ध्वस्त ताजमहलः विजेता चौधरीक टटका कथा

कथा

– विजेता चौधरी

ध्वस्त ताजमहल

आंखिमे रहस्यमयी चञ्चलताक विम्ब लऽ कऽ घुमैत रहैत छथि ओ । किछ तऽ छैक हुनक आँखिमे जे हमरा हरदम आकर्षित करैत अछि । हुनक आँखि अभिव्यक्तिक सिम्बोलसन एकदम्म बाचाल छैक । नैनक भाषा होइत छैक से सुनल छल मुदा एतेक मुखर भऽ सकैछ से पहिलबेर देखल ।

शनि दिन घुमऽ जएबाक योजना ओ एक हप्ता पहिने तय कऽ चुकल छलीह । किए तऽ हमरा शनि दिन मात्र छुट्टी भेटैत अछि । ओना हुनका लेल हम कोनहुँ दिन छुट्टी मारि सकैत छलहुँ । हुनक सामीप्यता मात्रसँ हृदयमे चुम्बककेर गुरुत्वाकर्षण उत्पन्न होबए लगैत अछि । ताहि पर भरि दिन संगे रहबाक बात सोंचिएक हम ओहिना रोमाञ्चित भेल जा रहल छी ।

हप्ता दिन एनाकऽ बीति रहल अछि जेना समय अपने बन्धनमे कैद भऽ गेल हुए । कि जेना समयकेँ चलबामे पाबंदी लागल होएक । एहन छटपटी तऽ कहियो अनुभूत नहि होइत छल । हुनक स्मृतिसभ हर क्षण व्यग्र बनबैत छल । मनहिमन हुनकासँ कतेकरास अंतरंग बातसभ बतियाएल छलहुँ । कतेको बेर प्रणयकेर मृदुल भावमे डूबैत–उतरैत रहलहुँ ।

शनि दिन पशुपतिनाथ मंदिरमे भेटबाक पूर्व योजना अनुसार हम समयसँ एक घण्टा पहिनहि ओतऽ पहुँच गेल छलहुँ । आब एकहु क्षणके दूरी हमरा असह्य छल । हुनक जादुइ संसर्गकेर प्रतीक्षा हमरा बेकल बनेने जा रहल छल । ताहि पर समयसँ पहिनहि पहुँचिकऽ हम अपन उद्विग्नताकेँ स्वयम बढा लेने छलहुँ । जानि नहि किए हुनक एक झलक हेतु मन काबूमे नहि अछि । एना पहिने कहियो कहाँ होइत छल ।
प्रतीक्षाक घड़ी नमरिते जा रहल अछि । एक मन डेराइत छी जे कहीं ओ आजुक प्रोग्राम विसरि तऽ ने गेल हेतीह । मोबाइल सेहो नहि उठाऽ रहल छथि । ओह…।

तहने कतहुसँ जेना परिचित गमक हृदयकेँ विभोर कऽ दैत अछि । दूरसँ अबैत हुनक शरीरक एक गोट भिन्न प्रकारक सुवासकेँ हम भाँपि लैत छी । कञ्चन लाल समीज–सलबारमे हुनक गौर वर्ण आर निखरि उठल छैक । लगैछ जेना लाल वैजञन्तिक फूल वसन्ती वयार संग लहराइत चलि आबि रहल हो । डाँरधरि लोटैत केसराशि हुनक छविकेँ अपरिमेय बना देने छैक । बाचाल आँखिसभ काजरकेर स्ट्रोक्ससँ आर रहस्यमयी लगैत छैक । एकदम्म गहींर नजरि जाहिमे ने जानि कतेक राज नुकायल हो जेना ।

लगैत छल वरखोंक बाद हुनकर संग भेंट भऽ रहल अछि । हुनका अपन आलिङ्गनमे बान्हिलेबाक लेल हृदय जेना अधीर भऽ उठल छल । मन अनेरो फुदकि रहल छल जेकरा बड़ मोसक्कतसँ वशमे केलहुँ ।

दिन भरि काठमाण्डूकेर कोन कोन ठाम घुम्बाक छनि तेकर योजना बनबति ओ हमर बाइककेर पाछाँ बैसि जाइत छथि । हुनकर हाथ जानि–बुझिकऽ हम अपन पेटपर लऽ अनैत छिएक मुदा ओ घबराकऽ हाथ छीपि लैत छथि । बाइककेर आइनामे लाजसँ निहुँरल हुनक कुमुदिनी फूलसन चेहरा देखैत छी जे आर लाल भऽ उठल छैक ।

एहि आयताकार आइनामे बाट चलैत बहुतरास चेहरा देखने छलहुँ मुदा आइ पहिल बेर एहिमे उपयुक्त स्वरूप आ सौन्दर्य देखलियैक अछि । हम पुनः हुनकर हाथ अपन पेटपर लऽ जाए जाहैत छी मुदा ओ पेटमे बडि़ जोरसँ बिठुआ काटि लैत छथि । आ हम बस सुसुआइत रहि जाइत छी । आयताकार आइनामे देखैत छी, ओ ललितगर मुस्की छोड़ैत हमरे दिस ताकि रहल छथि ।

जोरकेँ झट्काक सँग ब्रेक मारैत हम बाइक आगा बढ़ा लैत छी । ओ झट्काक संग हमर पीठपर झुकि जाइत छथि आ अनायासे हुनकर हाथ हमर पेटपर पहुँचि जाइत अछि । हुनकर स्पर्शकेर तापसँ हम मोम जेकाँ पिघलए लगैत छी । जानि नहि हमर उष्णतासँ हुनको किछु आभास भेलनि की नहि ! पुछबाक दुस्साहस जुटा कहाँ पबैत छी । बस आयताकार आइनामे हुनकर लाजवन्ती रूप निहारैत रहि जाइत छी ।

ओ नओ मंजिला धरहरा चढ़बाक जीद्द करैत छथि । धरहरा सेहो कोनो घुमैबला स्थान छैक भला ? चलू कत्तौ बहुत दूर चलैत छी । एकान्तमे जतय मात्र हम आ अहाँ… ओ बीचहिमे लौकैत बाजि उठलीह जे हमरा एतुका ऐतिहासिक स्थलसभ मात्र घुमबाक अछि ।

कहलिएन, तहन चलू की दक्षीणकाली किंवा मनकामना माताक दर्शन…? ओ गुम्हरिकऽ तकैत छथि । हम बुझि गेलिएक जे हुनका हमर मनक बदमासीक पता चलि गेलनि अछि । ओना हमरा बुझल छल हुनके इक्षा सदर हेतैक । आ सेैह भेलैक । माने धरहरा आइ चढि़एक छोड़तीह । कहलिएन्ह अहाँ एखनहुँ नेना छी आ से कहैत बाइककेँ हम सुन्धारा दिस मोड़ि लैत छी ।

ओ बारहमा केर परीक्षा समाप्त कऽ विराटनगरसँ काठमाण्डू छुट्टी मनाबए आएल छथि । हुनका काठमाण्डूक महत्वपूर्ण आ ऐतिहासिक स्थानसभ घुमि अपन छोट काठमाण्डू यात्राकेँ उपलब्धिमूलक आ स्मरणीय बनेबाक छनि । हुनकर इक्षाकेँ हम नकारि नहि पओने छलहुँ ।
हुनका एहि धरहराक किलामे जानि नहि की आकर्षक लगलनि । कहै छथि जे धरहराक ऊँचाइसँ हमरा ई शहर देखबाक अछि । देखबाक अछि जे साँच्चे धरहराक ऊँचाइसँ कंक्रीटक ई शहर सुन्दर आ जादुइ नगरीसन प्रतीत होइत छैक । आ इहो तऽ देखबाक अछि जे अहाँ कतेक ऊपर धरि हमरासंग डेगसँ डेग मिलाकऽ चलि सकैत छी आ से बजैत ओ पुनः ललितगर मुस्कान छोड़ैत हमरा दिस कनडेरीये तकैत छथि । हुनकर ई मुस्कान जेना बेर–बेर घायल कऽदैत अछि ।

हमर ठोर पर जे प्रीतक स्वीकारोक्ति एखनि धरि नहि आएल छल ताहिकेँ ओ कतेक सहज रुपसँ अभिव्यक्त कऽ देलनि आ हम लजकोटरा ! पुनः मन भेल एक बेर हुनका अपन बहुपाशमे बान्हि लेबाक । हुनक सम्पूर्णतामे हेराऽ जेबाक मुदा हमर मन से दुस्साहस नहि कऽ पबैत अछि । किमार्थ नहि ।

हुनक आँखिमे बहुत पहिनहि हम अपनालेल प्रेमक ओ भावना पढ़ि लेने छलहुँ । कहलहुँ ने अभिव्यक्तिक सिम्बोल छैक हुनकर आँखि । मुदा आइधरि ने हम किछ कहि सकलहुँ आ ने ओ किछ बाजि सकलीह । बस मजाकेमे सही हमहुँ बहुत किछु बाजि लैत छी आ ओहो बहुत किछु कहि दैत छथि । मानु जेना स्वीकारोक्ति दुनूतर्फा हो ।

धरहराक टीकट लऽ हमसभ उपर चढ़बाक लाइनमे लगैत छी । भीड़ देखि चढ़बाक इक्षा हवा भऽ गेल अछि । सोचैत छी एतेक लोक एहि चिम्नीमे कोनाकऽ अँटतैक । जानि नहि नेपालक प्रथम प्रधानमन्त्री भीमसेन थापा कोन लहड़ी मनःस्थितिमे ई ईंटाभठ्ठा सन चिम्नी बनबओलनि । मन धरहरा चढ़बाक लेल जानि नहि आई किन्नहुँ मानि नहि रहल अछि मुदा ओ हमरासँ पहिनहि आगा–आगा धरहराक सिढ़ी फानि रहल छथि ।

हुँनका उँचाइ पर पहुँचबाक छनि । ओ हमरा जल्दी चढ़बाक इशारा करैत स्वयम आर तीव्र गतिसँ भागि रहल छथि । हुनक ऊर्जा जेना हमरा लुलुअबैत अछि तहिना हमहुँ तीव्र डेग बढ़बैत सिढ़ी सभ फानऽ लगैत छी । हुनकर हाथ पकड़ि एकाध सिढ़ी मात्र चढ़ि पबैत छी । एतबहिमे पसेनासँ तित गेल छी । पएरमे दर्द उठिगेल अछि । मुदा ओ रुकबाक लेल मानैत नहि छथि । लगैछ जेना हुनकर शरीर बैलुन सन हल्लुक भऽ गेल छैक जे स्वयम हवाक गतिकसंग ऊपर–ऊपर उड़ि रहल हो ।

हम अपन गतिकेँ तेज करैत एहिबेर हुनकर हाथ कसिकऽ पकड़ि लैत छिएक । हुनकर पसेनासँ भिजल शरीर हमर कठोर शरीरसँ टकरा जाइत अछि । वर्फ सन ठंढा हमर देह जेना एहकि बेर गरमीसँ धीप जाइत अछि आ ओ लजाकऽ फेर आँखि झुका लैत छथि ।

यैह मौकामे एखनि धरि अव्यक्त अपन निर्मल प्रेमकेँ शब्द आ भावकेर आकार दैत छिएक । किछु घबराएल हमहुँ छी । घवरायल ओहो छथि । किछु लजाएल ओहो छथि, किछु हमहुँ छी । हुनकर हाथ अपन हाथमे लऽ कऽ ओ रहस्यमयी आँखिमे उत्तर खोजैत छी । ओ हामी भरि दैत छथि ।

आ से हम एहिबेर भावावेशमे हुनका अपन आलिङ्गनमे भरि लैत छी । एक दोसराक धड़कन आर तेज भऽ उठल अछि । गर्म स्वास आर गर्म भऽ उठल अछि । ओहो अबोध बालिका जेकाँ हमर बाँहिमे निश्चिन्त विश्राम लेने छथि की जेना एहिसँ सुरक्षित आर कोनो ठौर नहि होइएक ।
हमहुँ होशमे कहाँ छी । लगैत अछि जेना एहि धरहराक ऊँचाइकसंग प्रेमकेर ऊँचाई किछ आर बढ़ि गेल अछि । जेना किछु आर बढ़ि गेल छी हम दुनू । संभवतः एहने कोनो क्षणकेँ कवि लोकनि प्रीतक जादूगरीक अभिव्यक्ति देने हेताह ।

हमरा सभक आगा देने जानि नहि कतेको लोक आस्तेसँ गुजरलैक । जेना प्रेमीयुगल केर लीलामे कोनहुँ विघ्न उत्पन्न नहि करऽ चाहैत हुए किछु तहिना । लोकक जुलुस जेना चुपचाप–चुपचाप आगा बढ़ि रहल छलैक । हम दुनू याथास्थितिसँ अनभिज्ञ अपने लौकिक संसारमे हेराएल छलहुँ । लगैत अछि ई क्षण, ई पल एहिना ठहरि जाइक सदाक हेतु । प्रेमक एहसास आ प्रीतक भावसभ एतेक कोमल, एतेक अनमोल आ जादुइ होइत हेतैक से हमरा एहिसँ पहिने ज्ञाते कहाँ छल । प्रेमक आभाष तऽ साँच्चे तिलस्मी होइत छैक ।

ओ हमर आलिंगनसँ छुटिकऽ पुनः रुइया जेकाँ ऊपर–ऊपर उड़ऽ लगलीह । आ हम हुनक पाछाँ सुखल पात सन पताइत जा रहल छलहुँ । जेना गुड्डीक लट्टाई । नओ मंजिला धरहराक बालकोनीमे हम सभ पहुँचि गेल छी । हुँनक उत्साह चौगुणा भऽ गेल छैक । ओ एहि ऊँचाइसँ काठमाण्डू शहर देखबालए लालायित छलीह । हुनक उत्साह आ रोमाञ्च देखि हम अनेरो रोमाञ्चित भेल जारहल छी ।

एहि ऊँचाइसँ नीचाक लोक चुट्टीसन देखना जाइत अछि । लगैत अछि जेना बौना कदकेर आकृतिसभ चलबला रहल हो । दूर–दूर तक अव्यवस्थित संरचानासँ बेसी किछु खास नहि देखाइ दैत छैक मुदा जानि नहि तैयो किए धरहरा चढ़बा लए लोक उताहुल भेल करैत अछि । नीचा तकितेदेरी हमर मोन घुमऽ लगैत अछि । आँखि तिरमिरा जाइत अछि । तैं हम उन्टा मुँहे घुमिकऽ ठाड़ भऽ जाइत छी । मुदा हुँनक आँखि छनि जे दृश्यावलोकनसँ अघाइत नहि छनि ।

मेघ क्षण–क्षणमे रुप बदलि रहल छल । लगैत छलैक वरखा कोनहुँ पल बरसि पड़तैक । मुदा ओ ओतयसँ हटबालए मानैत नहि छलीह । बहुत रास तस्बिरसभ खिचबौलन्हि । मोबाइलमे क्षण क्षणकेर स्मृतिसभ कैद होइत रहलैक । ऊपर पहुँचलाक बाद नेनासन ओ एकदम चञ्चल भऽ उठल छलीह । आधा घण्टा धरि ओ बालकोनीमे ठाढ़ भऽ शहरी चहल–पहल निहारैत रहलीह । भीड़ बढ़ि रहल छलैक । हम हुनकर हाथ तानिकऽ नीचा उतारऽ चाहैत छलहुँ मुदा ओ आर ऊपर चढ़ऽ चाहि रहल छलीह ।

बालकोनीमे बेस ठेलम–ठेल होबऽ लागल छैक । ऊँचाइसँ त्रसित देखि ओ हमरा अपना दिस तनैत बजलिह–देखियौ धरहराक ऊँचाइसँ ई शहर कतेक मनोरम देखाइ दैत छैक । रातूक अन्हारमे आर कतेक विलक्षण दृश्य देखना जाइत हेतैक । सगरो बिजुलीक हजारहुँँ छोट–छोट तारासँ टिमटिमाइत शहर साँचे अपूर्व देखना जाइत हेतैक । जेना दियाबातीक राति सन रौशन शहर ।

हुनकर उत्साह हमरा पहिलबेर जिम्मेबार होएबाक एहसास करौने छल । एहिसँ पहिने अपन वजूद एतेक मूल्यवान कहियो नहि लागल छल । भीड़क रेला हमरा सभकेँ पुनः एकदोसराक आलिंगनमे पहुँचा देने अछि । भीड़ तऽ बस बहाना छैक । लगैछ जेना ई पलमे मात्र हम छी आ ओ छथि । हुनकर केशमे आँगुर फेरैत जाइन नहि कतेक तुक–बेतुक केर गप बतियाइत छी । लगैछ एहन सूफी एहसास तऽ आर किछियोसँ प्राप्त नहि भऽ सकैछ । पुनः भीड़क दबाब संगहि शरीर ठोकरा जाइत अछि । आ से एक दोसराक शरीरकेर हल्का स्पर्श सेहो अपरिमेय आनन्द आ तृप्ति दैत अछि । भीड़भाड़सँ सदैब दूर भगनाहरि हम एहिबेर ई धरहराक विशाल भीड़केँ अन्तर्मनसँ धन्यवाद दैत छिएक ।

हमसभ नीचा उतरबाक लेल भीड़क व्यूह तोड़बाक उपक्रम दिस लगैत छी । एकदोसराक हाथ कसिकऽ एना पकड़ने छी जेना केयो कङ्गुरयिा धरा देने हो । तहने अनायास कौआक झुण्डसभ उपर घायलसन कोलाहल मचबऽ लगलैक । मेघ आर कारी भऽ उठल छलैक । कौआसभक एतेक रास उछलकूद तऽ भोजक आँगनमे मात्र देखल छल । जानि नहि कोन अनिष्ट समाद देबालए एना त्राहिमाम मचाऽ रहल अछि कौआसब…। मन अनिष्टकेर अन्देशासँ घबरा जाइत अछि ।

मुदा किछु सोचि पबितिएक ताबत धरहरा हलका डोलल सन प्रतीत भेलैक । पहिने सोचलिएक ऊँचाइकेर कारणे हमर मन घूमिगेल हुए । मुदा नहि… धरहरा डोलबाक आभाष संभवतः सभकेँ भेल छलैक किए तऽ एकहिबेर लोकक कोलाहल निःशब्द भऽ गेल छलैक । जेना सबहक बाक अनायासे बन्द भऽ गेल हो तहिना गहींर सन्नाटा आ चुप्पी व्याप्त भऽ गेल छलैक । लोक जावत संयमित होइतिएक । किछ सोंचि पवितिएक ताबत धरहरा बेतहास डोलऽ लगलैक । त्राससँ लोक बूत बनि गेल छलैक ।

ओहो हताश भऽ हमर आलिङ्गनमे सन्हिया गेलीह । हुनकर आँखिक रहस्यसभ विलुप्त भऽगेल छलैक । एखनि मात्र त्रास देखना जाइत छल । हमर शरीर सेहो जेना सर्द भऽ गेल छल । हम दुनू भरिपाँज एकदोसराकेँ पँजियौने छलहुँ । हलचल करबाक परिस्थिति नहि छलैक । मनमे हड़कम्प मचि रहल छल । नीचाँ भगबाक विचार सेहो जेना जड भऽ गेल छल ।

लागि रहल छल जेना धरहराक चट्टानी फर्शपर नहि भऽ जेना काठक तराजू पर ठाड़ होइएक । जेना जारनि–काठ जोखए बला तराजू पर । जोड़–जोड़सँ डोलि रहल छलैक धरहरा । एकहु रत्ति भर नहि छलैक चट्टानी फर्शकेर । मृत्युबोधसँ भयाओन त्राहिमाम मचए लागल छलैक । भागाभाग होबए लागल छलैक । एना लगैत छलैक जेना सुरुगंकेर निकासक बाट दने अजगर पैसि रहल छैक । हम एकदम्म चेतनाशुन्य भऽ गेल छलहुँ । ओहो हमर बाँहिमे निर्विकार छलीह…। तहने भूकम्पकेर त्रासद गर्जन आ मनु कोलाहल संगहि लागल जेना कोनो गहींर खधियामे खसि र.. ह.. ल.. छी । ओहिना जेना पहिल निन्द्राक कोरमे जाइत–जाइत कहियोकाल गहिंर खधियामे खसबाक भ्रम होइत छैक किछ तहिना…।

आँखि खुजल तऽ चारुकात अन्हार छलैक । शरिरमे कोनो चेतना नहि छल । जानि नहि कतेक समय ओहिना रहलिएक । नीन्दमे छलिएक आकि बेहोशीमे से नहि कहि ! फेर किछ इजोत भेल सन लागल । एकदम फरिच्छ । आँखि तिरमिरा रहल छल । दूरसँ अबैत लोकक आवाजसभ सुनना जाइत छल । मुदा किछु बुझि नहि सकैत छलिएक । ओ सभ हमर शरिरपर जमल संभवतः मलबा हँटौने छल से धरि ख्यास अछि ।

अस्पतालमे जहन दू दिन पश्चात होश घूरल तऽ हमर तजमहल खण्डहरमे परिणत भऽ चुकल छल । ओ रहस्यमयी आँखिसभ सुदूर क्षितीजक यात्रा पर निकलि चुकल छल…बहुत दूर…बहुत ऊपर ।

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