मिथ्याचारक चाप (समय-सापेक्ष नैतिककथा)

नैतिक कथा

– प्रवीण नारायण चौधरी

जँ भीतर मनमे कूद-कूद मचल रहय आ बाहर सँ ई आवरण चढेने रहत कि जोगी-फकीर छी, तेकरे कहल जाइत छैक मिथ्याचार। आचार-विचार जेहेन भीतर हो तेहने बाहर, भले गुन्डइ भीतर अछि आ बाहरो अछि तऽ संसार ओकरा नीके कहैत छैक, खास कऽ के एहि कलियुगमे। जतेक राबिन हूड आजुक दुनियामे भेटैत छैक, जतेक छूटभैया सुधरैत छैक, जतेक लफुआक लोफरपन्थी नियंत्रित होइत छैक… ओ सभटा एके सिद्धान्त अपनबैत अछि जे जेहेन भीतर रहब तेहेन बाहर रहब। हम गारंटीक संग कहि सकैत छी जे एहेन दुष्प्रवृत्तिक लोक एक न एक दिन ओहिना निवृत्ति पाबि सकत जेना बाल्मीकि डकैती छोडि आदिकवि बनि सकलाह।

कथा सुनलहुँ जे एक कर्मठ विचारधाराक लोक अपन कार्यालयक प्रमुख रहैत किछु काज आशाराम बापु समान ८ बजे रातिक बाद झाडफूक करैत छलाह, हुनकर कतेको रास लोक द्वेषी चारूकात एहेन लीला सब देखैत रहल आ पहिले तऽ चुप्पे रहल मुदा बादमे कियो कोनो कारणवश किछु बेसिये नून पी लेला पर अपन अतिखैन मनक पित्त कर्मठ प्रमुखकेर मैमसाहिबापर उझैल देलाह आ सेहो प्योर मिथिलांग वाला माछक झोरमे देल जायवाला लुंगिया मेरचाइक पेस्ट सहित।

फेर कि छलैक…. पत्नी कतबो बात लेल माफी दऽ सकैत छथि लेकिन हुनका ई मंजूर नहि जे हमर घरवाला कतहु कोनो दोसर महिला संग हँसी-ठिठोली खेलाइत छथि। बस, हुनका लग ई बात पहुँचिते ओ अपन औंठा-छाप बुद्धिक मारि अपनहि पतिकेँ सौंपैत पतिक कंपनी मालिक सँ शिकायत कय देलीह आ परिणाम एहेन जे कर्मठ प्रमुखकेर नौकरी छूटि गेल। केहेन समयक धारा छैक से गौर करियौक… ओ बेचारे प्रमुख महोदय कर्मठ रहैत कनेक – मनेक मिथ्याचारक गँध सँ गाँथल पत्नीक चपेटमे पडि जाइत छथि। पत्नी संग हुनका एहि लेल सम्बन्ध नहि बिगडैत छन्हि कारण ओ सहीमें नीतिवान लोक छथि, हलाँकि मनमे तहू लेल विचार उठैत छन्हि जे किछु करी, मुदा से फेर हुनकर स्वविवेक आदेश नहि दैत छन्हि आ ओ रुकि जाइत छथि।

हुनका स्मृतिमे एक जेठ भैयारीक पत्नी द्वारा परित्यागक कथा सेहो स्मृतिमे अबैत छन्हि आ ई सभ बात देखैत ओ अपनाकेँ सम्हारैत छथि। संसार नीक जेकाँ देखल लोक, दु:ख-बिपत्तिसँ पूर्ण परिचित ओ बस चुपचाप परिस्थितिसँ लडबाक लेल सोचि चुप रहि जाइत छथि। बरु नोकरी सेहो खुशीपूर्वक छोडि दैत छथि, घरवालीक सेवामे उपस्थित भऽ जाइत छथि आ धीरे-धीरे फेर सँ अपन सृजनशीलताक प्रसादे नव निर्माण कार्य करैत संसारमे प्रतिष्ठाकेर संरक्षण करैय मे लागि जाइत छथि। मिथ्याचार आब नहि करब से धरि शपथ लेने छथि, तदापि हुनका अपना पर सेहो भरोस कम छन्हि कारण ई प्रकृतिकेर हाथमे छैक। मिथिलाक ओ कहबी कथमपि बेजाय नहि छैक – चाइल, प्रकृति आ बेमाय – ई तिनू संगहि जाय। लेकिन ओ कर्मठ व्यक्ति छथि, फेर प्रमुख बनि जेता ताहि आत्मविश्वासक संग जीवनक डेग आगू बढा रहल छथि।

पूर्वमे सेहो एहेन अनेको गाथा भेटत जे संयुक्त परिवारमे १० भाइ बीच एक भैयारी कनेक भाइमे दादा बनैत छलाह। डाइ सेहो हुनके चलैत छलैन। नीति-अनीति गेल तेल लेबय लेल। ओ जे बाजि देलाह से अन्तिम होइत छलैक। लेकिन हुनकर एक गुण सब कियो आत्मसात धरि जरुर करैत छल जे ओ कहियो चोरा कय कोनो काज नहि करैत छलाह आ नहिये हुनका मे उपरोक्त मिथ्याचार कतहुसँ कियो देखैत छल। लोककेँ यदि ओहि भैयारीमे दादाक डर लगैत छलैक तऽ ओकर कारणे यैह रहैक जे ओकरा मे मिथ्याचार नहि रहैत छलैक।

आब अहाँ एक पत्नी-परित्यक्त छी, मुदा कर्मठ छी, तथापि पत्नी वियोग सँ अहाँक भीतर जे बेर – बेर कचैक उठैत अछि… एकरा मात्र आ मात्र निरन्तर योग-साधनासँ दाबल जा सकैत छैक। दुनिया सँ झगडला सऽ वा केकरो दोसराक चरित्रमे खोट देखला सऽ कदापि नहि। कबीरक एक दोहा बड पैघ छैक, जरुर मनन करू प्रवीण!

बुरा जो देखन मैं चला – बुरा न मिलया कोइ!
जब दिल खोजा आपना – मुझसा बुरा न कोइ!

ॐ तत्सत्!!

हरि: हर:!!

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