बिना समुचित पढाई-लिखाई कएने कोनो भाषाक ज्ञान भेटब सहज नहि

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

पठन-पाठन बिना भाषाक बोध सहज नहि

मैथिली सेहो विद्वानक भाषा थिक, ई आरोप लागल करैत अछि। एकर कारण स्पष्ट अछि – जहिना संस्कृत उच्च महत्वक भाषा रहितो समुचित पठन-पाठनक अभाव मे जन-जन मे प्रिय नहि बनि सकल, ठीक तहिना मैथिली भाषाक पढाई-लिखाई प्राथमिक विद्यालय सँ आरम्भ नहि करायल जेबाक कारण संस्कृत जेकाँ ईहो गैर-सुशिक्षित-सम्भ्रान्त वर्गक अलावे अन्य मे सहज आ चलन-चलतीक भाषा नहि बनि सकल।

मैथिलीक लिखित साहित्य मे जे किछु विद्वान् चर्चित छथि, ओ लोकनि आभिजात्य वर्गक आर संस्कृत सँ मातृभाषा मे प्रवेश कयनिहारक बहुल्यता अछि। महाकवि विद्यापति सेहो संस्कृतक विद्वान् रहैत जन-जन मे लोकप्रिय बोली – तत्कालिक शब्दकोश अनुसार ‘अवहट्ठ’ (मैथिली) मे अपन रचना आरम्भ करबाक क्रान्तिकारी वचन कहने छथि – देसिल वयना सब जन मिट्ठा – तेँ तैसओं जंपओं अवहट्ठा। परञ्च विद्यापतिक रचना मे प्रयुक्त अनेकन शब्द साधारण मैथिली सँ भिन्न अछि, ई सब कियो जनिते छी।

विद्यापतिक पदावली केर अर्थ आ भाव स्पष्ट करबाक लेल सेहो समुचित अध्ययन आ भाषा ज्ञान बिना संभव नहि होयत। तखन जाहि कोनो भाषाक पठन-पाठन सहज नहि, ताहि भाषा पर ई आरोप लगेनाय जे ई केवल आभिजात्य – उच्च वर्गक (जाति-समुदाय) द्वारा प्रयुक्त भाषा थिक, ई तहिना भ्रमपूर्ण अछि जेना संस्कृत केँ पंडितक भाषा कहल-बुझल जाइत अछि।

संस्कृत भाषा पर सेहो अनावश्यक आरोप

आइ संस्कृत भाषा भले जन-जन केर भाषा नहि अछि, एहि भाषा केँ पढबाक, बुझबाक आ बजबाक संग लिखबाक ज्ञान बहुत कम लोक जे विधिवत् शिक्षा ग्रहण करैत छथि, जे विद्या अध्ययन आ निरन्तर अभ्यास करैत छथि, हुनका धरि मात्र सीमित रहि गेल अछि संस्कृत। हालांकि जनप्रिय बनेबाक लेल संस्कृत भाषा मे सेहो कतेको रास परिवर्तन केँ स्वीकृति भेटल, यथा शत-प्रतिशत संस्कृतक मूल शब्द तत्सम् केर बदला तद्भव, देशज आ विदेशज (उत्पत्तिक आधार पर शब्दक प्रकार – हिन्दी व्याकरण) शब्द सभक प्रयोग केँ सेहो मान्यता देल गेल देखाइत अछि। तथापि, संस्कृत भाषाक वैयाकरणिक नियम आ शब्दकोशक अपन गहिराई केर कारण ई जनसुलभ भाषाक रूप मे लोकप्रिय नहि बनि सकल। तथापि, संस्कृतक विशाल साहित्य, वेद, पुराण, श्रुति-कथा-गाथा आ अनेकों पौराणिक रचना आ महत्वपूर्ण संहिता (जीवन-पद्धति) संग उच्च मूल्यक दर्शन आ शास्त्रीय वचन-विवेचना सभक कारण संस्कृत भाषा केँ विश्वक सब सँ प्राचीन आ समृद्ध भाषाक रूप मे मान्यता भेटल अछि। संस्कृतक कतिपय गूढ व गम्भीर शास्त्रीय वचनक कठोरता केर भरपूर आलोचना आ विरोधक माहौल बनितो ई भाषा अपन महत्ता केँ अन्य सँ ऊपर राखि ज्ञान-विज्ञानक क्षेत्र मे पर्यन्त अपन एकाधिकार आ वर्चस्व यथावत् निर्वाह करैत आबि रहल अछि। कोनो आविष्कार संस्कृत आ वेद सँ इतर नहि होयब एकर ठोस आ सटीक प्रमाण थिक।

भाषा आ बोली मे फर्क – भाषा विज्ञानक विचार

बोली सँ भाषा बनबाक लेल व्याकरणक नियम केर पालन जरूरी छैक। मैथिली भाषाक कतेको रास बोली आ उपबोली सब छैक, ई तथ्य भाषा वैज्ञानिक लोकनिक शोध सँ १८०० ई. सँ १९०० ई. केर बीच ब्रिटिशकालीन भारत सरकार अधिनस्थक कतेको भारतीय आ विदेशी विद्वान् कयलनि, ओहो लोकनि स्पष्ट लिखलनि जे मैथिलीक बोली एक नहि बल्कि अनेक अछि। साधारणतया बोलीक सम्बन्ध मे एकटा कहावत ‘कोस कोस पर बदले पानी, चारि कोस पर वाणी’ बहुत प्रचलित छैक। वाणी बदलि गेला सँ शब्दक उच्चारण आ बजबाक शैली मे भिन्नता अबैत छैक, निस्सन्देह एकरा बोली बदलब कहल जाइत छैक नहि कि भाषा। भाषा बदलबाक मतलब भेलैक जे शब्द बदैल गेनाय, व्याकरणक नियम आ लेखनादिक शैली बदलि गेनाय… लेकिन मैथिलीक शब्दकोश आ व्याकरण संग लिखित इतिहास मे सब तरहक बोली केँ समेटबाक स्थापित इतिहास छैक।

मैथिलीक कमजोरी कतय?

कमी मे कमी एक्के टा ई भेलैक जे एहि भाषा केँ पहिने त हिन्दीक बोली मानिकय फाँसी चढेबाक अभ्यास भेलैक भारत मे, तदोपरान्त आइ धरि राजनीतिक मनसाय मे मैथिली प्रति भ्रम पसारिकय एहि भाषाक पढाई, शिक्षकक नियुक्ति, आर भाषा आधारित रोजगारक वातावरण तक नहि बनय देल गेलैक। एहेन अवस्था मे मैथिली जँ जीबि रहल अछि त निश्चित ओहि सृजनकर्मीक त्यागपूर्ण सृजन सँ जाहि मे कठोर तपस्या, कठोर अभ्यास आ कठोर परिश्रम सँ निरन्तर सृजनकर्म करैत भाषा-साहित्य केँ जियाकय राखल जाइत छैक। संयोग एकटा आर नीक भेलैक जे हालहि १५ वर्ष पूर्व ई भारतीय संविधानक आठम अनुसूची मे प्रवेश पाबि लोक सेवा आयोग केर परीक्षा मे मान्यता प्राप्त कयलक। कठोर परिश्रमी केँ ओकर परिश्रमक सुखद परिणाम ‘प्रशासकीय सेवा’ मे निज भाषा मैथिली केँ ऐच्छिक विषयक रूप मे चयन कय परीक्षा उत्तीर्ण हेबाक अवसर भेटलैक। तैयो, पठन-पाठन मे कक्ष ९ आ १० सँ निरन्तर स्नातक, स्नातकोत्तर धरि पढाई मे लोकक अभिरूचि कमजोर छैक, एकरा बदलिकय भाषाक पढाई केर सम्बन्ध मे सब केँ जागरूक बनेबाक आवश्यकता छैक।
 
एहि सन्दर्भ ब्रिटिश काउन्सिल द्वारा प्रस्तुत ओ शोध जाहि मे ‘मातृभाषाक माध्यम’ मे पढाई कयला सँ कि सब लाभ भेटैत छैक, तेकर प्रचार-प्रसार होयब जरूरी छैक – मैथिली जिन्दाबाद केर एहि लिंक पर ई शोधपत्रक सारांश राखल गेल अछिः http://www.maithilijindabaad.com/?p=12971 – एहि लेख केर फायदा जन-जन मे हो आर एकटा मोट लाइन दिमाग मे सब केँ रखबाक अछि जे भाषाक पढाई बिना ओहि पर मत राखब, राजनीति करब, ई सब अमान्य मात्र नहि, बल्कि अहाँक मौलिक पहिचान लेल खतराक घन्टी बजेनाय सेहो होइछ। एहि तरहक व्यक्ति अथवा प्रचार समूहक मनसाय कहियो मैथिलीभाषाभाषी प्रति ईमानदार आ न्यायपूर्ण नहि भऽ सकैत अछि। ओ निश्चित कोनो न कोनो छद्म लाभ लेल एहि तरहक आत्मघाती ज्ञान सब छाँटैत भेटत, ओहेन लोक सँ सावधानी बरतू।
 
हरिः हरः!!
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