सिन्दूर के भार – मर्मस्पर्शी मैथिली कथा

साहित्य – मैथिली कथा

लेखिकाः वन्दना चौधरी

– वन्दना चौधरी, विराटनगर

चतुर्थी के भोर छल, सुजाता स्नान करै के लेल कोबरा स अनहरोखे बहरेली जे कियो देख नै लिये अपन पति आनंद के सुतले छोड़ि क। आनंद सेहो अनठा क आँखि मुनने पड़ल छेलाह बिछान पर।

सुजाता जखन स्नान क’ क’ वापस एली ताबे तक आँगन में सेहो सब जागि गेल छल। कोबर में पैर दैत सुजाता के दिमाग सन्न रहि गेल जे आनंद कतय गेला एते भोरे उइठ क’, फेर मोन में आयल जे भ’ सकइये बाहर टहलै लेल निकैल गेल हेता। ताबे तक त आनंद के लेल चाह, जलखै सब चीज कोबर में सुजाता के माय आनैथ और आनंद के नै देखि सुजाता स आँखिक इशारा में बात क’ घुरि जाइथ। दुनू माय बेटी के आँखि में एक दोसर के लेल प्रश्न स्पष्ट झलकैत छल। देखिते देखिते एक पहर स दोसर पहर, दोसर स तेसर पहर बीति गेल आनंद नै एला।

सुजाता के आँखि त सिंदूर सनक लाल भ’ गेल छल कनैत कनैत। आनंद के पिछला रातिक रुख्ख व्यवहार सब स सुजाता के मोन त डरायल छेलाइन्हे, आब त और चारू तरफ अंधकार देखाय लगलैन, विभिन्न तरहक शंका और प्रश्न मोन में तीव्र गति स चलि रहल छेलैन्ह। इम्हर सुजाता के पिता और भाय दबले मुँहे चारू तरफ खोजि लेलैन लेकिन आनंद नै भेटलखिन्ह।

अहिना करैत एक मास जखन बीतल त एक दिन आनंद के अचानक स फोन आयल, जे दहेज में जे हमर किछ पाय अहाँ सब बाँकी रखलौं तें हम अहाँ सबके सबक सिखबै लेल एहेन काज केलौं। आब ई सिंदूर के भार अहाँ सब दिन हमरा बिना अहिना उठायब, हम घुरि क’ नै आयब आब, हमरा संगे धोखा भेल। ई सुनिते मूर्छित भ’ सुनीता धरती पर खूब जोर स’ खसली। माता पिता के लेल बेटी के ई दुःख आब शूल जेकाँ ग़रैत छल छाती में।

एम्हर गामक लोक तरह तरह के बात सब स’ क’ क’ सुनीता और हुनकर परिवार पर और वज्राघात करैत छल, जे केहेन अभागल अछि जे घरवाला छोड़ि क’ चलि गेलै, जरूर एकरे में कोनो दोष हेतै। ककरो बिन जवाब देने सुनीता चुपचाप अपन कपार के दोख दैत और रस्ता बदैल लैत छली।

जेहने देखैत छेली सुंदर तेहने पढ़ल लिखल ग्रैजुएट केने। गामक स्कूल में समय काटै के लेल पढेनाय शुरू क’ देली, लेकिन ओतहु ओहने तरहक माहौल धीरे धीरे बनय लागल। सुनीता के लेल ई दुःख सहनाय आब असह्य भ’ गेल छल। सिंदूर के भार एहेन होयत ओ नै सोचने छेली कहियो।

आय देखिते देखिते विवाहक एक वर्ष पूरा भ गेल, सुनीता भोरे उठि कागज और कलम ल मोन क सब व्यथा लिखि क’ और ओहि कोबर के धरैंन में फ़सरी लगा अपना आप के खतम क’ लेली, लेकिन सिंदूर के भार तैयो हुनका संगे गेलनि ओ मरलो पर ओहि स’ मुक्त नहि हुअ सकलीह।

केहेन छैक ई समाजक विडंबना जे, जे एक चुटकी सिंदूर के भार द’ क’ ओकर जीवन तक ओकर अपन नहि रहय दैत छैक आ ने मृत्यु उपरांत ओकर भार कम होइत छैक।

आ देनिहार एहेन एहेन लोभी आनंद सब सन जँ भ’ जाय त कतेको सुजाता के जीवन दहेजक चिता पर भस्म भ’ जाइत छैक, और ओ दानव सब निडर भ अहि समाज में घुमैत रहैए फेर स’ दोसर सुजाता संग घर बसबै के ताक में, जतय मुँह फाड़ि क’ दहेज माँगि सकय।

हमर ई कथा केहेन लागल अहि पर अपन अपन मत जरूर देब।

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