दहेज प्रथाक समर्थन कुलीनताक परिचायक नहि – एहि विषयपर सियाराम झा सरस केर विचार

विचार-विमर्श

दहेज मुक्त मिथिला (फेसबुक समूह) पर एक सँ बढिकय एक विद्वान् ओ विदुषीक उपस्थिति अछि आर एतय सदिखन कोनो न कोनो उच्च महत्वक विषय पर विमर्श होइत रहैत अछि। जतबा सक्रिय पुरुष लोकनि छथि, ओतबा सक्रिया महिला लोकनि सेहो देखाइत छथि। एना बुझाइत रहैत अछि मानू याज्ञवल्क्य आ गार्गी बीच जनकक सजल दरबार मे शास्त्रार्थ चलि रहल हो।

ग्रुपक मर्यादापालक प्रवीण नारायण चौधरी द्वारा काल्हि एकटा विचार राखल गेल छल – “कुलीन परिवार कदापि दहेज नहि मांगैत अछि। श्रोत्रिय ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ समुदाय एकर स्थापित उदाहरण छथि। क्षुद्र, लोभीक बाते छोड़ू!” एहि विन्दु पर कतेको रास प्रतिक्रिया आयल। कतेको लोक एहि बातक खंडन सेहो कयलनि। किछु लोक केँ दहेज मुक्त मिथिला मंच मे जातिवादक महिमामंडन होइत सेहो बुझेलनि। लेकिन ताहि सब सँ इतर जे विद्वत् वर्ग रहथि ओ पोस्ट केर सार्थकता केँ बुझैत गमैत अपन-अपन विचार देलनि। कहल जाइत छैक जे श्रेष्ठ आचरणक अनुकरण करी। मिथिला समाज मे दुइ समुदायक विशेष उल्लेख करैत ‘कुलीनता’ केर निशानी दहेज मुक्त होयबाक विन्दु पर एतेक प्रतिक्रिया भेटब मिथिला समाजक संवेदनशीलता केँ झलकबैत अछि। एहि विषय पर मैथिलीक श्रेष्ठतम् गीतकार सियाराम झा सरस सेहो विचार देलनि अछि जे प्रकाशन योग्य बुझायल, ई पढिकय बहुतो लोक केँ एकटा मार्गदर्शन भेटब निश्चित अछि।

प्रिय प्रवीण,

हम स्वयं सोलह आना शुद्ध नहि छी एहि विषय मे। अबोधहि मे इच्छाक विपरीत विवाह कराओल गेल छल। पछाति होशगर भेलापर तीन तरहेँ तकर प्रायश्चित्त केर चेष्टा कयल :-

  1. बिगत पाँच दशक सँ एहि तिलक-दहेजक विरोध मे लिखैत आबि रहल छी । मोन पाड़ू – ”डेढ़ लाखमे डाकदर आ लाख टके इंजीनियर, लिय’ लिय’ परफेस्सर पचहत्तरिए हजार मे यौजी!!” अथवा “एक आदर्श वियाहमे बरियाती हमहूँ गेलिऐ…” अथवा “अपरेशन दुलहा एस्टारम: भजकलदारम – भजदिलदारम्…” अथवा “एहेन इस्पेशल कनियाँ देखलौं ने सुनलौं हे, भी.आइ.पी. कनियाँ ! कनियाँ निकललै साबा सेर….हे….” इत्यादि। तहिना कैक गंभीर कविता-कथा मे सेहो एहि समस्या केँ राखि विमर्श प्रस्तुत कयल। से औखन चालू अछि।
  2. जेठ बालकक विवाह आहाँ क लागिये मे कराओल, वर आ डरेबरसहित पाँचगोटे गेल रही राँची सँ पटना। विवाहक प्रातःकाल दुरागमन करौने आबि गेलहुँ। बालक हमरहु गुरु निकललाह जे, जे धोती-कुरता पहीरि वियाहल गेलाह, से पर्यंत ओतहि फेरि घर अयलाह।
  3. बेटीक वियाह लेल ततबा शुद्धताक निर्वाह नै भय सकल…तकर कचोट अछि !

मुदा असल बात जे कहबाक छल, से ई जे :- डा.सुभद्र झा अपन पत्रोत्तर शैलीक विख्यात पोथी “नातिक पत्रक उत्तर” मे मनु महाराजक संदर्भसँ लिखने छथि जे प्रकृति-पुरुषक सम्मिलन सहजात स्वाभाविकता थिक, ठीक ओहिना जेना गाय-साँढ़क मिलन। एहि क्रिया मे तिलक-दहेजक अवरोध जे क्यो ठाढ़ करैछ, से अस्सी हाथ नर्क मे जाइछ (किएक तँ ओकर तँ प्रथमहिं इहलोके बिगड़ि जाइत छैक, तखन परलोकक की हाल हेतैक, से सोचबाक थिक) !!

हमसब एहने पतनशील समाजक हिस्सा थिकहुँ ! मुदा दर्शन तैयो झारब–“अहं ब्रह्मास्मि…..!”

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