दुर्गा पूजाक ओ घड़ी – मर्दक बेटा घड़ी जे बजैय से बजिते रहत

संस्मरण

– रूबी झा

वाणी दीदी के संस्मरण पढिकय हमरो अपन बालपन के दुर्गा पूजा मोन पड गेल।आ बहुत रास दृश्य आँखिक सामने आबि गेल। ओहि मे सँ किछु अपन पाठक लोकनि संग साझा कय रहल छी।

हमरा गाँव मे तँ दुर्गा पूजा नहि होइत छलय, लेकिन अगल-बगल केर गाम मे होइत छलैक। बगले मे हमर मात्रीक छल, हर बेर हम सब दुर्गा पूजा मे ओतहि चलि जाइत छलहुँ। पैरवा दिन हमर मामा आबि जाइत छलथि हमरा सब केँ लेबय लेल। पहिने एखन जेकाँ फोन नहि छलैक। हमसब भाय-बहिन माँ संगे नानीगाँव चलि जाइत छलहुँ। हमर मात्रीक मधुबनी जिला स्थित बेल्हवार गाम मे अछि। हमसब भाय-बहिन दुर्गा पूजा लेल बहुत उत्साहित रहैत छलहुँ, बाबूजी कपड़ा नया खरीद कय आनि दैत छलथि। पहिने एखन जेकाँ हमेशा खरीदारी सेहो नहि होइत छलैक। ताहि द्वारे बहुत खास लगैत छल दुर्गा पूजा।

हमसब माँ संगे भरि दिन में चारि-पाँच बेर दुर्गास्थान जाइत छलहुँ, थकावट एको रत्ती नहि बुझाइत छल। भोरे नहा-धोकय पाठ करैत छलहुँ। नानी कहैत छलथि जे एखन तोँ छोट छेँ, चालीसा सब नैह हेतौह पढल, राम-राम वला किताब लय ले आ ओकरे सात बेर पढी ले, १०८ बेर लिखल छैक। जखन आय दुर्गा सप्तशती केर पाठ करय बैसैत छी तँ नानी मोन पड़ि जाइत छथि। पाठ केलाक बाद दुर्गा स्थान फूलडाली आ लोटा लय कय जाइत छलहुँ। फूलडाली मे भरिकय कनैल, अरहूल आ सिंगहारक फूल रहैत छल। जे कि भोरे उठिकय तोड़ैत रही। सिंगहारक फूल बिछैय लेल नानी भोरे-भोरे उठबैत छलीह, उठ जल्दी सँ फूल बिछ गऽ, नहि त सब कियो बिछि कय चैल जेतौक।

दुर्गास्थानक बाट मे कोयला ठाकुरक स्थान पड़ैत छल, ओतहु रुकिकय पूजा करैत छलहुँ, फेर आगू बाटक कात मे बजरंगबली के बहुत रास ध्वजा गारल छलैन्ह ओतहु रुकिकय पूजा करैत छलहुँ। फेर दुर्गास्थान पँहुचैत छलहुँ, ओतय पूजा कय सोमनाथ भोलाबाबा केर पूजा करु जाइत छलहुँ, जे दुर्गास्थान सँ दस कदम आगू स्थापित छथिन्ह। ओतय सँ जखन घूरैय छलहुँ तखन छोला-मुरही, कचरी, झील्ली आ आलू चप खाइत छलहुँ। आब तँ दिल्ली मे अपनो इम्हरका लोकक मुँह सँ सुनैत छियैक जे हम भरि दशमी प्याज-लहसुन नहि खाय छी। हमसब तँ खूब खाय छलौंह, बाट तकैत रहैय छलौंह कुलपतिया हाथक छोले, कुलकुलबा हाथक कचरी-चाँप आ असर्फीया दोकानक जिलेबी-समोसा के।

खैर… ओकरा बाद फेर दुपहरिया मे आरती होइत छलैक, ओहि मे सेहो माँ संगे सम्मिलित होइत छलहुँ। फेर साँझ पड़िते देरी माटिक दीवारी मे तेल-बाती दय लय कय जाइत छलहुँ दुर्गास्थान। हमसब माटिक दीवारी अपना हाथ सँ बनबैत छलहुँ, एखन जकाँ नैह सबटा रेडिमेडे। साँझ देखेलाक के बाद मेला मे हमसब सब दिन किछु ने किछु खरिदैत छलहुँ। घडी, चश्मा, बैलून आ तरह-तरह के खिलौना। जहन ओही सँ कने पैघ भेलहुँ तँ चूड़ी-बाला, कान मू’का, अलता तँ केश मे लगबैयबला तरह-तरह के सामान चाप, हेअर बेंड.. नहिं जानि कतेक खरीददारी करैत छलहुँ।

घड़ी कोन खरीदैत छलहुँ से सूनू पाठक लोकनि! नकली वला एक सँ दूय टका केर, एक दिन हम घड़ी कीनिकय अनलहुँ, कोनो भाय-बहिन खौंझाबय द्वारे बेर-बेर कहैय लागल, कतेक समय होय छौक, तहन सँ एके समय देखा रहल छौक। तँ हम खौंझा कय जोर-जोर सँ कानैय लगलहुँ। हमर मामा एलाह आ कहैत छथि जे कानैय कियैक छेँ, कहीं हमर घडी़ अछि मर्दक बेटा जे बाजैया से बजिते रहत। फेर हम अपन मामा के बात सुनि चूप भेलहुँ। ओकरा बाद फेर जाय दुर्गास्थान राति आठ बजे आरती बेरा मे, फेर घर आबी भोजन-भात कय, राति मे पटिया-बोरा लय नाच देखय जाइत छलहुँ। पहिने मनोरंजन केर यैह सब साधन रहैक। आर कुर्सी नहि लागल रहैत छलैक।

एक दिन आठ आना मे फूकना माँ सँँ खरीदबेलौंह, बाटे मे फूटि गेल, मोन बड उदास भय गेल। बाट मे तँ माँ नहि किछु कहलक मुदा आंगन आबि कहलक जे मना तँ केने छलियौक जे नहि ले फूकना, एहि सँ नीक एतेक पाय केर किछु खाय वला समान लय ले, फूटि गेलौक ने तुरंते। कनिकबो काल टीकलौह? तँ हमर मामा कहैय छथिन्ह, कियैक डाँटैय छिहीन, एकर नामे छैक फूकना तँ फूटतैह नहि, से फूटि गेलैक। एनाही बहुत रास यादगार पल अछि। हम लिखैत-लिखैत अपन बाल्यावस्था मे पहुँचि गेल छलहुँ आर मात्रीक सेहो घूमि एलौंह। जों पढैत काल पाठक लोकनि अहाँ सब अपन बाल्यावस्था मे पँहुच जायब तँ जरूर बतायब। पहिने जुड़ल-आँटल घर मे सेहो टका केर कमी रहैत छलैक। आ रैहतो छलैक तँ लोक बड सम्हैरकय खर्च करैत छल।

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2 Responses to दुर्गा पूजाक ओ घड़ी – मर्दक बेटा घड़ी जे बजैय से बजिते रहत

  1. हेमन्त कुमार झा

    बहुत सुन्दर संस्मरण।सही में अपने सब लोकनि के बाल्यावस्था में लऽ कऽ चलि गेलियन्हि।

  2. Bad nik likhlo

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