मूर्ख मित्र सँ विद्वान् शत्रु नीक

कथा पंचतंत्र सँ

अनुवादः प्रियशील नारायण चौधरी (संपादनः प्रवीण नारायण चौधरी)

मूर्ख मित्र खराब

एकटा राजा बड़ा मोन सँ एकटा बानर पोसलथि। राजा आ बानर मे बहुत प्रेम छल। ओ बानर सेहो राजाक सच्चा सेवक रहय। जे राजा केँ बहुतो काज अपने-आप कय दैत छल। एक दिन दुपहर मे राजा सुतल छलखिन। राजा केँ गर्मी सँ बचेबाक लेल बानर पंखा डोला रहल छल। एकटा माछी बेर-बेर राजाक छाती पर आबिकय बैसि जाइत छलैक। और, बानर पंखा सँ ओहि माछी केँ हरेक बेर उड़ा दैत छलैक। माछी उड़ि जाइत छल आर फेर ओतहि आबिकय बैसि जाइत छल। जखन कतेको बेर एहिना केलक तहन बानर केँ माछी पर बहुत तामस एलैक। तहन ओ देवाल पर टांगल तलवार उतारिकय राजाक छाती पर बैसल माछी पर भरपूर ताकत सँ तलवार चला देलक। माछी त उड़ि गेल लेकिन राजाक शरीर दू टुकड़ी भऽ गेलैक। तेँ कहल गेल छैक जे मूर्ख मित्र खराब, विद्वान् शत्रु नीक। आब विद्वान् शत्रुक कथा सुनू।
 

विद्वान् शत्रु नीक

 
एकटा शहर मे एकटा बड़ा विद्वान् पंडित रहैत छलाह। मुदा परिस्थितिवश ओ चोरी आर ठगी आदि जेहेन कर्म कय केँ जीवनयापन करय लेल विवश भऽ गेलाह।
 
एक दिन ओ दूर देश सँ आयल चारि ब्राह्मण पुत्र केँ किछु कीमती वस्तु सब बेचैत देखलखिन, ई देखि हुनकर मोन मे लालच आबि गेलनि। ओ सोचय लगलाह जे हिनका सब केँ केना ठकल जाय? कनीकाल बाद ओ किछु उपाय सोचिकय हुनका सब लग जाकय बड़का-बड़का श्लोक सभक उच्चारण करय लगलाह। हुनकर एहि तरहें श्लोक पढैत देखि ओ ब्राह्मण पुत्र लोकनि काफी प्रभावित भेलाह। ओ सब जखन हुनकर नाम, गाम तथा काम आदिक बारे जिज्ञासा कयलनि तऽ पता लगलनि जे ब्राह्मण पंडित जीविकाक खोजी मे छथि। एहेन विद्वान् केँ ओ लोकनि अपन सहयोगी सेवक बनाकय अपनहि पास राखि लेलाह।
 
कियो ठीके कहने छथि – अत्यन्त लजालू नारी कुल्टा (कुटिल) होइछ, खारा (नमकीन) पानि ठंढा होइछ, आर, मीठ बात करयवला पुरुष धूर्त होइछ। ओ चारू ब्राह्मण पुत्र लोकनि अपन कीमती समान सब बेचिकय बहुत रास धन एकत्र कय लेलनि आर आगू चलि देलाह। ब्राह्मण सेवक सोचलाह जे कियैक न हम एहि चारू केँ रस्ते मे जहर दय केँ मारि दी आर सबटा धन लय केँ चलैत बनी। एहि तरहें हम धनिक बनि जायब आर रोज-रोज केर ई ठगी धंधा सेहो नहि करय पड़त। ओ पाँचो ब्राह्मण चलैत-चलैत एकटा गामक पास सँ गुजरला तऽ ओहि ठामक जंगल केर डाकू हुनका सब केँ घेर लेलकनि।
 
ओ डाकू सब एहि पाँचो ब्राह्मणक संग मे रहल चीज-वस्तु-नगद सब तकलक, मुदा आश्चर्यक बात ई भेलैक जे हुनका सभक संग मे सँ किछुओ नहि भेटलैक। तखन डाकू कहलकैक, “देखू ब्राह्मण लोकनि! धन तऽ अहाँ सभक पास जरूर अछि, तेँ अहाँ सब अपने सँ ओहि धन केँ निकालिकय दय दिअ। नहि तँ हम अहाँ सभक शरीरक चमड़ियो तक उघारिकय ओहि मे सँ पर्यन्त धन निकालि लेब।”
 
डाकू सभक ई बात सुनिकय ठक ब्राह्मण सोचलथि जे “हम तऽ हिनका सभक सेवक छी और पापियो छी, बूढ सेहो भऽ गेल छी। जखन कि ई चारू एखन नवयुवक छथि। ई डाकू हिनका सब केँ निश्चिते मारि देत आर हमरो नहि छोड़त, तखन कियैक नहि एहि ब्राह्मण पुत्र लोकनिक रक्षाक लेल अपन बलि दय दी? एहि सँ हमर पाप सेहो धुआ जायत। मृत्यु तऽ मनुष्य केँ कहियो न कहियो एब्बे करत।”
 
ई सोचिकय ओ डाकू सब सँ कहला, “भाइ लोकनि! जँ अहाँ सब केँ यैह विश्वास अछि जे हमरा सभक पास मे धन अछि तऽ सब सँ पहिने हमर शरीर केँ विदीर्ण कय केँ ओ धन निकालि लिअ। जँ अहाँ सब केँ हमर शरीर सँ धन भेटि गेल त बुझि जायब जे एहि चारू गोटे केर शरीर मे सेहो धन होयत, नहि तँ हिनका सब केँ मारबाक कोनो लाभ नहि भेटत। तखन अहाँ केँ हिनका सब केँ मुक्त कय देबय पड़त।”
 
ओहि ब्राह्मणक एतेक बात सुनिते ओ डाकू सब ओकर शरीर केँ काटि देलक आर चमड़ी सेहो उघारि देलक। मुदा ओकरा पास धन रहबे नहि करैक त निकलितैक कतय सँ? जखन ओकरा पास सँ धन नहि भेटलैक त डाकू ओहि चारू ब्राह्मण केँ छोड़ि देलक।
 
तेँ कहल गेल अछि जे विद्वान् शत्रु नीक होइत छैक।
 
हरिः हरः!!
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