महामाया जगदम्बाक प्रथम चरित्र – केना मनन करब अपना सब

आध्यात्मिक चिन्तन

– प्रवीण नारायण चौधरी

माँ दुर्गाक प्रथम चरित्र
 
एक राजा अपन राज्य सँ बेदखल कयल गेल अछि। एकटा वैश्य अपन व्यापार, परिवार, पत्नी, पुत्र, अरजल सम्पत्ति, स्वजन, परिजन सभक द्वारा त्यागल गेल अछि। दुनू परेशान भऽ भागिकय जंगल पहुँचि गेल। ओतय एक मेधा नामक ऋषिक आश्रम पहुँचि हुनकहि आश्रय मे रहि रहल अछि। लेकिन रहि-रहिकय दुनू केँ अपन पूर्व दिनक समृद्धि आ स्वजन-परिजन केर खूब याद सेहो अबैत छैक आर दुनू एखनहुँ अपन पूर्व जीवन अभ्यासक कारण चिन्ता सेहो करैत अछि – केना होयत अपन राज्य, केना होयत अपन परिवार, ओ सम्पत्ति आ संसार जेकरा कतेको मेहनति सँ ओ सब बनौलक तेकर वर्तमान अवस्था केहेन होयत… .आदि-आदि अनेकों चिन्ता मे डूबल अछि।
 
दुनू एक-दोसर सँ परिचित भेलाक बाद – एक-दोसरक संग घटल घटना आ खिस्सा पिहानी सुनलाक बाद स्वयं ईहो विस्मय करैत अछि जे आखिर वैह लोक जे हमर-तोहर अहित केलक से एतेक कियैक याद आबि रहल अछि। दुनू ईहो बजैत अछि जे हम सब स्वयं सेहो बुझि रहल छी जे फल्लाँ-फल्लाँ सँ हमर हित आ अहित भेल, तथापि हमरा लोकनि ओहि फाँस मे केना फँसल छी। एक त हारल-परायल लोक, वनगमन लेल बाध्य आ हाल कोनो महान् संतक आश्रय पर आश्रित, ओ दुनू अपन-अपन मोनक जिज्ञासा ज्ञानी ऋषि सँ पूछलनि आर ऋषि फेर हुनका सब केँ बुझबैत ‘समस्त संसार आर माया’ केर विषय मे बतबैत एकर जननी जगदम्बा थिकीह कहैत छथि।
 
भगवतीक ई सहज स्वरूप हमरो सब लेल मननीय अछि। कारण हमहूँ-अहाँ एहि तरहक माया-मास्चर्ज मे कतेको बेर ओझराइत छी। बहुत बात बुझितो फेरो अबुझ बनि जाइत छी। खाली हाथ एलहुँ, खाली हाथ जायब… मुदा बीच मे हाथ भरहे टा के नहि, अपितु भरि-भरिकय जमा करय लेल आर अपन झूठक शान केर महल ठाढ करय लेल आतुर रहैत छी। कहाय लेल विवेकी आ ज्ञानी, मुदा मोन मे रखैत छी अनेकों मिथ्याचार, पापाचार, व्यभिचार, दुराचार, कुविचार आदि। सोचयवाली बात छैक जे एहेन कोन शक्ति छैक जे एहि तरहें ज्ञानी-परधानी केँ सेहो माया मे भटका रहल अछि! एतय ओहि शक्ति केँ भगवती कहल गेल अछि।
 
दुर्गा सप्तशतीक प्रथम अध्याय मे हमरा लोकनि यैह ठाम सँ दुर्गा आराधना आरम्भ करैत छी। मेधा ऋषि आ सुरथ राजा ओ दोसर व्यक्ति वैश्य केँ देल जा रहल शिक्षा केँ मार्कण्डेय उवाच – मतलब जे मार्कण्डेय ऋषिक द्वारा कहल जा रहल ज्ञानोपदेश ग्रहण करैत छी। प्रथम अध्याय मे भगवतीक चरित्रक सुन्दरता केँ आत्मसात करैत आगू देखैत छी मेधा ऋषि द्वारा राजा ओ वैश्य केँ ओहि मायाक जननी भगवतीक स्वरूपक वर्णन – पहिल वर्णन कतेक सारगर्भित अछि से देखू – सुन्दरताक वर्णन करय मे हमरा पास शब्द कम पड़ि रहल अछि – तथापि प्रयास करय मे कोनो हर्ज नहि छैकः
 
भगवान् विष्णु योगनिद्रा मे सुति रहल छथि। हुनकर कनगुज्जी सँ २ गोट विशालकाय राक्षस उत्पन्न होइत अछि, मधु आ कैटभ। जन्म लैत देरी दुनू सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीक पास पहुँचि हुनका मारय लेल उद्यत् होइत अछि। विचित्र क्रोध बल सँ परिपूर्ण ओहि दुनू राक्षस केँ देखि ब्रह्माजी चकित छथि, प्राणरक्षा लेल भगवान् विष्णुक समीप जाइत छथि। मुदा हुनका योगनिद्रा मे पड़ल देखि भगवानहु केँ नींद प्रदान करयवाली देवी ‘योगनिद्रा देवी’ केँ स्तवन करैत कहय लगैत छथि – सभक रक्षा करयवला भगवानहु केँ नींद प्रदान करयवाली समस्त माया आ शक्तिक अधिष्ठात्री महामाया देवी, कृपा करू, एहि दुइ प्रकट राक्षस सँ हमर प्राण रक्षा हेतु भगवान् केँ निन्द्रा सँ मुक्ति दियौन आर एहि दुनू राक्षसक ज्ञान केँ मोहित करू।
 
एवम् प्रकारेन महामाया माई ब्रह्माजीक स्तुति सुनि प्रसन्न भऽ भगवान् विष्णु केँ निन्द्रा सँ आजाद करैत छथि। भगवान् उठिते देखलनि ओहि दुइ महाबली राक्षस केँ, ओकरा सब केँ ब्रह्माजी केँ वध करबाक लेल उद्यत् देखि भगवान् रोकबाक चेष्टा कयलनि, परञ्च ओ दुनू मचन्ड भगवानहु संग भीड़ि गेल। मल्लयुद्ध होमय लागल। ५ हजार वर्ष धरि मल्लयुद्ध चलल। एम्हर महामाया भवानी द्वारा एहि दुइ महाराक्षसक बुद्धि केँ मोहित करबाक कारणे ओ दुनू भगवान् विष्णु सँ कहैत अछि, “अहाँक युद्धकौशल सँ हम सब बड़ा प्रसन्न छी, से मांगू किछु वरदान।” भगवान् सेहो कहैत छथिन जे वरदाने देबाक अछि त अहाँ दुनू गोटे हमरहि हाथ सँ मृत्यु केँ प्राप्त करी से वरदान देल जाउ। मायाक पाश सँ बन्हायल मधु-कैटभ भगवान् केँ कहलकनि जे एतय सब तैर जले-जल देखि रहल छी से कतहु सुखायल स्थान पर हमर दुनू केँ वध करू। एहि तरहें भगवान् विष्णु ओहि दुनू केँ अपन जँघा पर राखिकय चक्र सँ वेधन करैत वध कयलनि। ब्रह्माजीक प्राणरक्षा एहि तरहें भेलनि। एतय स्पष्ट अछि जे समस्त प्रेरणाक मूल मे भगवती मात्र छथि। आर देवीक आराधना सँ सभक कल्याण होइत अछि।
 
एहि प्रथम चरित्रक चिन्तन-मनन सँ हमरा लोकनि स्वयं केँ कतेक ज्ञानी-विवेकी आ कतेक उपयोगी होयबाक भान रखैत छी, ताहि मे भगवती केना हमरा सभक वास्ते सफल जीवनक लेल प्रेरणाक पुञ्ज भऽ सकैत छथि, ई सन्देह हम सब जरूर ग्रहण कय सकैत छी। आगाँ देखब – मध्यम चरित्र!
 
हरिः हरः!!
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