कतय जा रहल अछि मिथिला समाज – फिजूलखर्ची आ आडम्बरी व्यवहार पर विमर्श

विचार

– शुभचन्द्र झा, राजविराज

कतय जा रहल अछि समाज?

धिक्कार अछि ओहि समाजके जे एखनहुँ बेटीके रानी पुताेहुके नाैकरानी बुझैत अछि। बडका बडका ठाेप, पाग पहिर अपनाके बडका कहाबैके साेच रखैत छथि। कथीके बडका ? माेनक बडका कि कर्मक बडका छी? काेनाे बेटीबला नञ चाहैत छै बेटी दु:खी रहए, अपन साकरता अनुसार बेटीके बिआहमे लाेक लाजक डर, मर्यादाक पालन करैत गाेर लगाइक रूपमे नगद द दै छै ताकी बेटावला घरसं किए खर्च कराैक और बेटाबला तकराबाद बेटीबला अहिठाम बरियातीक माने गँवारी भाेज बुझि ५०/७५ किएक पुरे २००के संख्यामे पहुँचैत छथि त एहेनके बेटीबला कि कराै बरियातीके माला, पाग आ डाेपटासं सम्मान कराै ? छि: छि: एहेन बिआहमे सामेल हाेमयबला समाजक ठिकेदारके चुल्लू भरि पानिमे डूबि नञ मरि जेबाक चाही ?

कथीले चाही परशुराम जयन्ती? बिद्यापति स्मृति पर्व? एहिसब नाम पर समाज, ब्यबसायीसं टका झाेरी आ नचनिञा-बजनिञा, कनेक तरक भरक देखाकय पाइ उडा दी, कारण अपन कमाओल त अछि नञ त माेह किएक लागत! ओ देखाकय कि बुझाबय चाहैत छी जे हमर जाति एतेक संगठित अछि, एतेक सबल अछि?

अछि भुजी भाङ्ग नञ आ चललाै हें समाज सुधारक ढाेंग रचाबय। थू थू! हम पाइ लेन देन भेल बरिआती नञ जाएब कहनिहार अपनाके बडका बुझनिहारके २०० बरियातीमे सामेल हाेइत देखलाै। समाजक नामके ठीकेदारी लेनिहार सामाजिक संस्थाक पदाधिकारीके बरियाती ओैर सरियाती दुनु पक्षके भकाेसैत देखलाै। त एहेन समाज कथीले? मात्र भाेजक प्रबन्ध मिलाबय लेल त नञ चाही एहेन समाज।

समाजक अर्थ हमरा नजरिमे १० के लाठी १ के बाेझ, शिक्षामे वृद्धि, गरीबक उद्धार, समाजक युवासबके सुकर्मके पाठ पढा बुझा आगू बढाैनाइ। आजूक समाज कतय जा रहल छैक? युवासब कु-मार्गपर बढि रहल छै। कर्जा उठा उठा विदेश कमाबय जा रहल छैक आ ओम्हरसं ओ नञ,  ओकर लाश बक्सामे बन्द भ’ क’ आबि रहल छैक। समय पर वर-कनिञाके बिआह नञ भ’ रहल छैक। बेटीक बाप धियापुताके नीक संस्कार देवामे कसरि नञ छाेडैत छै। बेटाबला ओतय घटक नञ पहुँचैत छै। बेटा बेसी पढि लेने छै ओ पश्चिमी दुनिञामे रमि गेल छै। ओहेन वरके बेटीबला बेटी देबय नञ चाहैत छै। बहुत उदाहरण देखलापर बिदेसियाक हाथ देबाकाे नञ चाही कारण ओहनके समय बिताबयबला भेटले रहै छै। एहिसब बातक समसामयिक चर्चा परिचर्चा करबाक, समस्या समाधान करबाक कहियाे कुनु समाजक ठीकेदारके फुरसत छै?

समाजक नामसब दहेज मुक्त मिथिला, अपन ब्राह्मण समाज, मैथिल ब्राह्मण समाज, ब्राह्मण सेवा समाज, ब्राह्मण महासभा, वाह रे समाज। काेनाे भी समाज उत्थानक लेल अनुशासन, एकहि रङ्गक नियम कानून सबहक लेल जँ किओ एक गाेटे नञ माने त समाजक रट, सामाजिक संस्थाके बदनाम नञ कएल जेबाक चाही। सब स्वतन्त्र छै। स्वविवेक पर छाेडि दिओै। फिजूल, देखाबटी काज बिल्कुल नञ हेवाक चाही। एहेन संस्थाके समाज सुधारक नाम पर किओ अपना लग बैसय नञ दिओै।

ई पाेष्ट बहुत गाेटेके निक नञ लागत से हम बुझैत छी। ई हमर निजी विचार छी। सहमत हाेय त बढिञा, असहमत हाेय त बढिञा। हम ब्राह्मण जातिसं रहलाक कारण एहिसं जुडल संस्थासबके नाम लेेने छी, कमाेबेस सब जातिक संस्थाक अबस्था एहिना छै। ब्राह्मण सन गेल गुजरल काेनाे नञ, टका चाहबे करी, सम्मानक पाग, डाेपटा, माला मात्र नञ ५ टुक बस्त्र भेटतै त आओराे बढिञा। द्वारि लगिते ठण्डा-गरम, पेटभरबा जलखै जहिमे बारह अना फेकबाक लेल, खानामे कम स’ कम ३ घंटा। माछाे, माउंसाे, रसगूल्ला, लालमाेहन जे आइ काइल्ह उजरा ललका कहबाक चलन छैक, फलफूलक समय रहाै त पचीस/पचास तक कलमी आम, घरमे पाव भरिमे चारि गाेटे कारण कमाओलक खर्च बरियाती गेलापर सीनाके पुठाके कमस कम २ सेर, कहियाे नञ अपन पैसास’ २ रसगूल्ला कीनिकय खेनिहार अनकर माल बुझि साै सैकड़ा, पातपर १०/०५ फेकायाे जाय त काेनाे बात नञ। ओतय बेटापक्ष बडका कहाबय ले २०० के संख्यामे बेटीबला ओहिठाम जाय, समाज मूकदर्शक बनि ठहाका पर ठहाकाके बढाबा दाैक, छिया छिया! अत्यधिक सलाह, सुझाओ आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। धन्यवाद।

एहि लेख पर दहेज मुक्त मिथिलाक संस्थापक अध्यक्ष – हाल धरि अभियान द्वारा जनजागरण कयनिहार – मैथिली जिन्दाबाद केर सम्पादक प्रवीण नारायण चौधरीक जबाब – 
एक-एकटा विषय महत्वपूर्ण अछि, धरि आरोप-प्रत्यारोप करबाक आ उलहन-उपराग दैत अपनो वैह काज करबाक जेकर आलोचक छी से असलियत उजागर करैत अछि जे हमरा लोकनिक समाजक हाल एहेन कियैक अछि।
 
उपरोक्त लेख मे ब्राह्मण प्रति जतेक घृणाभाव प्रकट कयल गेल अछि से गैर-वाजिब अछि। हमरा सब केँ ई बुझय पड़त जे सामाजिक परिवर्तन मे भौतिक सुख-सुविधाक पुरान दिन आब नहि रहल। कोनो परिवर्तन कियैक भेलैक, एकर मूल कारण कि छैक, एकर आलोचना कय केँ कहीं हम समाजक नुकसान त नहि कय रहल छी, आदि अनेकों कारण पर सोचबाक आवश्यकता अछि।
 
शुभचन्द्र भाइजी जाहि हिसाब सँ परिवर्तनक कुरूपता पर चर्चा कयलनि, ताहि पर कहियो विवेचनात्मक आ पूर्वक समय सँ तुलनात्मक लेख लिखता त स्वतः पता चलि जेतनि जे आइ भौतिकतावादी युग मे आखिर ‘उच्च शिक्षित समाज’ मे आडम्बरी प्रथा कियैक दिन-ब-दिन बढिते जा रहल अछि। विवाह त छोड़ू, मुन्डन मे सेहो जयबारी भोज होबय लागल, बरखी मे सेहो माछ-माउस होबय लागल, बरियाती सँ पहिने सरियाती भोज होबय लागल….।
 
आरो अनेकों परिस्थितिजन्य परिवर्तन मे समाज फँसि गेल अछि। एकरा निकालबाक लेल उलहन-उपराग आ फझीहत, एना सामाजिक संजाल पर उकटा-पैंची आ किछु अभियानक नाम तक लय केँ अपन बौद्धिक दाबी रटब, ई समाधान नहि बल्कि सिर्फ अपन मोन केँ मनेबाक लेल ढुइसबाजी थिक। चूँकि अपने विद्वान होयबाक संग-संग समाज लेल चिन्तकवर्गक अभियन्ता सेहो छी, ई अहाँक कर्तव्य अछि जे हमेशा समस्याक संग समाधानक सुझाव आ सेहो व्यवहारिक रूप मे जे स्वीकार्य हो सब केँ से राखय पड़त।
 
२०० आदमी केँ बरियाती जायब, भोजन मे ३-३ घन्टा धरि खायब कि भोकसब आ छुतायब… आदि सारा बात केर जड़ि मे जाउ। आखिर ई व्यवहार हमर समाज केँ कोना अपन गिरफ्त मे लेलक? चिन्तनक विषय ई थिकैक। एहि पर समाजक बीच मे बैसिकय विमर्श करब आ सामूहिक निर्णय लेब, तीन संझू सँ एक संझू बरियाती मात्र एबाक रीत केँ चालू करबाक जेकाँ नव आदर्श पद्धति कि भऽ सकैत छैक से करब। एहि लेल केकरो अपन कुबोल-कुवचन सँ बेधब सही नहि!
 
हरिः हरः!!
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