शंभूक कनियाँक करबाचौथक व्रत (एकांकी नाटक)

एकांकी नाटक

– रूबी झा

सरपंच बाबू ‌आबि रहल छलाह ‌बाजार दिश सँ, बाटहि मे भेट गेलन्हि शंभू।
 
शंभू – काका प्रणाम।
 
सरपंच बाबू – खुश रह बच्चा। कतय चललें हें झोरा-झंडा टांगि।
 
शंभू – काका, काल्हि करबाचौथ छैक ने, तोहर पुतोहु (शंभू के कनियाँ) व्रत करथुन्ह, ताहि लेल किछु-किछु सामान आनय के अछि।
 
सरपंच बाबू – कि सब रौ बच्चा।
शंभू – प्रसाद, (मधूर – मिठाई, फल-फलहारी) फूल माला, धूप-दीप, गणेश जी के मूर्ति, हुनका लेल कपड़ा आ श्रृंगारक सामान। आ हेतैय तँ एकटा नव नूआ (साड़ी) तोहर पुतोहु लेल सेहो लँ लेबन्हि, ओना बेचारी कहलथि नहि। ईहे सब।
 
सरपंच बाबू – रौ बच्चा! तोरो कनियाँ ताल करैत छथुन्ह, मैथिलानी कतहु करबाचौथ करय?
 
शंभू – हौ काका! तोंहों धन्य छह, करबाचौथ करय मे कोन खराबी छैक? एहि मे तँ बाल गणेश जी केर पूजा आ कथा होइत छन्हि, आर साँझ खनि चन्द्रमा निकलला के बाद चन्द्रमा के पूजा व्रती करैत छथि।
 
सरपंच बाबू – हाँ रौ बुझलियौक, लेकिन ‌ई कह, करबाचौथ कहिया सँ मिथिला के पावैन भँ गेलैक? अपना सबके तँ बरसाइत (वटसावित्री) पूजा ने होइत छैक।
 
शंभू – काका चलह, साईकिल कात करह।
 
दुनू गोटे साईकिल गुरकेने बान्हक कात में गाछ तर मे लगेलाह, आ घमर्थन करय लगलाह।
 
शंभू – काका तों जे कहैय छह जे करबाचौथ कहिया सँ मिथिला के पावैन भऽ गेलैक तँ सुनह – ई पैंट-शर्ट कहिया सँ मैथिलक परिधान भऽ गेलैक, आर ओहि पर सँ पाग ई कोन शोभा थिकैक हौ? लूंगी कहबहक तँ लूंगी कहिया सँ मिथिला के पहिरावा भऽ गेलैक? आ तोहर-हमर पैर मे जे चामक जुत्ता छह, ई‌ मैथिल पहिने पहिरैय छलय की? खराम छोड़ि ई चामक जुत्ता आ दुर्गा पूजा, काली पूजा मे अश्लील मैथिली, भोजपुरी गीत पर बुढवा सँ जवनका तक भरि गामक लोक सब जे नागिन नाच करैत छह ई कोन परम्परा छह हौ? आ बायजी केँ लाखक-लाख रुपैया दय केँ जे बजबैत छह से कतुका परम्परा छह हौ?
 
सरपंच बाबू – तों त हमरा बच्चा पकैड़ लेलें! रौ, हम तँ ईहे न कहलीयौक जे मैथिलानी सब केँ अपन परम्पराक निर्वहन करैय के चाहियैन?
 
बीचे मे बात कटैत बजलाह शंभू।
 
शंभू – काका निर्वहन ओ सभ नहि करैत छथिन्ह तँ हम तों करैत छहक? पाबनि-तिहार, गीत-नाद ,अरिपन-पूरहर – अपन ‌संस्कृतिक सबटा के‌ तँ वैह सब न सहेज कय रखने छथिन्ह।
 
एतबहि बात सुनैत ‌सरपंच बाबू तिलमिला उठलाह आर एकटा सिगरेट पाकेट सँ नीकालि लाइटर सँ पजारि पिबय लगलाह। ताहि पर शंभू बजलाह।
 
शंभू – काका! ई जे तों जीविते मे मुँह मे ऊकाठी लगेलह हँ से कोन मैथिल केर परम्परा छैक? आर सूरज के अस्त होइते ललका शर्बत जे चौक पर पिबय लेल महानुभाव सब पहुँचैत छथि, ई मिथिला के परम्परा थिकैक की?
 
सरपंच बाबू शंभूक मुंह दिश टुकुर-टुकुर ताकि अपन आँखि लाल-पियर कएने सिगरेटक कश लम्बा-लम्बा खींचि रहल छथि, मुदा शंभूक अकाट्य प्रश्नक कोनो जबाब नहि सुझाइत छन्हि। तखन शंभू फेर कहैत छन्हि –
 
शंभू – हौ काका! जन्मदिनक कतय सँ रेबाज एलैक मिथिला मे।
 
सरपंच बाबू – रौ बच्चा जन्मदिन तँ राम-कृष्ण केँ सेहो सदा सँ मनायल जाइत छन्हि, तों केहेन बात करैत छेँ?
 
शंभू – हाँ हौ ‌काका! एनाही क’ मोमबत्ती ‌मिझा कय आ केक काटि कय राम आ कृष्णक जन्मदिन मनबैत छहक की? तों हमर काका भऽ बुड़िबक जेकाँ बात करैत छह हौ! हुनका सभक जन्मदिनक तारीख नहि तिथि हिसाब सँ मनायल जाइत छन्हि। बुझलह?
 
सरपंच बाबू – (तमसा कय) जो आब! बाजार नहि जेमें की?
 
शंभू – (चौवनियाँ मुस्कान मारैत) काका! बाजार तँ हम जेबे करब लेकिन सुनह। विवाह सँ पूर्व मैथिलक बेटी केँ देखा-सूनी ई कोन पंचांग मे छैक हौ, आ सगाई, सगाई कहिया सँ होबय लगलैह मिथिला मे हौ? अपना सबकेँ गाम-घरक भाषा मे तँ सगाई केर अर्थ किछु और मानल जाइत छलैक।
 
सरपंच बाबू – (लाल-पियर आँखि‌ केने) रौ बच्चा! तोहर सबटा बात तँ मनलियौक, लेकिन ई कह जे‌ अपन ‌सबके पाबनि-तिहार कियो अन्य राज्यक लोक मनबैत छौक जे‌ अपन मैथिलानी सब ओकर सबहक नकल करैत छथि?
 
शंभू – (ठठा कय हँसैत) काका! अपन सबहक छठि आ वटसावित्री व्रत – ई दुनू पाबनि कतेको राज्यक महिला सब धूमधाम सँ मनबैत छह आइ-काल्हि। हाँ एकटा बात ‌हम कहबह जे कोनो मैथिलानी ‌अपन पाबनि-तिहार छोड़ि सिर्फ दोसराक पाबनि मनबैत छथि तँ ई हमरा जनतबे गलत बात छैक। लेकिन हमरा नहि लगैत अछि जे एहेन कोनो हमर माय-बहिन वा कोनो मैथिलानी करतीह। हौ काका! अपन माइये-बहिन सबने विद्यापति आ ऊधो केँ जिया कय रखलीह। कतबो हड़बड़ी मे रहैत छथि मुदा ‌बिना गौरी पूजने कोनो मैथिलानी घर सँ बाहर नहि जाइत छथि। आ कय गोट मैथिल ‌पूजा-पाठ (गायत्री-सावित्री) कय केँ निकलैत छहक घर सँ से सोचहक कने। अगर कियो गोटे करितो छथि तँ ओरियान सबटा महिले लोकनि कय केँ दैत छथिन तहने घंटी डोलबैत छथि, आ ‘बम-बम-बम-बम भू’ करैत छथि। आ तों हुनका सबकेँ परम्परा सिखबय लेल चललह हँ?
 
सरपंच बाबू केँ अपन बजलाहा बात पर पछतावा भेलन्हि आ‌ कहलखिन्ह,
 
सरपंच बाबू – जो रे शंभुवा! तों तँ हमर आँखि पर बान्हल पट्टी खोईल देलें। हम हारलहुँ, तों जीतलें। काकियो (सरपंच बाबू के कनियाँ) केँ फोन कय पूछि लहीन जे जँ व्रत करथुन्ह तँ हूनको पूजा लेल‌ सब सामाग्री लेने अबियहुन। ले पाय हमरा सँ लय ले।
शंभू आ सरपंच बाबू बीच समन्वय बनि गेलाक संतोष दुनूक चेहरा पर स्पष्ट देखाय लागल। 
(पटाक्षेप)
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3 Responses to शंभूक कनियाँक करबाचौथक व्रत (एकांकी नाटक)

  1. bahut nik aur sharthak sambad

  2. मंत्रेश मिश्रा

    बहुत सूंदर कथा आइ दीदी

  3. भारती

    बहुत सुंदर ढंग से यह अप्पन पक्ष राखलु। अति सराहनीय 👍। अहा के त हम दीवानो भ गेलु। शाबाश,सखि

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