अहाँ किऐक बजैत छी: सामाजिक चित्रण

umakant babu

जनचेतना अभियान – मैथिली कवि ‘उमाकान्त झा बक्शी’

“अहाँ किऐक बजैत छी”

मिथला मे एखनहु बहुतो आदर्श परिवार अछि। परन्तु गामे-गाम किछु कुसंस्कार आइ-काल्हि चरम पर पहुँचि गेल अछि। यदि किछु बाजू तँ एहेन लोकक एक्के उत्तर अछि – कहबी छैक हम अपन महीस केँ कुरहरिये सँ नाथब, तय सँ तोरा मतलब कि – यानि “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(१) माय-बाप केँ भिन्न कय दैत अछि, किछु बाजू तँ कहत ई हमर घरक मामला थीक  – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(२) शराब पीबिकय गारा-गारी करत, मारि करत, किछु बाजू तँ कहत ई हमर अपन जीवन थीक – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(३) पुतोहुक नैहर सँ फ्रीज़, टीवी आदि देलक वा नहि, दहेज भेटल वा नहि, दहेजक लोभ मे प्रताड़ित करैत जरा कय मारि देत, किछु बाजू तँ कहत ई हमर घरक आन्तरिक मामला थीक – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(४) जे आर्थिक रूप सँ मज़बूत अछि से आर्थिक रूप सँ कमजोर भाइ-बंधुक हिस्सा कोनो न कोनो बयबे हड़ैप लेत, किछु बाजू तँ कहत ई हमर भैयारिक आपसी मामला थीक – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(५) गरीब सहोदर भाइओ केर बेटीक विवाह मे खेत, घर-घड़ारी लिखा लेत आ गाम सँ भगा देत, किछु बाजू तँ कहत ई जे हम विवाह मे कर्ज देने छी – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(६) कोनो झगड़ा पर दुष्ट लोक आपस मे मिलिकय दूनू पक्षक लोककेँ उकसाओत, चुगली करत आ केस मुकदमा करबावैत आपसे मे फँसौने रहत, यदि सुलह करेबाक बात करू वा किछु बाजू तँ कहत ई फैसला कोर्ट करत – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(७) कोलकाता, दिल्ली, मुंबई आ प्रवास पर लाखों-करोड़ों खर्च कय मकान बनेनहारो लोक गाम पर एक हाथ घड़ारी मे हिस्सा बेसी मंगला पर खून-खूनामे करत, किछु बाजू तँ कहत ई हमर पूर्वजक धरोहर अछि – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(८) बयोवृद्ध माय-बाप केँ देखभाल आ पालन-पोषण भले बेटी-जमाय करत, मुदा बेटा टा होयत पुस्तैनी सम्पत्तिक अधिकारी, किछु बाजू तँ कहत ई हमर घरक मामला थीक – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(९) शराबक नशा मे धुत्त घर आबि स्त्री केँ लात-जूता मारत, किछु बाजू तँ कहत ई हमर पति-पत्नीक बीचक मामला थीक – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(१०) खाली अधिकार लेल लड़त आ यदि भगवानो आबि कय कर्तब्यक बात करता तँ कहत, चुप रह! अपना बारे मे सोच, हमरे देल भोग लड्डू-पेड़ा खा कय हमरे उपदेश दै छेँ। नमक हराम कहीं के! – किछु बाजु तँ कहत जे हमर जिनगीक मालिक हम अपने छी – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(११) मिथिला स्वर्गहु सँ सुन्दर धाम केँ किएक नरकहु सँ बदतर बनौने जाइ छी? कहत अहाँ मिथिलाक गौरव नष्ट करैत छी – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

(१२) जे गाम पर सँ रोज़ी-रोटीक लेल बाहर गेल, कहुना कतौ गुजारा करैत अछि, तकरा घर बनबै लेल जगहो देबय लेल तैयार नहि, किछु बाजू तँ कहत ई हमर भैयारिक मामला थीक – “अहाँ किऐक बजैत छी?”

सब कहै अछि एको गो लोक अहाँक बात मानत? “अहाँ किऐक बजैत छी?” ई अनाप-सनाप पब्लिक साइट पर किऐक लिखैत छी? हमारा चुप नहि रहल जाइत अछि, जे करब से करू आ बक्शी सठिया गेला सैह बूझू। हमर जनचेतना अभियान अपन कलमक मसि सँ निकैलते रहत। हृदयक आवाज सदैव हम लेखनीक मार्फत राखिते रहब। अपना हिसाबें अपन सुन्दर मिथिला समाज केँ जगाबिते रहब। जय मिथिला!!

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One Response to अहाँ किऐक बजैत छी: सामाजिक चित्रण

  1. प्रिय प्रवीण जी,हमर जनचेतना अभियान, मैथिली जिंदाबाद डांट कॉम पर प्रशारित करवाक लेल धन्यबाद दैत छी। कुकर्मी/अपकर्मी ओ जखन अपनहु के प्रति संवेदनशील नहि अछि , आ अपने स्वार्थ में लीन अछि , तखन समाज ओकरा सँ अपेक्षा की करय ? वास्तव में यदि पूछू तँ व्यवस्था एहि पर चुप अछि।सब स्वतंत्र अछि। समाजो मे जे नीक लोक छथि से चुप छथि——- के लांगट/अविवेकी सँ मुंहगाबय। तखन ई वीमारी केना दूर होयत ? समाज के आ व्यवस्था के आदर्श परिवार के प्रोत्साहन पुरस्कार देबाक चाहि। आ कुकर्मी /अपकर्मी के प्रताड़ित करबाक चाही।

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