दिल्ली विश्वविद्यालय मे मैथिलीक पढौनी पर भटकल आलोचना छन्हि प्रो. अपूर्वानन्द केर

२२ अक्टूबर २०१९. मैथिली जिन्दाबाद!!

दिल्ली विश्वविद्यालय मे मैथिलीक पढौनी पर भटकल आलोचना छन्हि प्रो. अपूर्वानन्द केर
 
अपूर्वानन्द (दिल्ली विश्वविद्यालयक हिन्दी विभाग मे कार्यरत एसोशियेट प्रोफेसर) केर लेख “डीयू में मैथिली? राजनीति में इस्तेमाल की चीज रह गई है भाषा’ शीर्षक केर लेख पढल। कय बेर पढिकय हुनकर सब बात बुझबाक चेष्टा कयल। श्री संजीव मिथिलाकिङ्कर द्वारा पठायल गेल लिंक (लेख) सत्यहिन्दी डट कम पर एखन फुर्सत सँ पढिकय निष्कर्ष निकालबाक भरपूर चेष्टा कयलहुँ। अपूर्वानन्द झा एक गोट विद्वान् आ हिन्दी तथा अंग्रेजी मे आलोचना पक्षक प्रसिद्ध लेखक थिकाह। कइएक पत्र-पत्रिका मे हिनकर लेख सब समसामयिक भारतीय राजनीति मे छपैत रहैत अछि। प्रस्तुत लेख मे सेहो ई अपन दुइ गोट परिचिति जनौने छथि, पहिल जे “देवघरिया” भाषाभाषी थिकाह आर “धर्मनिरपेक्ष” होयबाक कारण भाषा धर्मनिरपेक्षताक धर्म पालन कयनिहार अपना केँ कहने छथि। एकठाम लिखलनि अछि जे चेन्नई मे हिनका एक गोट टैक्सी चालक हिन्दी बाजैत देखेलनि त ओकरा संग जिज्ञासा कयला पर ओ कहि देलकनि जे चूँकि ओ मुसलमान छल ताहि कारण ऊर्दूक पढाई कएने अछि आर यैह कारणे ऊर्दू बाजि सकैत छल। बाकी हरियाणवी जाट द्वारा प्रयुक्त भाषा आ पत्नीक कनबाक उदाहरण सँ लैत आरा-भोजपुरक भोजपुरी भाषाभाषी द्वारा छपरिया भोजपुरी केँ जनाना भोजपुरी भाषा होयबाक टिप्पणी सहित कइएक आन उदाहरण दैत विद्वान् अपूर्वानन्द सिर्फ अपन लेख केर शीर्षक मे राखल प्रश्नवाचक चिह्न (?) मे उलझल बादहु मे कय गोट प्रश्न दगलनि आर दिल्ली विश्वविद्यालय मे मैथिलीक पढौनी आखिरकार राजनीतिक लक्ष्य सधबाक लेल “मैथिल” वोटर्स केँ अपनेबाक दूरदर्शिता सँ मात्र कयल जा रहल अछि, स्थानीयता वा संस्कृतिक संरक्षण-संवर्धनक उद्देश्य हिनका हिसाबे दिल्ली मे मैथिली लेल एकदम नहि अछि।
 
हमरा हिनकर ई लेख पता नहि कियैक मुदा भटकल आ बेवजह कुतर्क करैत बुझायल। जखन कि तकला पर हिनकर परिचय मे पाठ्यक्रम विकास लेल कइएक सेमिनारक स्रोत व्यक्ति करयवला विद्वान् सेहो ई रहि चुकला से देखेला… तखन भाषाक अध्ययन मे दिल्ली विश्वविद्यालय मे अध्ययनरत हजारों मैथिली भाषाभाषी छात्रक रुचि आ संघ लोक सेवा आयोग मे मैथिली वैकल्पिक विषय केर माध्यम सँ भारतक प्रशासनिक सेवा मे सफलता हासिल करबाक दर बढोत्तरी आदिक उपयुक्त व सार्थक तर्क केर कतहु चर्चो तक नहि कय केवल राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि लेल आ हिन्दी विभागक अवस्था मे टूट वा ह्रास आदि अयबाक चिन्ता अथवा इशारा हमरा सच मे हिनकर विद्वता अनुरूप अनुकूल नहि बुझायल। हालांकि अपन प्रकृति केँ स्वयं स्पष्ट करैत एकठाम ई अपनहि भाषा कथित ‘देवघरिया’ बाजय मे हिचकिचाहटक बात सेहो कहने छथि। मातृभाषाक अध्ययन पर सेहो हिनकर विजन स्पष्ट नहि छन्हि ताहि सम्बन्धी सवाल सेहो उठौने छथि। जखन कि एक विद्वान् लेल विश्वव्यापक शोध मातृभाषाक पढौनी सँ मानव मस्तिष्कक समुचित आ उच्च विकास दर केर बात ई नहि बुझि सकल छथि, ताहि सँ हिनकर ई लेख वास्तव मे भटकल बुझायल। जतय एक दिश दिल्ली विश्वविद्यालयक कुलपति अपन राय मे कहलनि जे शिक्षक लोकनि सँ समुचित सिफारिश कराउ तऽ मैथिली पढौनी लागू कयल जायत… तखन स्वयं मैथिली मूल केर (देवघरिया झाजी) होइतो अपूर्वानन्द प्रतिकूल वातावरण निर्माण करयवला आलोचनात्मक लेख लिखलनि, एहि पर हिनका संग प्रथम भेंटघांट दिल्लीक संस्था आ मैथिली पढेबाक मांग रखनिहार केँ जरूर करबाक चाही। हमरा हिसाब सँ मैथिलीक समर्थन मे जे सब विन्दु अछि, जेना प्रो. राजीव वर्मा सेहो अपन लेख लिखने रहथि, समाचार सब काफी प्रकाशित भेल छल, ताहि सभक संग अपूर्वानन्द जी संग भेंट आवश्यक अछि। हमर अपील अछि जे संजीव जी व २० अक्टूबर केर मीटिंग मे जे सब बैसार कएने रही, ओ सब हिनका सँ समय लय पक्ष जरूर राखी। संगहि मैथिली लेखक संघ केर महासचिव विनोद कुमार झा केर अगुवाई मे एकटा प्रतिनिधिमंडल जरूर हिनका सँ आरम्भ करैत आरो-आरो शिक्षक सब सँ भेंट करी। राजनीति सँ कोनो चीज केँ जोड़ब ओतेक प्रतिक्रियावादी नहि बुझाइ य, ई त लोक सहजहि आरोप मढि दैत छैक… मुदा मैथिलीक पढौनी दिल्ली विश्वविद्यालय मे हो ताहि पर पक्ष केँ कमजोर करयवला भटकल आलोचना मादे हुनकर दृष्टि केँ साफ करब समयक मांग अछि।
 
हरिः हरः!!
 
नोटः जिनका सब केँ ई लेख पढबाक हो ओ प्लीज एतय पढि लिअ!
पूर्वक लेख
बादक लेख

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