श्रीराधामाधव केर कृपा-कटाक्ष सँ धन्य स्वामी विवेकानन्द

स्वाध्याय लेख

स्वामी श्री गम्भीरानन्द जी (प्रेषकः डा. सुरेशचन्द्र जी शर्मा) – अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी

सन् १८८७ मे स्वामी विवेकानन्द कोलकाता सँ परिव्राज्यक संन्यासीक रूप मे उत्तर भारत केर तीर्थक यात्रा पर निकलि पड़लाह। वाराणसी एवं अयोध्याधाम सँ होइत ओ अगस्त केर प्रथम सप्ताह मे श्रीधाम वृन्दावन पहुँचलाह। वृन्दावन मे ओ काला बाबू केर कुञ्ज मे यमुना पुलिन पर स्थित बलरामबाड़ी मे निवास कएने रहथि। बलराम बाबू श्रीजगन्नाथ जी केर निष्ठावान भक्त छलाह आर हुनक बाड़ी (घर) मे सेहो श्राराधाकृष्ण केर नित्य सेवा-पूजा होइत रहनि। वृन्दावन केर लीला – स्थल केर दर्शन कय स्वामीजी श्री राधा-माधव केर भाव मे हेरा गेला। नित्य प्रति लीला-स्थल आदिक दर्शन करैत ओ दिन-राति राधा-माधव केर भाव मे डूबल रहैत छलाह। एतय धरि जे हुनका अपन शरीर केँ सम्हारब तक कठिन भऽ गेलनि। एहि तरहें ओ १२ अगस्त सँ २० अगस्त धरि काला बाबू केर कुञ्जहि मे रहला। तदुपरान्त ओ वृन्दावन सँ बाहरक लीला-स्थल सभक दर्शनक लेल निकैल पड़लाह।

गोवर्धन पहुँचिकय स्वामीजी निर्भरा भक्ति-साधनाक प्रण कय लेलनि। ओ निश्चय कय लेलनि जे ओ अयाचक भाव सँ रहता तथा यदृच्छया जे किछु भेटि जायत, ताहि सँ क्षुधा शान्ति करब। एक दिन हुनका किछुओ भिक्षा प्राप्त नहि भेलनि आर ओ शारीरिक दुर्बलताक अनुभव करय लगलाह। भूख सँ पीड़ित मुदा अयाचक व्रत। ओ राधागोविन्द केर नाम-स्मरण करैत विचरण कय रहल छलाह। अचानक ओ पाछाँ सँ एक आवाज सुनलनि – ‘हे साधू! हे साधू!!’ परन्तु स्वामीजी पाछाँ मुड़िकय नहि तकलनि। जखन हुनका ओ आवाज अपन नजदीक अबैत प्रतीत भेलनि त ओ आगू दिशा मे दौड़य लगलाह ताकि हुनका कियो पकड़ि नहि लेन्हि। स्वामीजी केँ जखन आवाज एकदम पाछू सुनाय देलकनि – “हम अहाँ लेल किछु खाय वास्ते अनलहुँ अछि” तखन ओ आर बेसी तेजी सँ दौड़य लगलाह। मुदा एक व्यक्ति हुनका पास आबि गेल आर हुनका किछु खाद्य पदार्थ दय बिना किछु बजने चुपचाप चलि गेल। आनन्दविह्वल भेल ओहि निर्जन प्रदेश मे गोविन्द केर करुणा स्मरण कय केँ हुनकर आँखि मे प्रेमक नोर भरि एलनि।

गोवर्धन सँ ओ राधाकुञ्ज दिश बढलाह। ओतय एक कौपीन छोड़ि हुनकर अंग पर दोसर कोनो वस्त्र नहि छलनि। अतः स्नानक पहिने ओ ओहि कौपीन केँ धोय कय सुखाय लेल देलनि आर स्नान करय लेल कुंड मे उतरि गेलाह। स्नानक बाद कुंड सँ बाहर एलाह त देखलनि जे ओतय कौपीन नहि अछि। एम्हर-ओम्हर तकलापर देखैत छथि जे गाछक एक ठाढ़ि पर लंगोटी लेने एकटा बन्दर बैसल अछि। प्रयास कयलोपर ओ बन्दर सँ अपन कौपीन नहि लय सकलाह। एहेन स्थिति मे राधारानीक प्रति अपन स्वाभिमानयुक्त रोष प्रकट करैत ओ निर्णय कय लेलनि जे अपन लज्जा रखबाक लेल ओ एहि घोर जंगलहि मे अपन प्राण त्यागि देताह। जखन ओ ताहि उद्देश्यक संग जंगल दिश जाय लगलाह ताहि समय एक व्यक्ति एक नव गेरुआ वस्त्र आर किछु खाय के समान लय केँ आबि गेल आर हुनका सँ ओ सब ग्रहण करय लेल आग्रह करय लागल। स्वामीजी द्वारा श्रीराधाजीक उपहार मानिकय ताहि अंगवस्त्र केँ स्वीकार कय लेलनि। तेकर बाद ओतय सँ चलिकय ओ कुंडक पास एला तँ देखैत छथि जे कौपीन सुखेबा लेल जतय देने रही ओ ओतहि ओहिना राखल अछि। एहि घटना सँ हुनकर ई विश्वास दृढ भऽ गेलनि जे भगवानक वरदहस्त सदैव हुनकर रक्षा कय रहल छन्हि। स्वामीजी श्रीराधाजीक कृपा-कटाक्ष पाबिकय आह्लादित भऽ गेलाह।

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