मैथिलीक एक कालजयी रचना – “जग केँ युग परतारि रहल अछि”

मैथिली साहित्य आ जनसरोकार पर आधारित हमर विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

मैथिलीक एक कालजयी रचना – “जग केँ युग परतारि रहल अछि”

मैथिली भाषाक अत्यल्पे रचना सँ हमरा समान कतेको अल्पबुद्धि परिचित होयत, परञ्च ताहि अत्यल्प रचनहु मे किछेक रचना एहेन अछि जे संसार रीति-थीति देखि बेर-बेर मोन पड़ैत अछि। एहने एक रचना अछि “जग केँ युग परतारि रहल अछि… अपने हाथ सुतारि रहल अछि”। ई कविता हमरा विशेष रूप सँ तखन मोन पड़ैत अछि जखन अनेकों विज्ञजन, बुद्धिजीवी आ चर्चित व्यक्तित्व, सामाजिक अभियन्ता, राजनीतिज्ञ, आदि केँ देखैत छी जे एक-दोसर केँ बौंसबाक प्रपञ्च शब्दाडंबर सँ करैत छथि, कथमपि कर्मठता सँ कोनो अमर कीर्ति रचना कय समाजक वास्ते एकटा ठोस बाट बनेबाक बदला गायले गीत बेर-बेर गाबि एक-दोसराक पीठ ठोकैत रहबाक ई आदति सच मे हमरा आन्तरिक रूप सँ आवेशित कय दैत अछि। तखन त शिष्टाचारक सीमा मे रहब जरूरी होइछ अपनहुँ लेल, किनको द्वारा एहि तरहक आडम्बरी ओ मिथ्याचारी व्यवहार पर चुप रहि स्वयं केर कर्म-कर्तव्य सँ किछु आदर्श स्थापित करबाक नीति पर चलब बेस बुझाइत अछि। खास तौर पर हमर अपन मानसिकता जखन एहि तरहक द्वन्द्व बोध मे फँसैत अछि त ‘जग केँ युग परतारि रहल अछि’ कविताक मुखड़ा निश्चित तौर पर मोन मे बेर-बेर आबि जाइत अछि। ताहि सँ ई रचना कालजयी रचना बुझाइत छल, जेकरा काल्हिक एक चर्चा सँ डा. चन्द्रमणि, श्री उदयचन्द्र झा विनोद, आदि प्रतिष्ठित हस्तीक टिप्पणी सँ पुष्टि भेटल।

 

काल्हि अचानके मोन मे आयल जे एहि रचना केर पूर्ण पाठ करितहुँ, मनन करितहुँ, बुझितहुँ… गूगल सर्च कयल कि कविताकोश केर लिंक मे मैथिलीक एक अन्य महान रचनाकार स्व. कालीकान्त झा बूच केर कृति सोझाँ आयल। ओकर शब्द-रचना मे मुखड़ा मात्र हमरा संतोष प्रदान कय सकल, शेष भाग ओतेक मर्मस्पर्शी व्यक्तिगत तौर पर हमरा मुखड़ाक तुलना मे अनुकूल नहि बुझा सकल। कनेक सन्देह मे पड़ि गेलहुँ। पुनः गूगल कयला उत्तर पंडित चन्द्रनाथ मिश्र अमर केर नाम रचनाकारक रूप मे सोझाँ आयल। मुदा ता धरि मोन हड़बड़ा गेल छल। सब सँ नीक उपाय ई बुझायल जे एकटा प्रश्न पूछि वरिष्ठ सर्जक लोकनि सँ किछु जानकारी समेटि ली। से प्रश्न पूछैत किछु जानकार लोकनि केँ टैग कयल। लगभग सब कियो रचनाकारक नाम मे अमरजीक नाम लेलनि। फेर बूचजीक ओहि कविताक लिंक देल, किसलय कृष्ण कहलनि जे मुखड़ा मात्र समान अछि परञ्च दुनू रचनाकारक रचना भिन्न छन्हि। से सही बात! रचना भिन्न अछि दुनू, केवल मुखड़ा समान। लेकिन मनक इच्छा अनुसार टेक्स्ट उपलब्ध करौलनि विजयदेव झा, अपन अमूल्य आर्काइव केर लिंक शेयर करैत। डा. अमर केर ओहि पुस्तक केँ बड़ा सम्हारिकय (https://archive.org/details/YugaChakraChandranathMishraAmar_201805/page/n17/mode/2up) रखने छथि, बड नीक लागल। आउ, अपनो लोकनि हमर मनोदशाक परिचय उपरोक्त कालजयी रचनाक एक-एक शब्द पर गौर करैत जरूर करूः

 

महान स्रष्टा डा. चन्द्रनाथ मिश्र अमर केर ई रचना भारतक स्वतंत्रताक वर्ष १९४७ ई. केर ठीक एक वर्ष बाद १९४८ ई. मे कयल जेबाक जनतब हिनक पौत्र आ एक चर्चित युवा कवि आदित्य भूषण मिश्र द्वारा यैह रचना प्रस्तुति सँ पूर्व देल गेल भूमिका मे स्पष्ट कयल गेल अछि। (स्रोतः एक यूट्युब वीडियो)

 

जग केँ जुग परतारि रहल अछि

 

– डा. चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

 

जग केँ युग परतारि रहल अछि

एमहर ओमहर के तकैत अछि

अपने हाथ सुतारि रहल अछि

जग केँ युग….

 

उठत नियंत्रण भारत वर्षक

सुनलक बात जखन ई हर्षक

बनिञा आ’ टुट-पुजिया नेता

सब कोठी अजवाड़ि रहल अछि

जग केँ युग……

 

पकड़ि बेङ केँ आइ फतिंगा

सहजहिं लाभ कराबै गंगा

वन बिलाड़ि केँ रंगमंच पर

मुसरी धरि ललकारि रहल अछि

जग केँ युग….

 

बहुतो गप्प करै नित मारक

बहुत बिचारै बात सम्हारक

बैसल विसुन बिलाड़ि बहुत जन

जग भरि आगि पसारि रहल अछि

जग केँ युग…..

 

बहुतो जन व्यापारी बनला

बहुतो खद्धड़-धारी बनला

पत्रकार बनि बहुतो कवि ओ’

लेखक केँ टिटकारि रहल अछि

जग केँ युग…..

 

मालिक हाथी अपन गमौलक

महथवार अधिकार जमौलक

बगड़ा झपटल बाजक ऊपर

पद सँ पकड़ि उतारि रहल अछि

जग केँ युग…..

 

आशा करैत छी जे एहि तरहक कविता आ काव्यपुरुषक कीर्ति पर समाज मे आ जन-जन मे चर्चा करैत साहित्यक असल रसधाराक महत्व केँ हम-अहाँ बाँटि सकैत छी। नव सृजनकर्मी लेल सेहो यैह तरहक महत्वपूर्ण भाव, उच्च मूल्य केर सारतत्त्व सहितक रचना होय, सेहो शुभकामना आ प्रेरणा बाँटि सकैत छी। हमर शुभकामना अपन पाठक वर्ग लेल!

 

हरिः हरः!!

 

पुनश्चः फोटो जे राखि रहल छी ताहि मे डा. अमर केँ साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, भारत केर तरफ सँ फेलोशीप पुरस्कार प्रदान कयल जेबाक दृश्य अछि। गर्वबोध होइछ जे डा. अमर हमरा सभक बीच वयोवृद्ध स्रष्टाक रूप मे मौजूद छथि, हिनकर सुन्दर स्वास्थ्य लेल हम सब कियो सदिखन ईश्वर सँ प्रार्थना करैत रही। ॐ तत्सत्!!

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