बुरबक बेटा टक्के काबिल – पवन कुमार झा ‘अग्निबाण’ केर प्रखर विचार पर प्रतिविचार

विचार

– पवन कुमार झा ‘अग्निवाण’

बुरबक बेटा टक्के काबिल

मैथिल आ मिथिला के अवनति में सामूहिक सोच के विपरीत व्यक्तिगत सोच के अधिक प्रभाव छै. संभव छै हम गलत छी लेकिन हमर अपन अनुभव अछि जे मिथिला में जे कोनो तरीका स पाई कमा ललक तकरे टा पूछ छै आ एयेह समाज के पतनशील बना रहल छै.

ईमानदारी स नौकरी-चाकरी क क आहां नाम नै कमा सकै छि कियैक त वेतन अनुरूपे परिवारक स्तर बनैत छै जाहिमें दिखावा, आडंबर, छिछोरापन, दंभ देखेनाई मुश्किल छै. समाज में रुतबा देखाबक लेल अतिरिक्त पाई चाही जे बिना गलत कार्य के प्राप्त केनाई बड्ड कठिन.

सर्वप्रतिष्ठित क्षेत्र जेना आईएएस, आईपीएस, बैंक, सरकारी उपक्रम के उच्च पद आदि के छोडिक मैथिल जेहि क्षेत्र में गेल( कोलकाता में ड्राईवर, दरबान, रसोइया, पंडिताई, मास्टर) ओहिमें अपन जगह टा बनाक रखलक. एक समय शिक्षा क्षेत्र में कोलकाता में मैथिल शिक्षक के प्रधानता छलै. प्राथमिक स उच्च स्तर तक एक स एक स्वनामधन्य शिक्षक छलाह. समय के साथ ओ सब अवकाश लेलनि लेकिन अपना जगह पर दोसर मैथिल के नै आब देलखिन. आई कोलकाताक शिक्षा क्षेत्र स मैथिल समाप्तप्राय छथि.

अहिना ड्राईवरी में झूठ, फसाद क क मैथिल अपन सम्मान हरौलथि. दरबानी में चोरिक आदत स सम्मान गेल आ रसोइया सब व्यभिचार के चलते रसोई स बाहर होइत गेला. एखन पंडिताई किछु बांचल छै लेकिन ओहुमें उड़िया आ उत्तर प्रदेश के पंडित सब सेंध मारि रहल छै.

कोलकाता स इतर जत मैथिल छथि सबहक हाल एक्के रंग. कियो ककरो नै. टका दियौ त बाबू-भैया नै त नाचू ता-ता-थैया

हमरा जानकारी में बहुतो मैथिल छलाह जे यदि चाहितैथ त बहुतो नवतुरिया मैथिल के सम्मानजनक काज भेटितई लेकिन हमरा आगू बढ़त के? ई संकीर्णता मैथिल आ मिथिला के खा गेल.

मिथिला में सामाजिक कुसंस्कार, नव नव आडंबर, व्यभिचार, अत्याचार आ आधुनिकताक नाम पर जघन्य अश्लील नवचार शहरी मैथिल द्वारा संक्रमित रोग अछि जकर उद्देश्य एकेटा- अपन धौस जमेनाई.

फेसबुक, ट्विटर आ अन्य सोशल मीडिया में मैथिल आ मिथिला के हुंकार भर वला सब बोलबहादुर सबके पूछियौन जे ओ कतेक मैथिल के जीविका के उपाय देलखिन त सब गबदी मारि देता. झूठ-साच बाजिक अपन आय बढेनाई एकमात्र लक्ष्य त मिथिला के उन्नति कि ख़ाक हेतई ?

पहिने सामूहिक विकास के मानसिकता बनाऊ, जाति-धर्म स ऊपर उठि संपूर्ण मिथिला के सामग्रिक विकास के लेल सब एकजुट भ आगे बढ़ू. एहेन संस्था बनाऊ जे मिथिला आ मैथिल के संकट में सदैव ठाढ़ रहै. लोकक आस्था अर्जन करू तखन राज्य आ साम्राज्य के सोच पर काज करू. एखन पेट में दाना अछिए ने आ डींग हांकब करोड़ के त के मोजर देत?

भने खराब लागत लेकिन हम अहिना कहब.

उपरोक्त विचार पर प्रवीण नारायण चौधरीक प्रतिक्रिया

चिन्तनशील पोस्ट, एज युजुअल (पूर्ववत्) – पंडित गुमनाम फरिश्ता जी! अहाँक झुकाव मैथिली-मिथिला दिश ‘जानकीप्रभाव’ समान देखि रहलहुँ अछि। कनी देरी सँ सही, लेकिन अहाँ मैथिली आ मिथिला पर निरन्तर लिखि रहल छी। २०११-१२ मे जँ मानि लेने रहितियैक त परिवर्तनक दौड़ संग यथार्थ प्रगतिक प्रतिवेदन सेहो बना सकैत रही। खैर… देर आये, दुरुस्त आये। एखनहुँ अपन प्रकृति अनुरूप ओतबे बात (निराशजनक पक्ष आ नकारात्मक अवस्था) टा अहाँ पकैड़ रहल छी – जखन कि एकटा आलोचना आ समीक्षा कयनिहार लेखक केँ चाही जे ओ परिवर्तनक सब दिशा मे नजरि घुमाबय।

 
यथा – प्रस्तुत लेख मे ‘मैथिल’ केर प्रवास मे जीवनक लेखा-जोखा तथा कमजोर पक्ष केँ कोलकाता मैथिल जीवनक उदाहरण रखैत नीक सँ वर्णन कयल अछि। लेकिन ई बिसरि गेलियैक जे मैथिल खुट्टा कोलकाता मे लाटे-लाटे गड़ेलैक। चाहे पंडिताय-पुरहिताय होइक, शिक्षण पेशा, रसोइया, गृहसेवक (चाकर), ड्राइवर, मजदूर, सेल्समैन… जाहि कोनो जगह पर मिथिलाक लोक मोरंग उपरान्त कोलकाता जेनाय शुरू केलक, ताहि मे स्रोत व्यक्ति सेहो कियो न कियो बाप-पित्ती-अभिभावकक गेरह केर लोक छथि, हुनकहु क्रेडिट देबय पड़त। एतबो असहयोग आ ईर्ष्या नहि छैक जे साफ लोक हारि गेल…!
 
जीत के-के आ कोना-कोना हासिल कयलनि, कतेको लोक करोड़ोंक व्यापार ठाढ कयलनि, हजारों केँ रोजगार लगौलनि, अपन कोलकाताक प्रवासक जीवन संग-संग गाम सेहो सजौलनि, कतेको इलाका मे आइ मिथिला बसैत अछि… ई सब नकारात्मकता केँ गौण कय दैत छैक। एकटा बात अहाँ लिखने छी – टका-पैसा लोक कमाइत अछि से अनैतिक मार्ग सँ…. ईहो गलत आ बेजा पक्ष केँ तामश मे लिखल से बुझाइत अछि। टका-पैसा आ कि कोनो भौतिक उपलब्धिक वास्ते मैथिलक श्रम, बौद्धिक सबलता आ ईमानदारिताक संग उच्च-उच्च व्यवस्थापनक जिम्मेवारी हासिल करब – एहि सब सँ संभव भेल अछि।
 
कोलकाता एकटा औद्योगिक केन्द्र आ अन्तर्राष्ट्रीय मंडी थिकैक। एतय बन्दरगाह उपलब्ध होयबाक कारण सदियों सँ विश्व व्यापारक इतिहास रहलैक अछि। ब्रिटिश शासनकाल मे भारतक राजधानी आ बंगाली समाजक जागरुकता संग मैथिल समुदायक भाषिक सहोदरी-समझदारी शुरुए सँ नीक फल देलक। कपड़ा, जूट, पेपर, आदि उत्पादनक संग ट्रेडिंग हब केर रूप मे कोलकाता मे मैथिल मस्तिष्क कतय-कतय पैठ बनेने अछि, कतेको स्वयं केर उद्योग चलबैत अछि, एहेन कतेको रास नीक पक्ष छैक। तेम्हर सेहो नजरि दियौक। हरदम घाव पर माछी होंकैत देखैत छी त हमरा बुझू टोकि देबाक इच्छा होइत अछि। आइ किछु बेसिये टोका गेल लगैत अछि। नमो-नमो!!
 
हरिः हरः!!
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