पुरस्कृत मैथिली कथाः फूलमतिया

मैथिली कथा

– पीताम्बरी देवी, कबीर चक, दरभंगा

(दहेज मुक्त मिथिला समूह पर आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता मे ई कथा तृतीय स्थान लेल पुरस्कृत कयल गेल अछि।)

फूलमतिया

बेचना भोलाबाबू के ओतय सबदिन हुनकर बेगारि खटलक। भोलाबाबू सब किछु बेचना पर छोड़ि देने छथिन। माल जाल खेत पथार सबटा के भार बेचना के छै। कोन खेत में हर लगतै, कत’ कमैनी हेतै, कत’ कतेक जन लगतै, सबटा बेचना जानय। भोलाबाबू गाम के पैघ खेतिहर छथि 40-45 बीघा जमीन छन्हि। आर कलम गाछी काठ बास अलगे। बेचना विश्वासी समांग जेकाँ छन्हि। ओना भोलाबाबू सब दिन नहा सोना पूजा पाठ क’ के जलखै क’ के एक बेर खेत पर जाइते छथि, मुदा टहैल कय देखै टा छथिन, काज त सबटा बेचना सम्हारने छनि।

भोला बाबू के चारि टा बेटी आर तीन टा बेटा छन्हि। बेटी सब के विवाह दान भ’ गेल छन्हि। बेटो सब पढ़ि-लिखि कय शहर मे नौकरी-चाकरी करैत छथिन। बेचना मालिक के विश्वासी त अछिये, मलिकाइन सेहो बड मानै छथिन। किया ने मानथिन! सब बेटी सब के जखनि-तखनि आम, कटहर, लीची भार दौर सबटा साईकिल से पहुंचा अबै छेन। तेँ दाय सब सेहो बेचना केँ पाय, कपड़ा, बेटा-बेटी केँ फराक, कुर्ता, सब किछु दैत छथिन।

बेचना केँ तीन टा बेटा आर एकटा बेटि फूलमतिया। छौंड़ा सब थोड़ बहुत पढ़लकै आर दिल्ली कमाय लेल चल गेलै। फूलमतिया केँ नीक घर-वर देखिकय विवाह कय देलकै। लड़का दु भाइ छैक। दरबाजा पर जोड़ा बरद, दू बीघा जोता जमीन, पक्का के स्बेस्टस के घर, सब तरहे नीक लड़का, सेहो मैट्रिक पास! बेचना सेहो अपना सामर्थ के हिसाब सँ खूब दैलकैक। फूलमतिया खुशी सँ सासूर रहय लगलै। बेचना अपन महिस बेटी केँ द’ देलकै। भोरे उठिकय सासु महींस के दुध ल’ के उठौना पर चलि जाय आर फूलो घर के काज, गोबर-कर्सी, जलखै, कलौ सब मे लागि जाय। खटैत-खटैत एक बाजि जाय, ओकरा कियो पूछनहारो नहि। सासु आबै तखन हन-हन, पट-पट करैत पुतहु केँ गंजन करय लागय, एतेक बेर तक बैसल छलौं, कोन पहाड़ ढाहैत छलौं जे नहेलौं हँ नै। फूलो हबर-हबर नहाय लेल चलि जाय।

समय बीतल जाय आर बेर-बेर फूलो केँ नैहर सँ पाय मांगै लेल कहय लगलैक। फूलो बाप केँ फोन करय, “बाबू, खेती के टाइम छै से किछु पाय के जरूरत छलै।” बेचना तुरंत रुपैया ल’ के द’ अबैक। अपना लग नै रहैक तऽ मालिक सँ उधारी लय केँ द’ अबैक। मालिक कहबो करथिन जे बेर-बेर पाय मंगैत छौक से नीक बात नहि, ओकरा सब केँ मंगै के लोभ बढ़ि जेतैक। मुदा बेचना बेटी केँ खुशी लेल द’ अबैक। फूलो जखनि बाप सँ गप्प करय चाहय तऽ सासु धूरखुर लग ठाढ़ भ’ जाय। फूलो केँ जखनि-तखनि घरवला मारय लागल छलैक, नैहर तऽ नहिये जाय दैक। मुदा फूलो सबटा गप्प पेट में रखने छलय। बाप केँ किछु नै कहि पबैत छल।

फूलोक पेट मे बच्चा छलैक। सासु पोता केर रट लगौने छलैक। मुदा फूलो केँ बेटी भेलैक। आब त सब केँ आर खटकय लगलैक फूलो। एक दिन अचानक एकटा बरद मैर गेलै, आब सासु आर घरबला कहय लगलैक जे बाप केँ कहिन एकटा बरद द’ जेतौ। फूलो बुझैत छलय जे बरद औतैय तऽ जेतै नै, ई सब राखि लेतैक। फूलो साफ कहि देलकै जे हम बाबू सँ बरद नै मंगबै, एतेक दिन पाय मंगलियैक, कहियो ई सब घुरौलखिन नै। आब बरद राखि लेथिन त बाबू कथी सऽ खेती करतै। हम बरद नै मंगबै। तहि पर सासु-ससुर बड बात कहलकै आर घरवला पेना सँ माल-जाल जेकाँ डेंगा देलकैक।

फूलो केँ बुझा गेलैक जे आब एतय सँ चलिये जाय ताहि मे नीक। राति मे सब केँ खुआपिया कय फूलो सुति रहल। भरि गाम निसबद भ’ गेल। फूलो नेना केँ छाती मे सटा लेलक आर साझे मे मोटरी बान्हिकय कोठीक दोग मे रखने रहय से कांख तर ल’ लेलक आर चुपचाप अंगना सँ निकलि गेल, आर नैहर लेल बिदाह भ’ गेल।

निसाभाग अन्हरिया राति, सुन सड़क पर फूलो भागल चलि गेल आर माय केर देहरी पर आबिकय धराम सँ खसल। सब उठलैक। माय केबार खोललक तऽ देखलक बेटी देहरी पर बैसल अछि। माय केँ देखि बेटी भरि पाँज केँ पकड़िकय कानय लागल। फेर सबटा दुखरा कहलक आर कहलक यदि हमरा जिबैत देखैक छौक तऽ हमरा फेरो ओहि कसाई केर घर मे नै पठबिहें‌ ।आर सैह भेलै, नैहरे मे बोनि क’ कय मलकाइन सब केर घर मे काज कय केँ फूलो दिन काटय लागल। बेटी केँ पढ़ौलक-लिखौलक, बेटी केँ नियोजीत शिक्षिका मे बहाली भ’ गेलैक। आइ सत्यनारायण भगवान केर पूजा केलक, सब केँ पान प्रसाद बँटैत अछि आर सब फूलो केँ आशीर्वाद दय रहल छैक।

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