षेत्रमे बहुसंख्यक लोग बोलेबाला भाषा मगही भाषा हय, जेकरा लोग ठेठी, देहाती, खिचडी भाषाके रुपमे जानल जाइत हय । इ भाषाके क्षेत्र पुरुबके झापासे लेके पश्चिमके रौतहट तक हय । मगही भाषा बिशेष कके तराई भेगमे मुलवासी, दलित, जनजाति, पिछ्डावर्ग के लोग मगही भाषा बोलैइ हय आ सास्कृती मनाबैय हय । मगही भाषा इ. स ६०० बर्ष पुराना भाषा मगही रहल हय । मगही भाषाके किताब भाषा आउर साहित्यके अनुसार गौतम बुध्द, चक्क्रवर्ती राजा अशोक सम्राट, चाणक्य, महाबिर के भाषा मगही रहल उल्लेख हय । अइसे देखल जाइ हय जे मगही भाषाके बिशाल रुप होयतोमे मगही भाषा आ सास्कृतिके मुठ्ठी भर लोग षड्यन्त्र पुर्वक मधेशमे मगही भाषाके गौण कयले हय । तैलेके समय आइब गेल हय सचेत होयके आ अपन मगही भाषा आ सास्कृतिके बचाबेके आब देर न कके मगही भाषके अस्तित्व खातिर सचेत रहनाइ जरुरी हय आ आबेलाला जनगणना मे मगही भाषा लिखाबेजे लेल न भुलब से आग्रह आ निहोरा हय । अइ समाजके लोग बिशेष कके मथामे पगरी बानके कुनो भी काम करैय हय मगहीन समाजके प्रतिनिधित्व पगरी पहिचान हय । जय मगही जय मधेश । बाकी बात दोसर बेरमे ।”
 
मित्र-भाइ सन्तोष कुमार साह स्वास्थ्यकर्मी हय, तय लागि हुनकरे भाषा-शैली मे हम मैथिली मे जबाब दैत किछु लिखली ह से अहाँ आर के लागि परैस रहल छी। हम कहली –
 
ई नौटंकी नइ हय हो डाक्टर साहेब। समाज के विकास के लक्षण हय। अपना बोली आ भाषा से प्रेम हय। सब के लिखे-पढे के निशानी हय। तब नाम के भ्रम हय। हमरे नजर से ई मैथिली हय, ओकरा अरु के ई मगही हय से सिखउले हय ओकर मैनजन आर। ई से हमरा कउन समस्या? हमरा त अपन गाम, समाज, अपना मिथिला के लोक मे भाषा-संस्कृति के प्रति जागरुकता आ विकास से मतलब हय। हय कि नय?
 
मैथिली के जोन भाषा लिखित साहित्य मे स्थान पेलक ओकरा से तनि सा हंटके कुछ बोली शबद सब विशुद्ध देहात के ठेंठी लबज के, आम जाति-समुदाय के लोक सब के द्वारा प्रयोग करेबला शबद सब के समेट के लिखय हय आ नाम दय हय जे हम मगही मे लिखली हय। अरे! डाक्टर साहेब! ओ लिखय हय ईहे बड़का बात भेलय। मगही के नामे पर लिखत तबो ओकर पिछड़ापन आ असाक्षरता दूर होतय। लिखे-पढे के फाइदा समाज के निचला स्तर तलिक पहुँचतय। एकरा समाज के विकास बुझू। भले ओ लोक सब अपना केँ मैथिली के प्रचलित साहित्य से इतर बुझय हय, तेकर पाछाँ एक राजनीतिक सूत्र भी काम कर रहल हय। निश्चित ई से मैथिली के नोक्सान होतय, लेकिन दूरदृष्टि से देखब त ई मैथिली के असल काज करय हय।
 
हमर जेतना समाज प्रति अध्ययन हय, जेतना लोक सब के देखली-बुझली-सिखली ओकरा हिसाब से अभियो पिछड़ा वर्ग के बहुल्यजन मे पढाई-लिखाई से डर के माहौल हय। सरकार (राज्य) से ले के एतना लाखों एनजीओ आ यूएन के प्रोजेक्टेड आईएनजीओ सब भी थक के चूर हो गेलय पर साक्षरता के लागि टारगेट प्वाइन्ट मीट करना चुनौती बनले हय। तब अभी कुछ समय से नेपाल ओरी के कुछ राजनीतिक लोक मैथिली के विरूद्ध षड्यन्त्र करे लागि ‘नेपाली मगही’ के जनम देलय हय आ प्रचार करय हय जाति-पाँति के हिसाब से बोलल जायवला ठेंठी-देहाती मैथिली के मगही बोल के।
 
एकरा पिछू एक्के कारण हय जे ओकरा आर मे मैथिली के वर्तमान प्रचलित मानक मे मैथिली के ब्राह्मी भाषिका चलय हय जेकरा लिखय वा बोलय मे आम मैथिलजन के कठिनाई हय। भाषाविद् डा. राम अवतार यादव के देल परिभाषा अनुसार ब्राह्मण व अन्य सुशिक्षित-सुसंस्कृत समुदाय द्वारा बोलल या लिखल जायवला मैथिली भाषा जइ मे संस्कृत के बहुल्य शब्द जइसन के तइसन प्रयोग होइ हय ओकरे मैथिली के ब्राह्मी भाषिका बोलल जाय हय। लेकिन निष्कर्षतः बात एतने हय जे ईहो नेपाल के कथित मगही मातृभाषा बोलेवला आर लिखय हय मैथिली लेकिन कहय हय मगही। जब भाषाविद् अरु से एकरा बारे मे पूछल गेलय तब ओ सब बड़ा निमन ढंग से वर्णन कएने रहला – कहला जे अहाँ जे बोलय छी से हम बुझय छी, हम जे बोलय छी से अहाँ बुझय छी, ई हिसाब से हमरा-अहाँ दुनू के भाषा एक भेल। अब अहाँ एकरा मैथिली बोलू या मगही बोलू! (डा. राम अवतार यादव, १६म् अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन, जनकपुर के संबोधन मे) – ई हिसाब से देखू त मिथिला मे मगही-मगही करेवला लोक मैथिलिये लिख रहलय हय। ओकरो आर लिखय-पढय हय से काम मैथिलिये के हो रहल हय। ओकर ई नारा ‘जय मगही, सब कोइ जगही’ हमरा त एतना निमन लागय हय जे हमहुँ साथी सब मिलिते देरी स्वतः बोलय लगय छी ‘जय मगही, सब कोइ जगही’।
 
अभिये देखू, जेतना मगही अभियानी अरु हय से भाषा के साथ संस्कृति के बात भी कर रहलय हय। संस्कृति से संस्कार के विकास करे खातिर ‘मगही’ के नाम पर आगू जेतय त हमरा-अहाँ के दरद कियै होइ हय? ऊ सब छय के हय बोलतय-लिखतय, आ मैथिली के मगहिये बोलतय, तय से मैथिली के नोक्सान कि होतय? समाज मे जन-जन के साहित्य से प्रेम बढय, संस्कार मे बढोत्तरी हुअय, तब सब के विकास होतय। आ बाद मे जब पढाइ करय लागत, जब भाषा-विज्ञान आ किताब सब ताकय लागत, तब अपने मगही आ मैथिली मे फरक बुझा जेतय। मगही के कौन भाषा विज्ञान हय, केहेन साहित्य हय, पटना विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय, आदि के विद्वान् सब तबे न कुछ कहतय? उच्च अध्ययन मे जब जेतय तबे न मैथिली आ मगही के फर्क बुझ सकतय? की?
 
अब जइसे एगो उदाहरण लू – नेपाल के मगही भाषी एगो सृजनकर्मी के रचना जइसन के तइसन हम लिख रहली ह –
 
शिर्षक :- धधकै हय लोक
मातृभाषा:- मगही
लेखक :- सन्त सत्यनारायण आलोक
 
पहारसे उपर मेघपर सवार भक
अगियाक चलैत कत्ते धधकैय हय लोक ।
कमजोर सबके गोइत गाइतक
घुसैट घुसैटक, कतेक मारैय हय लोक ।
कनि टुनमुनायल साच बजैला तब
बलुवारसब सरिफसबके
बजाइर बजाइर मारै हय लोक ।
पहारसे उपर मेघपर सवार भक,
अगियाक चलैत कतेक धधकैय हय लोक ।।
 
लोकोके कित्ता अपनेमे नपाक,
मुह दुबरके कनियाके सबके भौजाइ
कहाक, एहने कहानीके घुरा फिराक
कि पढल कि मुरखाहा आ
दुनू फेरा फेरी मिला जुलाक
एहने काम खाली करैय हय लोक ।
पहारसे उपर मेघपर सवार भक,
अगियाक चलैत कतेक धधकैय हय लोक ।।
 
पइढ लिख धन कमाक,
कमा खटाके फेर कमजोरके सतबैय हय,
सिधा सपट्टा कहियो ने झगरा करेबालाके
कोनो गाव आ शहरमे कहियो ने
कैनको इज्जत करैय हय लोक ।
पहारसे उपर मेघपर सवार भक,
अगियाक चलैत कतेक धधकैय हय लोक ।।
 
चोरसे डेराइ हय, उचकेके पतियाइ हय
उघार देह आ अङ्ग्रेजी लवज कोनो विधि सिख साइखक,
बैष्णव आ इमन्दार साधुके कोनो
उपदेश नै, कहियो सुनै हय लोक ।
पहारसे उपर मेघपर सवार भक ,
अगियाक चलैत कतेक धधकैय हय लोक ।।
 
आखिर धर्ती उसना पिचाक
सब पढल आ बैज्ञानिक नेता
चोर उचाकाके हाथे बिकाइबाला
इ हय दुनियाँके रित ,
अपन उपर जब भार परैय हय
तब छाती पिट पिटक देखियौ
केना चिच्याइ हय लोक ।
पहारसे उपर मेघपर सवार भक,
अगियाक चलैत कतेक धधकैय हय लोक ।।
 
सत्यनारायण आलोक के लिखल हय – मगही मातृभाषा मे ई कविता – धधकैय हय लोक – कनी एकरा पर गौर करू आ बोलू जे ई मे मैथिली से कोन शबद फरक हय? भाषा-विचार से व्याकरण के नियम आ सूत्र सब के प्रयोग करैत देखब त अभी ऊपर के देल एक कविता मे कतेको अशुद्धि मिलत, उच्चारण अनुसार लेखन नहि भेल हय, नहिये शब्द के लिखय मे ओ समस्या दूर भेल हय जेकर आरोप लोक मैथिली पर लगाबय हय… खाली भाषा के नाम बदल के आ क्रिया व सहायक क्रिया के बोधक शब्द सब के शैली मे थोड़-बहुत लबज के फरक के प्रयोग करके भाषा हो गेल हय ‘मगही’। अब ईहे रचना कउनो मगही भाषा के विद्वान् के देखाबू आ एकर शुद्धीकरण कराबू तब पता लागि जाइ हय जे ऊपर के रचना मैथिली हय कि मगही हय।
 
आखिर मे हम एतने कहब, कइसनो करके यदि समाज मे साक्षरता के दर बढय हय, लिखय-पढय के माहौल बनय हय, भाषा-संस्कृति के महत्व सब जन-जन धरि पहुँचय हय, तब जनक-जानकी के मिथिला के लिये ऊहे ‘अच्छे दिन’ हय। सब के समय पर ज्ञान होतय जब शिक्षा मे ओकर भाषा प्रवेश पेतय। जब पाठ्यसामग्री के विकास के काज ओकरा अरु के करय पड़तय, सारा षड्यन्त्र आ नौटंकी स्वतः समाप्त हो जेतय। लेकिन हम फेनो कहब, ई नौटंकी नहि समाज के जागृति हय। सब कोइ बढय, सब कोइ पढय। अस्तु!
 
हरिः हरः!!
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