राजर्षि सुयज्ञ केर राधा-माधव भक्ति

स्वाध्यायः राजर्षि सुयज्ञ केर राधा-माधव भक्ति

– श्री जयदीप सिंह (मैथिली अनुवादः प्रवीण नारायण चौधरी)
 
ब्रह्मवैवर्त्तपुराणक अनुसार स्वायम्भु मनु केर वंश मे उत्पन्न महाराज सुयज्ञ सप्तद्विपती वसुन्धराक एकछत्र चक्रवर्ती सम्राट छलाह। ओ महाभागवत ध्रुव केर पुत्र छलाह और हुनकहि समान भगवान् नारायण केर अनन्य भक्त छलाह। ओ पुष्कर तीर्थ मे एक हजार राजसूय यज्ञ केर अनुष्ठान कएने रहथि। यद्यपि महाराज सुयज्ञ केर नाम उत्कल छलन्हि मुदा ताहि सुन्दर यज्ञ केँ देखिकय ब्रह्माजी देवसभा मे राजा उत्कल केर नाम सुयज्ञ राखि देलन्हि।
 
पृथ्वी पर सर्वप्रथम श्री राधिका जी केर पूजनक सौभाग्य महाराज सुयज्ञहि केँ प्राप्त भेलनि। हुनका तृतीय आवरण केर पूजक कहल जाइत छलन्हि। ताहि सँ पहिने प्रथम आवरण मे स्वयं परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण जी द्वारा गोलोक मे श्रीराधिका जी केर पूजन कएने रहथि। तत्पश्चात् द्वितीय आवरण मे ब्रह्मा जी, भगवान् शंकर, अनन्त, वासुकि, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र, रुद्रगण, मनु तथा मुनीन्द्र लोकनि अपन-अपन लोक मे हुनक पूजा कएने छलाह।
 
एक बेरक बात थिक। महाराज सुयज्ञ यज्ञ संपन्न कय अपन राजसभा मे रत्नेन्द्रसार सँ निर्मित रमणीय रत्नसिंहासन पर आसीन छलाह। हुनकर सभा मे वसु, वासव, चन्द्रमा, इन्द्र आदित्यगण, आदि पैघ-पैघ देवता विराजमान छलाह। नारद, पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता, भृगु, अंगिरा, मरीचि, कश्यप, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, नर-नारायण आदि ऋषिगण, पितर और दिक्पाल सेहो ओतय उपस्थित रहथि। ताहि समय सुत्पा नामवला एक ब्राह्मण श्रेष्ठ ओतय पधारलनि, ओ विश्वरूप त्रिशिराक पौत्र छलाह। भगवान् शंकर हुनकर गुरु एवं परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण हुनक इष्टदेव छलथि।
 
ओ ब्राह्मण देवता सुखायल शरीरवला तथा मलिन वस्त्र पहिरने रहथि। हुनकर कंठ, ठोर व तालु सेहो सुखायल रहन्हि। यद्यपि ओ ब्रह्मतेज सँ सम्पन्न छलाह, मुदा अपना आप केँ नुकौने रहथि। हुनका देखिकय राजाक सभासद लोकनि हँसय लगलाह। राजा सेहो सिंहासन पर बैसले-बैसल हुनका प्रणाम केलनि। अपन स्थान सँ ओ उठला नहि। सभासद लोकनि एवं राजा द्वारा अपन अवहेलना होइत देखिकय ओ ब्राह्मणश्रेष्ठ सुत्पा क्रोधपूर्वक राजा केँ श्राप दैत कहलनि, “ओ पामर! तूँ एहि राज्य सँ दूर चलि जो, श्रीहीन भऽ जो, आर शीघ्रहि गलित-कुष्ठ सँ युक्त, बुद्धिहीन और उपद्रव आदि सँ ग्रस्त भऽ जो।”
 
एतेक कहिकय गूढ़ रूपवला ओ ब्राह्मण देवता ब्रह्मतेज सँ उद्भासित होइत चलि देलनि। राजा ओहि ब्राह्मणश्रेष्ठ केँ प्रणाम कय भय सँ काँपैत कानय लगलाह। ताहि समय ओतय उपस्थित सनत्कुमार, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, प्रचेता आदि श्रेष्ठ मुनि लोकनि ओहि ब्राह्मण देवता सँ राजा केँ क्षमा करबाक लेल अनुरोध कयलनि। मुदा ओ फेर सँ राजभवन नहि घुरलाह। तखन राजा सुयज्ञ केर धर्मात्मा पुरोहित वसिष्ठ द्वारा हुनका ताहि ब्राह्मण देवताक समीप पठौलनि। राजा सुयज्ञ वसिष्ठ जीक आज्ञानुसार ओतय गेलाह जतय ब्राह्मणश्रेष्ठ सुत्पा स्थित छलाह तथा ओतय जाय हुनकर दुनू चरण मे दंड केर भाँति खसि पड़लाह। ई देखि सुत्पा क्रोध केर त्याग कय हँसय लगलाह। आर, ओ कृपामूर्ति राजा केँ आशीर्वाद देलनि एवं हँसैत ओ कहलनि, “सुयज्ञ! हम अहाँ पर दया केलहुँ अछि। अहाँ केँ श्राप नहि देलहुँ अछि। अहाँ एक भयानक गहींर भवसागर मे खसय जा रहल छलहुँ। हम त अहाँक उद्धार केलहुँ अछि। राधावल्लभ श्रीकृष्ण हमरा सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य एवं सामीप्य नामक मोक्ष दैत छथि, मुदा हम हुनकर कल्याणमयी सेवाक सिवा दोसर कोनो वस्तु नहि लैत छी। ब्रह्मत्व व अमरत्व केँ पर्यन्त हम जल जे देखाय दयवला प्रतिविम्ब जेकाँ मिथ्या मनैत छी। नरेश्वर! भक्तिक अतिरिक्त सब किछु मिथ्या भ्रम मात्र थिक, नश्वर थिक। इन्द्र, मनु अथवा सूर्य केर पद सेहो जल मे खींचल गेल रेखा समान झूठ अछि। तखन राजाक पद केर कि गणना!”
 
“राजन! निकलू एहि घर सँ। दय दियौन राज्य अपन बेटा केँ। अपन साध्वी पत्नीक रक्षाक भार अपन बेटा केँ सौंपि शीघ्रहि वन दिश चलू। ब्रह्मा सँ लय केँ कीट धरि सब किछु मिथ्यहि थिक। जे सभक ईश्वर छथि ताहि परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्ण केर भजन करू।”
 
सुयज्ञ कहलखिन, “प्रभो! आइ हमर जन्म सफल भऽ गेल। जीवन सार्थक भऽ गेल। हमरा लेल अहाँक श्राप भक्तिक कारण भेला सँ वरदान बनि गेल; कियैक तँ समस्त मंगलहु केर मंगल करयवला हरि-भक्ति परम दुर्लभ अछि। परन्तु हे मुने! अहाँक श्राप सँ एहि समय हम गलित-कुष्ठ केरी रोगी भऽ गेलहुँ अछि। अपवित्र छी आर तप केर अधिकार सँ वंचित छी। एहेन दशा मे हम केना तपस्या कय सकब?”
 
सुत्पा कहलखिन, “ब्राह्मण मनुष्यक रूप मे साक्षात् देवाधिदेव जनार्दन थिकाह। पृथ्वी पर जे-जे तीर्थ अछि ओ सब ब्राह्मणक चरण मे अछि। ब्राह्मणक चरणोदक पाप आ रोग केर विनाश करयवला अछि। हम एक वर्ष बाद फेरो आयब। ता धरि अहाँ चरणोदक केर पान नित्य करैत रहब।” ई कहिकय सुत्पा अपन घर चलि गेलाह आर राजा नित्य भक्तिभाव सँ ब्राह्मण लोकनिक चरणोदक केर पान करय लगलाह।
 
वर्षी बीतैत-बीतैत राजा रोग-व्याधि सँ मुक्त भऽ गेलाह। तखन मुनि-श्रेष्ठ सुत्पा ओतय फेरो एलाह। राजा हुनका परम आदरपूर्वक सत्कार कय केँ पुछलनि, “हे विप्र! हे मुने! हम किनकर भजन करू? किनकर आराधना सँ हम शीघ्र गोलोक केर प्राप्ति कय लेब?”
 
राजाक एहि बात पर ओ ब्राह्मण शिरोमणि राजेन्द्र सुयज्ञ सँ कहला – “महाराज! श्रीकृष्ण केर सेवा सँ हुनकर लोक केँ अहाँ बहुत जन्म-जन्म धरि प्राप्त करब। तैँ हुनकर प्राणक अधिष्ठात्री देवी परात्परस्वरूपा श्रीराधा केर भजन करू। ओ कृपामयी छथि। हुनक प्रसाद सँ साधक जल्दिये हुनकर धाम केँ प्राप्त कय लैत अछि।” ई कहिकय मुनि हुनका श्रीराधाजीक षडक्षर मंत्र – “ॐ राधायै स्वाहा” केर उपदेश देलनि। संगहि रासमण्डल मे रासेश्वरक संग विराजित रासेश्वरी श्रीराधा जी केर सामवेदोक्त ध्यान, स्तोत्र एवं कवच सेहो हुनका बतेलनि।
 
राजा अपन राज्य पुत्र केँ दय घर केर त्याग कय देलनि तथा पुष्कर मे जा कय १०० दिव्य वर्ष धरि दुष्कर तपस्या कयलनि। तखन हुनका आकाश मे रथपर बैसल परमेश्वरी श्रीराधा जी केर दर्शन भेलनि। हुनकर दर्शन मात्र सँ राजाक सब पाप-ताप दूर भऽ गेलनि। ओ मनुष्य देह केँ त्यागि देलनि तथा दिव्य रूप धारण कय लेलनि। देवी राधा ओहि रत्नेन्द्र-निर्मित विमान द्वारा राजा केँ साथ लय गोलोक मे चलि गेलीह। ओतय ओ रत्नसिंहासन पर विराजमान; रत्नक हार, किरीट तथा रत्नमयी आभूषण सँ विभूषित; अग्निशुद्ध, अत्यन्त निर्मल, चिन्मय पीताम्बर धारण कएने गोलोकाधिपति भगवान् श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण केर दर्शन कयलनि। ओ किशोर गोपबालकक रूप मे देखा रहल छलाह। हुनक कान्ति नूतन जलधर केर समान श्याम छल। नेत्र श्वेतकमल केर समान छल। शरत्-पूर्णिमा केर चन्द्रमण्डल केँ तिरस्कृत करयवला हुनकर मुखमण्डल मंद-हास्य सँ सुशोभित छल। मनोहर आकृतिवला हुनकर द्विभुज स्वरूप छल। ओ अपना हाथ मे मुरली धऽ रखने छलाह। हुनकर १२ प्रिय सखा ग्वाल-बाल उज्जर चँवर लेने हुनक सेवा कय रहल छलाह। अपन आराध्य केर एहेन मनोहर झाँकी केर दर्शन कय राजा सुयज्ञ तुरन्त रथ सँ उतरि गेलाह आर नेत्र सँ नोर बहबति पुलकित शरीर सँ भगवान् केर चरण मे मस्तक राखिकय हुनका गोर लगलनि। तखन परमात्मा श्रीकृष्ण द्वारा राजा केँ अपन दासत्व, आशीर्वाद एवं अविचल भक्ति प्रदान कयल गेल। तदनन्तर श्रीराधा जी रथ सँ उतरिकय श्रीकृष्ण केर वक्ष मे विराजमान भऽ गेलीह।
 
एहि तरहें श्रीराधा जीक कृपा राजा सुयज्ञ केँ श्रीकृष्ण केर प्राप्ति करौलक, जे पितामह ब्रह्मा एवं शिव केर वास्ते सेहो परम दुर्लभ छल।
 
जय जय श्री राधे!!
 
हरिः हरः!!
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