दीपावली, अरिपन आ रंगोलीः परिप्रेक्ष्य मिथिलावासीक वर्तमान अवस्था

अरिपन आ रंगोली दुइ अलग चीज थिकैक

अरिपन केर महत्व मिथिला में प्रशस्त छैक। अरिपन केर शोभा माटि पर पाड़य में छैक। मिथिला केर पवन माटि जाहि सँ जानकी स्वयं प्रकट भेलीह ओकर पुण्य आ प्रताप स्वतः कतेक महत्वपूर्ण भेल से सोचय योग्य विषय भेल। ताहि माटि पर गायक गोबर सँ निपलाक बाद चिकन माटि सँ लेप चढ़बैत ठाउँ पीढ़ी बनाकय विभिन्न प्रकारक यंत्रवत अरिपन पाड़ल जाइत छैक। सभ यंत्र केर अपन अलग आध्यात्मिक महत्व आ मर्म होइत छैक। मिथिला चूंकि ऋषि, मुनि आ ज्ञानी लोकनिक विकसित भूमि थिक, तेँ देवी-देवता केर आराधना में अरिपन बड पैघ भूमिका निभाबैत अछि। विदेहराज जनक समान उच्च आध्यात्मिक राजा, तिनकर शासित पुण्य भूमि ई मिथिला, समस्त निवासी पर्ण कुटीर आ जलस्रोत केर तीर पर निवास करैत जीवन, माटि, पानि, हवा, आगि आ आकाश – सम्पूर्ण पंचतत्व में लिप्त जीवन प्रणाली; से छल समग्र मिथिला।

आब मिथिला में विदेहनीति पर कय गोट लोकक जीवन चलैत अछि? आइ पर्ण कुटिया केर कतय महत्व बाँचल अछि? ओहि माटि आ पानि सहित समस्त पंचतत्व केँ कय गोटे आध्यात्मिक ज्ञान अनुसार देखैत, बुझैत आ अनुसरण करैत अछि? ई किछु महत्वपूर्ण सवाल जँ प्रत्येक ज्ञानी-प्रधानी स्वयं सँ पूछब त बुझय में आओत जे ई अरिपन केर प्रयोग कियैक लोपोन्मुख भेल जा रहल अछि। हम सब मिथिला केँ सिर्फ आभासी दुनिया मे जियैत छी। हम बेसी लोक अन्दर एक आ बाहर दोसर तरहक होइत छी। आइ हमरा सभक ज्ञान, मान आ ध्यान सबटा भौतिक सुख सुविधा पर केंद्रित रहैत अछि। हमर चिन्तन पुरखा समान लोककल्याण लेल कम, निजी परिपूर्ति लेल बेसी व्यग्र रहैत छी। यैह मूल कारण छियैक जे भौतिकतावादी संसार मे व्यवहृत सांसारिक, लोकलुभावन, आकर्षक, आडम्बरी व्यवहार दिश हम सब आजुक समय बेसी झुकल जा रहल छी। पर्ण कुटीर सँ पक्का मकान, अंगना-बारी-दलान सँ ड्राइंगरूम आ बालकनी में गार्डेनिंग कल्चर दिश अग्रसर भ गेल छी।

रंगोली में विभिन्न रंग केर उपयोग होइछ। आकृति कोनो पुष्प सदृश होइछ। पक्का मकान कल्चर में अरिपन अप्रासंगिक भ गेल, रंगोली में हम सब आकंठ डूबि गेलहुँ अछि। आब हम मिथिलावासी दुनियाक अन्य भौतिकतावादी जेकाँ देखबय वला प्रवृत्ति में पाबनि करब पसीन करैत छी। बनावटी फूल कहियो सुगन्ध नहि दय सकैत अछि से बुझितो कागजक फूल बनबैत छी आ से देखि-देखि आत्ममुग्ध होइत छी। संसारो केहेन भेल से देखू न! हाइब्रिड खेती में प्रकृति केँ सेहो हम सब भौतिकतावादी बना देलहुँ, फूल केर रंग, आकार, प्रकार, आदि सेहो मनमाफिक बना देलियैक। गुलाब सेहो गन्धहीन भ गेल! सुइया भोंकि दियौक राति में, भोरे भरि ठेहुन के सजमैन तोड़ि लिअ! अजब गजब भेल न दुनिया! रंगोली अरिपन पर हावी भेल, करवा चौथ बर्साइत पर हावी भेल, पश्चिमी सभ्यता आ संस्कृति भारतवर्षीय संस्कृति पर हावी भेल, त किछु नहि भेल! मस्त रहू, त्रस्त जुनि होउ।

हरिः हरः!!

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One Response to दीपावली, अरिपन आ रंगोलीः परिप्रेक्ष्य मिथिलावासीक वर्तमान अवस्था

  1. Hemant Kumar Jha

    बहुत सुन्दर आलेख, अपने सँ पूर्णतः सहमत छी एकरा बचेबाक खातिर हमरे आहाँ के आँगा आबय पड़त।

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