महादेव केर पूजन लिंङ्गरूप मे कियैक – विस्तृत माहात्म्य

स्वाध्याय आलेख

– प्रवीण नारायण चौधरी

भगवान् शिव केर लिङ्ग एवं साकार विग्रह केर पूजाक रहस्य तथा महत्वक वर्णन

स्रोतः शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता, अध्याय ३ सँ ८ केर संछिप्त सारांश आधारित (लेख निरन्तरता मे अछि)

महादेव मात्र केर लिंग पूजन कियैक

स्वाध्याय केर केन्द्रविन्दु एखन शिवपुराण में एहि गूढ़ रहस्य केँ ताकि रहल अछि। विद्येश्वरसंहिता में रही। ब्रह्मा जी द्वारा कल्प केर आरम्भ में सर्वोच्च मननीय के छथि एहि प्रश्नक उत्तर देल जा रहल अछि। ब्रह्माजी केर उक्त जवाब में श्रवण, कीर्तन आ मनन केँ साधन कहलनि अछि। साध्य केवल शिवपद केर प्राप्ति कहल गेल अछि।

महेश्वर केर श्रवण, कीर्तन आ मनन करबाक चाही। एहि सँ परम् साध्य केर प्राप्ति होयत।

लोक प्रत्यक्ष वस्तु केँ आँखि सँ देखिकय ओहि में प्रवृत्त होइत अछि। मुदा जाहि वस्तुक कतहु प्रत्यक्ष दर्शन नहि होइछ, ओकरा श्रवणेन्द्रिय सँ सुनल-जानल जाइछ। मनुष्य तदनुसार ओकर प्राप्ति लेल चेष्टा करैछ। तेँ पहिल साधन श्रवण थिक। एहि मार्फ़त गुरुक मुंह सँ तत्त्व केँ सुनिकय श्रेष्ठ बुद्धि के विद्वान पुरुष अन्य साधन यथा कीर्तन व मनन केँ सिद्धि करय।

क्रमशः मनन पर्यन्त एहि साधनक नीक सँ साधना कयलापर साधक द्वारा सालोक्य आदिक क्रम सँ धीरे धीरे भगवान शिव केर संयोग प्राप्त होइत अछि। पहिने सब अंगक रोग नष्ट होइछ, फेर सब तरहक लौकिक आनन्द सेहो विलीन भ जाइछ।

भगवान शिव केर पूजा, हुनक नामक जप तथा हुनकर गुण, रूप, विलास एवं नामक युक्तिपरायण चित्त के द्वारा जे निरन्तर परिशोधन या चिन्तन होइछ, ओकरे मनन कहल गेल अछि; वैह महेश्वर केर कृपादृष्टि सँ उपलब्ध होइत अछि। एकर सब साधन में श्रेष्ठ साधन कहल गेल अछि।

भगवान् शंकरक पूजा, हुनकर नामक जप तथा हुनक गुण, रूप, विलास तथा नाम सभक युक्तिपरायण चित्त द्वारा जे निरन्तर परिशोधन अथवा चिन्तन होइत अछि, ओकरे मनन कहल गेल अछि; वैह महेश्वरक कृपादृष्टि सँ उपलब्ध होइछ। एकरे समस्त श्रेष्ठ साधनादि मे प्रमुख कहल गेल अछि।

सूतजीक शब्द मे एहि साधनक माहात्म्य बतेबाक प्रसंग मे मुनीश्वर लोकनि केँ एकटा प्राचीन वृत्तान्तक वर्णन कयल गेल अछि।

पूर्वक बात थिक। पराशर मुनिक पुत्र (सुतजीक गुरु) व्यासदेव जी सरस्वती नदीक सुन्दर तट पर तपस्या कय रहल छलाह। एक दिन सूर्यतुल्य तेजस्वी विमान सँ यात्रा करैत भगवान् सनत्कुमार अकस्मात ओतय पहुँचि गेलाह। ओ व्यासदेव केँ ओतय देखलनि। व्यासदेव ध्यान मे मग्न छलाह। ताहि सँ जगलापर ओ ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार जी केँ अपन सोझाँ उपस्थित देखलनि। देखिकय ओ बड़ा वेग सँ उठलाह आर हुनकर चरण मे प्रणाम कय केँ मुनि हुनका अर्घ्य प्रदान कयलनि, संगहि देवताक बैसबाक योग्य आसन सेहो अर्पित कयलनि। तखन प्रसन्न भेल भगवान् सनत्कुमार विनीत भाव सँ ठाढ भेल व्यासजी केँ गम्भीर वाणी मे कहलनि –

“मुने! अहाँ सत्य वस्तुक चिन्तन करू। ओ सत्य पदार्थ भगवान् शिव मात्र छथि, जे अहाँक साक्षात्कारक विषय होयताह। भगवान् शंकर केर श्रवण, कीर्तन, मनन – यैह तीन महत्तर साधन कहल गेल अछि। यैह तीनू वेदसम्मत अछि। पूर्वकाल मे हम दोसरे-दोसरे साधन आदिक सम्भ्रम मे पड़िकय घूमैत-घामैत मन्दराचल पर पहुँचि गेल छलहुँ आर ओतय तपस्या करय लगलहुँ। तदनन्तर महेश्वर शिव केर आज्ञा सँ भगवान् नन्दिकेश्वर ओतय एलाह। हुनकर हमरा ऊपर बहुत दया छलन्हि। ओ सभक साक्षी आ शिवगणक स्वामी भगवान् नन्दिकेश्वर हमरा स्नेहपूर्वक मुक्ति केर उत्तम साधन बतबैत कहला – भगवान् शंकर केर श्रवण, कीर्तन आ मनन – यैह तीनू साधन वेदसम्मत अछि तथा मुक्तिक साक्षात् कारण थिक; ई बात स्वयं भगवान् शिव हमरा सँ कहलनि अछि। अतः हे ब्रह्मन्! अहाँ श्रवणादि तीनू साधनहि केर अनुष्ठान करू।”

व्यास जी सँ बेर-बेर एना कहैत अनुगामी सहित ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार परमसुन्दर ब्रह्मधाम प्रस्थान कय गेलाह। एहि तरहें पूर्वकालक एहि उत्तम वृत्तान्तक वर्णन सूतजी कयलनि अछि। एतेक सुनलाक बाद ऋषि लोकनि कहलनि,

“सूतजी! श्रवणादि तीन साधनक मुक्तिक उपाय अपने बतेलहुँ। मुदा जे श्रवणादि तीनू साधन मे असमर्थ हुअय, ओ मनुष्य कोन उपायक अवलम्बन कय केँ मुक्त भऽ सकैत अछि? कोन साधनभूत कर्मक द्वारा बिना यत्नहि केर मोक्ष भेटि सकैत अछि?”

भगवान् शिव केर प्राप्तिक मार्ग श्रवण, कीर्तन आ मनन केर समुचित कथा-वृत्तान्त सूतजी द्वारा शौनक जी केँ कहला उपरान्त पुनः शौनक जी केर एक महत्वपूर्ण प्रश्न जे जाहि व्यक्ति केँ श्रवण, कीर्तन व मनन केर उपाय पालन करबाक सामर्थ्य नहि हो ओकरा लेल मुक्तिक उपाय कि भऽ सकैत छैक। तखन सूतजीक उत्तर अबैत अछि –
 
“जे श्रवण, कीर्तन आ मनन – एहि तीनू साधनक अनुष्ठान मे समर्थ नहि हो, ओ भगवान् शंकर केर लिङ्ग व मूर्ति केर स्थापना कय केँ नित्य हुनकर पूजा करय तऽ संसार-सागर सँ पार भऽ सकैत अछि।”
 
“वञ्चना अथवा छल बिना कएने अपन शक्तिक मुताबिक धनराशि लऽ जाय आर ओ धन शिवलिङ्ग वा शिवमूर्तिक स्थापना लेल अर्पित कय दियए। संगहि निरन्तर ओहि लिङ्ग एवं मूर्तिक पूजा सेहो करय। ताहि लेल भक्तिभाव सँ मण्डप, गोपुर, तीर्थ, मठ एवं क्षेत्रक स्थापना करय आर उत्सव रचाबय। वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा पूआ व शाक आदि व्यञ्जन सँ युक्त तरह-तरह केर भक्ष्य भोजन अन्न-नैवेद्यक रूप मे समर्पित करय। छत्र, ध्वजा, व्यजन, चामर तथा अन्य अङ्ग सहित राजपचारक भाँति सब सामान भगवान् शिव केर लिङ्ग व मूर्ति केँ चढाबय। प्रदक्षिणा, नमस्कार तथा यथाशक्ति जप करय। आवाहन सँ लैत विसर्जन धरि सारा कार्य प्रतिदिन भक्तिभाव सँ सम्पन्न करय। एहि तरहें शिवलिङ्ग अथवा शिवमूर्ति मे भगवान् शंकर केर पूजा करयवला पुरुष श्रवणादि साधनक अनुष्ठान नहियो करत तैयो भगवान् शिव केर प्रसन्नता सँ सिद्धि प्राप्त कय लैत अछि। पहिनहुँ बहुतो महात्मा पुरुष लिङ्ग तथा शिवमूर्तिक पूजा कयला मात्र सँ भवबन्धन सँ मुक्त भऽ चुकल छथि।”
 
एहि विधान वर्णन पर ऋषि लोकनि पुनः पूछलखिन जे मूर्ति मे टा सर्वत्र देवता लोकनिक पूजा होइत अछि, लिङ्ग मे नहि। तखन भगवान् शिव केर पूजा सब जगह मूर्ति मे आर लिङ्ग मे कियैक कयल जाइत अछि?
 
सूतजी बजलाह –
 
“मुनीश्वर लोकनि! अहाँ लोकनिक ई प्रश्न बड़ा पवित्र अछि आर अत्यन्त अद्भुत सेहो अछि। एहि विषय मे महादेव जी मात्र वक्ता भऽ सकैत छथि। दोसर कियो पुरुष कहियो आ कतहु एकर प्रतिपादन नहि कय सकैत छथि। एहि प्रश्नक समाधानक लेल भगवान् शिव स्वयं के किछु कहने छथि आर हम गुरुजीक मुंह सँ जेना सुनने छी वैह सब क्रमशः वर्णन करब।
 
एकमात्र भगवान् शिव टा ब्रह्मरूप होयबाक कारण ‘निष्कल’ (निराकार) कहल गेला अछि। रूपवान् होयबाक कारण हुनका ‘सकल’ सेहो कहल गेल छन्हि। तेँ ओ सकल आ निष्कल दुनू छथि। शिव केर निष्कल – निराकार होयबाक कारण टा हुनक पूजाक आधारभूत लिङ्ग सेहो निराकार टा प्राप्त भेल अछि। अर्थात् ‘शिवलिङ्ग शिवक निराकार स्वरूपक प्रतीक थिक।’ एहि तरहें शिव केर सकल या साकार होयबाक कारण हुनकर पूजाक आधारभूत विग्रह साकार प्राप्त होइत अछि, यानि शिव केर साकार विग्रह हुनकर साकार स्वरूपक प्रतीक होइत अछि। सकल आ अकल (समस्त अङ्ग-आकार-सहित साकार आ अङ्ग-आकार सँ सर्वथा रहित निराकार) रूप भेला सँ ओ ‘ब्रह्म’ शब्द सँ कहल जायवला परमात्मा थिकाह। यैह कारण अछि जे सब लोक लिङ्ग (निराकार) औ मूर्ति (साकार) दुनू मे सदिखन भगवान् शिव केर पूजा करैत अछि। शिव सँ भिन्न जे दोसर-दोसर देवता छथि, ओ साक्षात् ब्रह्म नहि छथि। ताहि लेल कतहु हुनका लोकनिक लेल निराकार लिङ्ग नहि उपलब्ध होइछ।”
 
पूर्वकाल मे बुद्धिमान् ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार मुनि मन्दराचल पर नन्दिकेश्वर सँ एहने प्रश्न कएने रहथि।
 
सनत्कुमार पूछलखिन – भगवन्! शिव सँ भिन्न जे देवता छथि, हुनका लोकनिक पूजाक लेल सर्वत्र प्रायः वेर (मूर्ति) टा मात्र बेसी संख्या मे देखल वा सुनल जाइत अछि। केवल भगवान् शिकव केर पूजा मे लिङ्ग और वेर दुनूक उपयोग देखय मे अबैत अछि। अतः, कल्याणमय नन्दिकेश्वर! एहि विषय मे जे तत्त्वक बात अछि से हमरा एना बुझा कय कहू जाहि सँ हम नीक जेकाँ बुझि सकी।
 
नन्दिकेश्वर तखन कहलखिन – निष्पाप ब्रह्मकुमार! अहाँक एहि प्रश्न उत्तर हमरा जेहेन लोक द्वारा नहि देल जा सकैत अछि; कियैक तँ गोपनीय विषय थिक आर लिङ्ग साक्षात् ब्रह्म केर प्रतीक थिक। तथापि अहाँ शिवभक्त छी, एहि वास्ते एकर जवाब स्वयं भगवान् शिव जे बतेलनि अछि, वैह अहाँ सँ सुनबैत छी। भगवान् शिव ब्रह्मस्वरूप और निष्कल (निराकार) छथि; एहि लेल हुनकहि पूजा टा मे निष्कल लिङ्ग केर उपयोग होइत अछि। सम्पूर्ण वेद मे यैह मत देल गेल अछि।
 
सनत्कुमार बजलाह – महाभाग योगीन्द्र! अपने भगवान् शिव तथा दोसर देवता लोकनिक पूजन मे लिङ्ग और वेर केर प्रचारक जे रहस्य विभागपूर्वक बतेलहुँ अछि, वैह यथार्थ थिक। एहि लेल लिङ्ग और वेर केर आदि-उत्पत्तिक जे उत्तम वृत्तान्त अछि, सेहो हम एहि समय सुनय चाहैत छी। लिङ्ग केर प्राकट्यक रहस्य सूचित करयवला प्रसङ्ग हमरा सुनाउ।
 
नन्दिकेश्वर जी तखन भगवान् महादेव केर निष्कल स्वरूप लिङ्ग केर आविर्भावक प्रसङ्ग सुनेनाय आरम्भ कयलनि। ओ ब्रह्मा तथा विष्णु केर विवाद, देवता लोकनिक व्याकुलता आ चिन्ता, देवता लोकनिक दिव्य कैलास-शिखरपर गमन, हुनका सब द्वारा चन्द्रशेखर महादेवक स्तवन, देवता सब सँ प्रेरित भेल महादेव जीक ब्रह्मा और विष्णु केर विवाद-स्थल मे आगमन तथा दुनूक बीच मे निष्कल आदि-अन्तरहित भीषण अग्निस्तम्भक रूप मे हुनक आविर्भाव आदि प्रसङ्गक कथा कहलनि। तदनन्तर श्रीब्रह्मा आ विष्णु दुनूक द्वारा ओहि ज्योतिर्मय स्तम्भक ऊँचाई और गहराई केर थाह लेबाक चेष्टा तथा केतकी-पुष्प केर शाप-वरदान आदिक प्रसङ्ग सेहो सुनेलनि।
 
हमर नोटः
 
स्पष्टे अछि जे ब्रह्माजी आ विष्णुजी मे जखन विवाद भेलनि तेकरा समाधान वास्ते महादेवक लीलावतारक स्वरूप मे लिङ्गक आविर्भाव भेल, दुनू गोटे केँ महादेवक समझौताक शर्त सुनायल गेलनि जे जँ एहि निष्कल प्रतीकक आदि वा अन्तक थाह पाबि सकैत होइ त हुनकर बात (दावा) केँ सिद्ध मानल जायत। लेकिन, दुनू मे सँ कियो एकर पता नहि पाबि सकलाह आर एहि तरहें महादेव द्वारा प्रकट कयल ओ प्रतीक चिह्न लिङ्ग केर महिमामंडन होयब आरम्भ भेल। यैह रहस्यपूर्ण सत्य उपरान्त केवल आ केवल देवाधिदेव महादेव केर पूजन मे लिङ्ग प्रतीक चिह्नक उपयोग होइत अछि, ई कहि सकैत छी। ॐ तत्सत्!!
 
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥१॥
 
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम्।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥२॥
 
सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥३॥
 
कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम्।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥४॥
 
कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥५॥
 
देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥६॥
 
अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥७॥
 
सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम्।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥८॥
 
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
 
हरिः हरः!!
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बादक लेख

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