सोनालीक आत्मनिर्णय तथा अन्तिम मंजिल

लघुकथा

– रूबी झा

सोनाली तेसर बेर माँ बनैय वाली छलैथ,और दुइ टा बेटी पैहने छलखिन्ह। एहि बेर सासूरक पूरा परिवार यानि कि सासु-ससुर, पति, दियादनी-भैंसुर, ननैद, दियर सब मिलिकय कहैय छलखिन्ह दिन-राति, अहाँ चलू अस्पताल अल्ट्रासाउंड कराबऽ लेल, अगर फेरो बेटिये हैत तँ ओकरा सफैया करबा लेब, माने जे कोखिये में कन्या-भ्रूण हत्या कय देबैक। सोनाली पूरा परिवार केँ निहोरा-विनती कय क’ कहैत छलथि, “नहि-नहि! हम अस्पताल नहि जायब। अल्ट्रासाउंड नहि करायब। हमर गर्भ में जे संतान अछि हम ओकरा एहि दुनिया में आनब।” सासूरक लोक प्रस्ताव रखलखिन्ह, “ठीक छैक, लेकिन अगर बेटी होयत तँ घर छोड़िकय जाय पड़त, जायब अपन नैहरा?” बेचारी (सोनाली) किछु नहि बजलीह, चुपचाप समयक इंतजार करय लगलीह। दैवौ हुनक साथ नहि देलकन्हि। फेर सँ एकटा बेटीक माय बनि गेलीह। शर्त अनुसार सब मिलि (सासूर) घर सँ बाहर कय देलकन्हि, तीनू बेटी के संगे। कतबो पैर-दाढी सब केँ पकड़लथि, कियो नहि सुनलकन्हि, जहन पति सेहो नहि सुनलकन्हि तँ अनका सँ कोन उम्मीद, जकरा संगे सात फेरा लेने रहैथि, सात जन्म कि एकहु जन्म नहि साथ देलकन्हि। तीनू बेटी केँ संग लय केँ विदाह भ गेलीह, रास्ता त तय कय रहल छलथि मुदा मंजिल केर कोनो पता नहि छलन्हि। एक बेर सोचली नैहर चलि जाइत छी, फेर ध्यान मे आबि गेलनि मायक बात। जे महफा चढय सँ किछुए घड़ी पहिने कहने रहथिन्ह। “सुन बौआ! बेटी केर महफा उठैत छैक नैहरा सँ, आ ठठरी उठैत छैक सासूर सँ। कहियो बापक दलान पर उपराग नहि आबौक सासूर सँ आ कहियो रुसिकय, तमसाकय या झगड़ा-लड़ाई कय केँ एतय नहि अबिहें। आइ सँ तोहर वैह घर अपन घर छौक। बिना लियौने-हकारे कहियो एतय पैर नहि दिहें। बाप-दादा, घर-खानदान केर नाम नहि डूबबिहें। बाप-दादा केर माथ पर सँ पाग नहि खसबिहें। ई सब बात सोचिते-सोचिते पते नहि चललैन, जे कखन हुनक मंजिल आबि गेलन्हि। आ हुनक मंजिल छलन्हि गंगा नदी। बेरा-बेरी अपन करेजा के तीनू टुकड़ी (बेटी) केँ गंगा नदी में दैत अपनों समा गेलीह। पाठक सब सँ प्रश्न अछि कि सोनाली केर माय जे बेटी केँ घर-खानदान, बाप-दादा केर इज्ज़त राखैय लेल कहलखिन्ह से कतेक उचित अछि? कि सिर्फ बेटिये केँ इज्ज़त राखय केर समाज में भाड़ा भेटल छन्हि, बेटा केँ नहि? हमरा हिसाबे एहेन परिस्थिति में बेटी लेल जतेक सासूरक लोक दुश्मन छैन, ओहि सँ ज्यादा नैहरक लोक, खास क क माय। कम-सँ-कम ओ तँ अपन बेटी केर दुःख-दर्द बुझैय केर कोशिश करौथ। हमर सम्पूर्ण धिया केर माय-बाप सँ कर जोड़ि आग्रह अछि बेटी केँ खूब पढाऊ-लिखाऊ, स्वाबलंबी बनाऊ, दहेजक बारे में नहि सोचू। बेटी नहि रहत तँ संसार केना चलत।

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One Response to सोनालीक आत्मनिर्णय तथा अन्तिम मंजिल

  1. Hemant Kumar Jha

    बहुत मार्मिक कथा। आओर अन्त में कहल गेल गप जे सासुर सँ पैघ गलती नैहर बला के कारण जे ओ अपन धिया के स्वावलम्बी नहि बनओलनि।

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